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तिरुवनंतपुरम3 घंटे पहले
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देश में इन दिनों संस्कृतियों का टकराव जोरों पर है। हिजाब विवाद के बाद भक्तों को उनके पापों के प्रायश्चित के लिए 12 ब्राह्मणों के पैर धोने की प्रथा का मामला सामने आया है। केरल हाईकोर्ट ने एक अखबार की खबर पर संज्ञान लेते हुए त्रिपुनिथुरा के श्री पूर्णाथ्रइसा मंदिर के कोचीन देवस्वम बोर्ड को नोटिस भेजकर जानकारी मांगी है।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और पी.जी. अजितकुमार ने संज्ञान लेते हुए मामले की शुरुआत की।
पेपर में छपी खबर से खुला मामला
घटना तब सामने आई जब एक मलयालम न्यूज पेपर केरल कौमुदी ने 4 फरवरी को एक रिपोर्ट पब्लिश की। इस रिपोर्ट में लिखा था कि मंदिरों में पंथरांडू नमस्कारम के तहत ब्राह्मणों के पैर धुलवाने की प्रथा का पालन किया जा रहा है। कोचीन देवस्वम बोर्ड जिसके तहत मंदिर संचालित होता है, उसने इन दावों का खंडन किया है।
बेंच के सामने बोर्ड के वकील ने दलील दी कि अनुष्ठान के तहत 12 ब्राह्मणों के पैर धोने का काम भक्तों ने नहीं बल्कि थंतरी (मुख्य पुजारी) ने किया था। हालांकि बोर्ड ने इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी।
क्या है पैर धुलवाने वाला अनुष्ठान
कालकाझिचूट्टू नाम के इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों के पैर धोने, थंतरी या किसी अन्य पुजारी के आने पर उन्हें भोजन करवाना और फिर उनके जाने पर शॉल या दक्षिणा भेंट करना होता है। यह काम थंतरी या पुजारी करता है, भक्तों को इसे करने की अनुमति नहीं है। जब यह अनुष्ठान हुआ तो विवाद हो गया, इसके बाद मंत्री राधाकृष्णन ने कोचीन देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष वी. नंदकुमार से रिपोर्ट मांगी।
उन्होंने साेशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पुनर्जागरण के लिए मशहूर केरल को बदनाम करने वाले ऐसे अनुष्ठानों को खत्म करेंगे। अन्य देवस्वम बोर्ड के तहत मंदिरों में प्रचलित ऐसे किसी भी अनुष्ठान के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
बोर्ड से चर्चा के बाद खत्म हो सकती है रस्म
नंदकुमार ने कहा कि अनुष्ठान को समाप्त करने पर निर्णय लेने से पहले थंतरी और अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई सालों से कोचीन देवस्वम बोर्ड के तहत मंदिरों के चढ़ावे की रेट लिस्ट में यह अनुष्ठान शामिल था। मेहमानों का स्वागत करने की हमारी परंपरा है, जिस तरह एक दूल्हे के पैर धोना भी इसी तरह की रस्म है।

मंदिर के उत्सव के दौरान हाथियों की परेड को लेकर भी विवाद हो चुका है।
नंदकुमार ने कहा कि कोडुंगलूर में बोर्ड के एक और मंदिर का अनुष्ठान पर इसलिए विवाद हो गया क्योंकि उन्होंने जोश-जोश में बोर्ड से पूछे बिना इसे भक्तों के लिए खोलकर लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि घरों या मंदिरों में ब्राह्मणवादी अभिशाप होने पर देवप्रेशनम के बाद समाधान के रूप में अनुष्ठान किया गया था।
तिरुवनंतपुरम3 घंटे पहलेकॉपी लिंकवीडियोदेश में इन दिनों संस्कृतियों का टकराव जोरों पर है। हिजाब विवाद के बाद भक्तों को उनके पापों के प्रायश्चित के लिए 12 ब्राह्मणों के पैर धोने की प्रथा का मामला सामने आया है। केरल हाईकोर्ट ने एक अखबार की खबर पर संज्ञान लेते हुए त्रिपुनिथुरा के श्री पूर्णाथ्रइसा मंदिर के कोचीन देवस्वम बोर्ड को नोटिस भेजकर जानकारी मांगी है।जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और पी.जी. अजितकुमार ने संज्ञान लेते हुए मामले की शुरुआत की।पेपर में छपी खबर से खुला मामलाघटना तब सामने आई जब एक मलयालम न्यूज पेपर केरल कौमुदी ने 4 फरवरी को एक रिपोर्ट पब्लिश की। इस रिपोर्ट में लिखा था कि मंदिरों में पंथरांडू नमस्कारम के तहत ब्राह्मणों के पैर धुलवाने की प्रथा का पालन किया जा रहा है। कोचीन देवस्वम बोर्ड जिसके तहत मंदिर संचालित होता है, उसने इन दावों का खंडन किया है।बेंच के सामने बोर्ड के वकील ने दलील दी कि अनुष्ठान के तहत 12 ब्राह्मणों के पैर धोने का काम भक्तों ने नहीं बल्कि थंतरी (मुख्य पुजारी) ने किया था। हालांकि बोर्ड ने इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी।क्या है पैर धुलवाने वाला अनुष्ठानकालकाझिचूट्टू नाम के इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों के पैर धोने, थंतरी या किसी अन्य पुजारी के आने पर उन्हें भोजन करवाना और फिर उनके जाने पर शॉल या दक्षिणा भेंट करना होता है। यह काम थंतरी या पुजारी करता है, भक्तों को इसे करने की अनुमति नहीं है। जब यह अनुष्ठान हुआ तो विवाद हो गया, इसके बाद मंत्री राधाकृष्णन ने कोचीन देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष वी. नंदकुमार से रिपोर्ट मांगी।उन्होंने साेशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पुनर्जागरण के लिए मशहूर केरल को बदनाम करने वाले ऐसे अनुष्ठानों को खत्म करेंगे। अन्य देवस्वम बोर्ड के तहत मंदिरों में प्रचलित ऐसे किसी भी अनुष्ठान के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।बोर्ड से चर्चा के बाद खत्म हो सकती है रस्मनंदकुमार ने कहा कि अनुष्ठान को समाप्त करने पर निर्णय लेने से पहले थंतरी और अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई सालों से कोचीन देवस्वम बोर्ड के तहत मंदिरों के चढ़ावे की रेट लिस्ट में यह अनुष्ठान शामिल था। मेहमानों का स्वागत करने की हमारी परंपरा है, जिस तरह एक दूल्हे के पैर धोना भी इसी तरह की रस्म है।मंदिर के उत्सव के दौरान हाथियों की परेड को लेकर भी विवाद हो चुका है।नंदकुमार ने कहा कि कोडुंगलूर में बोर्ड के एक और मंदिर का अनुष्ठान पर इसलिए विवाद हो गया क्योंकि उन्होंने जोश-जोश में बोर्ड से पूछे बिना इसे भक्तों के लिए खोलकर लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि घरों या मंदिरों में ब्राह्मणवादी अभिशाप होने पर देवप्रेशनम के बाद समाधान के रूप में अनुष्ठान किया गया था।