यूपी की 5 धर्म नगरियों से ग्राउंड रिपोर्ट:गोरखपुर वाले बोले

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2 घंटे पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

यूपी में छठे और सातवें चरण में धार्मिक नगरियों में वोटिंग होनी है। अयोध्या, मथुरा, प्रयागराज में चुनाव हो चुके हैं। अब काशी, गोरखपुर और मिर्जापुर की बारी है। वाराणसी में लोग काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद BJP का सपोर्ट कर रहे हैं तो गोरखपुर का चुनाव इंटरेस्टिंग हो गया है। यहां शहरी क्षेत्र में BJP की पकड़ मजबूत है, तो गांवों में साइकिल का बटन दबाने की बातें हो रही हैं।

यूपी की पॉलिटिक्स पर धर्म कितना असर डालता है। यह जानने के लिए हम 5 शहरों में पहुंचे। कई मंदिर, मठों, धर्मशालाओं में घूम-घूमकर पुजारियों से बात की। हमने यहां के लोगों की समस्याएं और यहां उनके चुनावी मुद्दे जाने हैं। आइए एक-एक करके इन शहरों की यात्रा पर चलते हैं।

धार्मिक नगरी 1: वाराणसी
‌‌वाराणसी में सुबह के 5 बजे थे। मठों,मंदिरों से घंटों और वैदिक मंत्रोच्चार की आवाजें आ रही हैं। उधर दशाश्वमेध घाट पर गंगा में डुबकी लगाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। कुछ पंडे लोगों के माथे पर बिना पूछे चंदन लगाकर 10 रुपए मांग रहे हैं। दुकानों पर फ्री लॉकर, होटल बुकिंग के पोस्टरों के साथ सपा, भाजपा और कांग्रेस के चुनावी पर्चे भी चिपके दिखे। यहां हम पुराने वाराणसी की लगभग 35 से ज्यादा गलियों में चार घंटे तक घूमते रहे। कुल मिलाकर यहां BJP और सपा की सीधी टक्कर है। इसमें भाजपा सपा से 20 है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में छोटी-बड़ी 23 इमारतें और 27 मंदिर हैं। इस पूरे कॉरिडोर को लगभग 50,000 वर्ग मीटर के एक बड़े कैंपस में बनाया गया है। यहां अलग-अलग तरह की 5,000 लाइटें लगाई गई हैं। इसकी कुल लागत 900 करोड़ रुपए है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में छोटी-बड़ी 23 इमारतें और 27 मंदिर हैं। इस पूरे कॉरिडोर को लगभग 50,000 वर्ग मीटर के एक बड़े कैंपस में बनाया गया है। यहां अलग-अलग तरह की 5,000 लाइटें लगाई गई हैं। इसकी कुल लागत 900 करोड़ रुपए है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर दिलाएगा भाजपा को बहुमत
वाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बाहर प्रसाद की दुकान पर हमें वीरेंद्र सिंह मिल गए। उन्होंने बताया, ” 2014 से पीएम मोदी ने वाराणसी के लिए बहुत कुछ किया है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बनने के बाद यहां के लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया भर में वाराणसी का नाम रोशन हुआ है। BJP ‌वाराणसी की सभी विधानसभा सीटों पर प्रचंड बहुमत से जीतेगी। प्रदेश का आंकड़ा 350 पार होगा।’’

संस्कृत पढ़ने वाले छात्रों को नहीं मिलती सरकारी स्कॉलरशिप…
वाराणसी के केदारनाथ गोयनका वेद विद्यालय में हमें बच्चे मंत्रों का पाठ करते मिले। हाथ चलाते हुए इन बच्चों को संस्कृत के श्लोक पढ़ते देख काफी सुकून मिलता है। हमने यहां के आचार्य शेषनाथ तिवारी से बात की। उन्होंने बताया,” चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार दोनों ने ही संस्कृत विश्वविद्यालयों के बारे में नहीं सोचा। वाराणसी के छात्रों के लिए गुरुकुल परंपरा वाले छात्रावास की सुविधा बिल्कुल खत्म हो चुकी है। वैदिक शिक्षा लेने वाले बच्चों को सरकारी स्कॉलरशिप भी नहीं मिलती है। ”

केदारनाथ गोयनका वेद विद्यालय के आचार्य शेषनाथ तिवारी। साथ में वैदिक शिक्षा लेने वाले छात्र।

केदारनाथ गोयनका वेद विद्यालय के आचार्य शेषनाथ तिवारी। साथ में वैदिक शिक्षा लेने वाले छात्र।

बीते पांच वर्षों में बंद हो गईं 100 से अधिक वैदिक पाठशालाएं
आचार्य शेषनाथ आगे कहते हैं,”वाराणसी में वैदिक स्कूलों की हालत गिरती चली जा रही है। बीते 5 वर्षों में यहां 100 से अधिक वैदिक पाठशालाएं धन के अभाव और महामारी के कारण बंद हो चुकी हैं। संस्कृत विश्वविद्यालयों को अगर सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलता है, तो इन वैदिक स्कूलों का आर्थिक विकास हो पाएगा।”

धर्म किसी एक व्यक्ति या पार्टी विशेष का नहीं
रविदास गेट इलाके के पास अस्सी गली में श्री राधव मंदिर अखाड़ा गूदड़ दास मठ है। यहां के महंत रामदास ने बताया,” आजकल की राजनीतिक पार्टियां धर्म के नाम पर वोट मांगती हैं। मैं इसके सख्त खिलाफ हूं। धर्म किसी एक व्यक्ति या पार्टी विशेष का नहीं है। यह तो सभी के लिए है। कई पार्टियां इसे अपने फायदे के लिए चुनाव में मुद्दा बनाती हैं। यह ठीक बात नहीं है।”

वाराणसी के वैदिक स्कूलों से पढ़कर लोगों ने पाई तरक्की

आचार्य महेश द्विवेदी कहते हैं कि वाराणसी में गुरुकुल पंरपरा में आने वाले आवासीय छात्रावास कम होते जा रहे हैं। इससे छात्रों को यहां रहकर पढ़ाई करने में परेशानी हो रही है।

आचार्य महेश द्विवेदी कहते हैं कि वाराणसी में गुरुकुल पंरपरा में आने वाले आवासीय छात्रावास कम होते जा रहे हैं। इससे छात्रों को यहां रहकर पढ़ाई करने में परेशानी हो रही है।

आचार्य संस्कृत ब्रम्ह विद्या महाविद्यालय में व्याकरण के आचार्य महेश द्विवेदी बताते हैं, “ देश में जितने भी अखाड़े हैं, उनमें बड़े-बड़े महामंडलेश्वर और महाराज लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पढ़कर निकले हैं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी और BHU में व्याकरण विभाग के अध्यक्ष राम नारायण द्विवेदी भी गुरुकुल परंपरा से पढ़कर आज बड़े पद पर पहुंचे हैं।’’

धार्मिक नगरी 2: गोरखपुर
5 साल पहले जहां से निकलकर एक महंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। लोगों ने कहा कि उस वक्त से ही यूपी में धर्म की राजनीति ने और जोर पकड़ लिया। साल 2022 के इस चुनावी माहौल में गोरखपुर में जगह-जगह बस एक की नारा सुनाई दे रहा है, “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे।”

लेकिन जब हमने धर्म और राजनीति पर यहां के लोगों से बात की तो इसका एक दूसरा ही पहलू हमारे सामने आया…

कहीं नहीं गए थे राम, जो हम उनको लाएंगे

मंदिर बनवा दिए इसका मतलब ये नहीं की हर हिन्दू बीजेपी को ही वोट देगा।

मंदिर बनवा दिए इसका मतलब ये नहीं की हर हिन्दू बीजेपी को ही वोट देगा।

धर्म की राजनीति के सवाल पर प्रतीक कहते है, BJP सरकार हमेशा “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे” का नारा लगाकर प्रचार करती रहती है। लेकिन इस बार हम उनसे कहना चाहते हैं कि “कहीं नहीं गए थे राम, जो हम उनको लाएंगे।”

उन्होंने कहा, अब धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद करें। क्योंकि राम मंदिर के ठेकेदार, हिन्दुओं के ठेकेदार नहीं हो गए हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि राम मंदिर बनवा दिया है तो हर हिंदू BJP को ही वोट देगा।

वहीं शिव मंदिर में दर्शन करने आए लोग कहते हैं, “पूजा करना या धर्म को मानना गलत नहीं है। जब तक योगी जी सांसद थे उससे हिंदुत्व को फायदा ही हुआ है। लेकिन उनके CM बनने के बाद धर्म की गन्दी राजनीति बढ़ गई है।”

हमारा एक ही धर्म होना चाहिए, मानवता

चुनाव जीतने के लिए ही राम मंदिर बनवाया गया है।

चुनाव जीतने के लिए ही राम मंदिर बनवाया गया है।

यूपी में जब भी चुनाव होता है, हिंदू-मुसलमान चाइना-पाकिस्तान, यही सब होने लगता है। BJP के पास इसके अलावा और कोई ही मुद्दा नहीं हैं। अगर कोई राजनीति में आता है तो उसे धर्म और जाति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए।

मंदिर के बाहर एक शादीशुदा कपल ने हमें बताया कि, BJP को चुनाव में फायदा हो इसलिए ही राम मंदिर बनवाया गया है। गोरखपुर में धर्म की राजनीति बहुत होती है। लेकिन इस बार पढ़े-लिखे लोग मंदिर के नाम पर वोट नहीं देंगे।

युवाओं ने कहा बांटने की राजनीति पूरे देश में चल रही है

युवाओं ने कहा,

युवाओं ने कहा, “धर्म नहीं रोजगार होना चाहिए मुद्दा”।

गोरखपुर में पढ़ाई कर रहे अनिकेत यादव ने कहा, “चुनाव जब आता है, बहार लेकर आता है। पुरानी भर्ती पता नहीं, नई हजार लेकर आता है।”

यही हाल है यूपी का। चुनाव जब आते हैं तो धर्म दिखता है, रोजगार कहीं नहीं दिखता। लेकिन युवाओं को रोजगार चाहिए। राजनीति से हम धर्म को अलग नहीं कर सकते हैं। लेकिन धर्म सत्ता में नहीं मन की संतुष्टि के लिए होना चाहिए।

वहीं शुभम मिश्रा और वशिष्ट कनौजिया कहते हैं कि यूपी में बांटने वाली राजनीति हर जगह हो रही है। ये गलत है। यह मौका हम लोगों ने ही सरकार को दिया है। हमें धर्म के नाम पर वोट नहीं करना चाहिए। अपने विधायक के काम को देखकर वोट करना होगा। तभी हम राजनीति और आस्था दोनों में सफल हो पाएंगे।

धर्म नगरी 3: चित्रकूट
भगवान राम ने यहां 11 वर्ष, 11 महीने और 11 दिन बिताए थे। हम भी यहां के चुनावी हाल-चाल जानने के लिए यहां पहुंचे थे। यहां राम घाट है जो मंदाकिनी नदी के तट पर बना है। यहां मौजूद महंत जयराम दास ने बताया, “भगवान राम यहीं स्नान किया करते थे। फिर दिन का वक्त कामतानाथ पर्वत पर बिताया करते थे। जहां उनके भरत जी से मिलने के दौरान के पदचिन्ह बने हुए हैं।’’

रामायण कल में कामद गिरि से 2 किलोमीटर दूर इस चट्टान पर राम और सीता विश्राम किया करते थे।

रामायण कल में कामद गिरि से 2 किलोमीटर दूर इस चट्टान पर राम और सीता विश्राम किया करते थे।

यहां राम शैया नाम का विशाल पत्थर है। यहां रामायण काल में राम और सीता विश्राम करते थे। हम एक-एक करके इन सभी जगहों से गुजरे और लोगों से चुनावी माहौल जाना…

जिसमें लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं वो मंदाकिनी नदी गंदी है
रामघाट से कामतानाथ पर्वत की तरफ बढ़े तो माइक देख कर सीताराम गुप्ता और कन्हैया लाल अग्रवाल ने हमें रोक लिया। उन्होंने कहा, “मंदाकिनी गंदी है। इसकी सफाई का काम नहीं होता है। देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालु इसी नदी में डुबकी लगाते हैं। यहां की सड़कें भी खराब हैं।” हमने पूछा कौन जीत रहा है तो बोले, “भाजपा-सपा में मामला फंस गया है।कोई भी जीत सकता है। यहां कांग्रेस गायब है। ”

मंदाकिनी नदी किनारे राम घाट, शाम की आरती का सुंदर नजारा।

मंदाकिनी नदी किनारे राम घाट, शाम की आरती का सुंदर नजारा।

वोट मांगने वाले नेता गरीबों को नहीं दिला पाए पक्की छत
कामतानाथ पर्वत पहुंचे तो प्रसाद की दुकानें दिखीं। यहीं अपनी झोपड़ी में फूल माला की दुकान लगाए बैठे बुजुर्ग ने कहा, “यहां मंत्री-मिनिस्टर परिक्रमा करने आते हैं। वोट भी मांगते हैं। लेकिन पक्का मकान देने की बात नहीं करते। मैं और तुम्हारी दाई इसी कच्ची झोपड़ी में 70 साल से रह रहे हैं।”

भाजपा ने परिक्रमा मार्ग को चमका दिया… यहां कमल खिलेगा

योगी सरकार की तारीफ करते हुए दो बाबा, कामदगिरि परिक्रमा मार्ग में भीख मांगते हैं।

योगी सरकार की तारीफ करते हुए दो बाबा, कामदगिरि परिक्रमा मार्ग में भीख मांगते हैं।

हम 5 किमी की परिक्रमा का एक तिहाई हिस्सा पूरा कर चुके थे। लगभग डेढ़ किमी का रास्ता बचा था। आगे काले कपड़े पहने हुए दो बाबा मिले। उन्होंने बताया, “योगी-मोदी की सरकार आने वाली है। पहले यहां परिक्रमा का रास्ता सही नहीं था, अब बाबा ने सब चकाचक कर दिया है। पहले परिक्रमा करने वालों को धूप-बारिश झेलनी पड़ती थी, अब पूरे रास्ते पर टीन शेड लगा दिए गए हैं। इसका फायदा भाजपा को मिलेगा और यहां कमल खिलेगा।”

धार्मिक नगरी 4 : प्रयागराज

प्रयागराज का संगम न सिर्फ धार्मिक रूप से अति महत्वपूर्ण है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका उतना ही महत्व है। 2019 के चुनाव से ठीक पहले अर्धकुंभ आयोजित हुआ। पीएम नरेंद्र मोदी आए और उन्होंने सफाई कर्मियों को कुर्सी पर बैठाकर उनका पैर धोया। उस क्षण ने न सिर्फ यहां के बल्कि पूरे देश के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया था। अर्धकुंभ को महाकुंभ की तरह आयोजित करवाकर यूपी सरकार ने भी जनता के बीच एक मजबूत संदेश दिया।

संगम तट पर हर साल होने वाले माघ मेले में लगभग 3 करोड़ लोग आते हैं।

संगम तट पर हर साल होने वाले माघ मेले में लगभग 3 करोड़ लोग आते हैं।

यूपी चुनाव में संगम की भूमिका
योगी सरकार ने 2019 में भव्य कुंभ-दिव्य कुंभ का आयोजन किया। अरबों रुपए लगाए गए। जो आया देखता रह गया। न सिर्फ संगम बल्कि पूरे शहर का काया पलट हो गया। नतीजा यह हुआ कि लोग सरकार से खुश हो गए। हर साल माघ मेला का आयोजन होता रहा है। पूरे मेले में लोगों को प्रभावित करने के लिए सरकार की होर्डिंग्स लगी होती है।

संगम और प्रयागराज की राजनीति
हमने इस सिलसिले में बड़े हनुमान जी मंदिर में दर्शन करने आए एडवोकेट जय प्रकाश शुक्ला से बात की। उन्होंने कहा, “संगम में नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा लेकर आते हैं, अधिकतर बार उन्हें सफलता हाथ लग जाती है।” इसपर हमने पूछा, अगर एक ही विधानसभा के सभी प्रत्याशी आ जाएं तो क्या होगा? उन्होंने कहा, “अब तो कहानी पलट जाएगी, जिसकी श्रद्धा ज्यादा बेहतर होगी उसे कामयाबी मिलेगी।”

प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर में रोजाना 5 हजार से अधिक लोग आते हैं। यह प्रयागराज के मुख्य धार्मिक स्थानों में एक है।

प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर में रोजाना 5 हजार से अधिक लोग आते हैं। यह प्रयागराज के मुख्य धार्मिक स्थानों में एक है।

संगम घाट पर आजमगढ़ से आए विवेक तिवारी कहते हैं कि यहां लोग राजनीतिक मुद्दे लेकर नहीं आते। उन्होंने अगली ही लाइन में कहा, “लेकिन नेता यहां राजनीतिक फायदे के लिए जरूर आते हैं। इसका उन्हें फायदा भी मिलता है। प्रत्येक सीएम, डिप्टी सीएम हर छह महीने में यहां जरूर आता है। इसकी बड़ी वजह ‘धर्म का आदर’ करने का संदेश देने की है।”

धार्मिक नगरी 5 : अम्बेडकर नगर
अम्बेडकर नगर के किछौछा में मशहूर सूफी संत सैय्यद मखदूम अशरफ की दरगाह है। इसे किछौछा शरीफ दरगाह कहा जाता है। इस दरगाह की तरफ जाने वाले रास्ते पर काफी भीड़ रहती है। जो दिल्ली के चांदनी चौक की याद दिलाती है। ये गलियां चुनावी पोस्टरों से पटी पड़ी हैं। यहां सपा के पोस्टर और झंडे देखकर लगता है कि इस बार यहां साइकिल रफ्तार भरने वाली है।

सैय्यद मखदूम अशरफ की दरगाह पर हर रोज 2000 से ज्यादा लोग आते हैं। यहां की पांच विधानसभा सीटों पर छठे चरण में तीन मार्च को मतदान होगा।

सैय्यद मखदूम अशरफ की दरगाह पर हर रोज 2000 से ज्यादा लोग आते हैं। यहां की पांच विधानसभा सीटों पर छठे चरण में तीन मार्च को मतदान होगा।

45% मुस्लिम वोटर तय करेंगे पार्टियों की हार-जीत
ये दरगाह अम्बेडकर नगर के टांडा विधानसभा में आती है। यहां पर मुस्लिम वर्ग के 45% वोटर हैं। यहां रहने वाले मंजूर अहमद कहते हैं, “ यहां पर सपा और बसपा के बीच लड़ाई है। लेकिन अखिलेश सरकार में यहां बहुत काम हुआ है। इसलिए हमारा वोट सपा को ही जाएगा।”

दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग हर साल दीपावली में दीप जलाने आते हैं। यह स्थान हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है।

दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग हर साल दीपावली में दीप जलाने आते हैं। यह स्थान हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है।

सपा ने मस्जिदों के बारे में सोचा… हमारा वोट साइकिल को
किछौछा शरीफ दरगाह के पास होटल पर मिले नसीम ने बताया, “भाजपा मंदिरों के निर्माण में जिनता जोर लगाती है। उतना मस्जिद और दरगाह पर ध्यान नहीं देती है। 2017 में बीजेपी के आने के बाद महंगाई, रोजगार और शिक्षा की हालत खराब होती जा रही है। सपा के आने से इस क्षेत्र का विकास होगा।”

Hindi NewsLocalUttar pradeshThe People Of Gorakhpur Said They Will Be The Contractors Of Ram Temple, They Are Not Ours; But The Atmosphere Of BJP Is Hot In Banaras.2 घंटे पहलेलेखक: देवांशु तिवारीकॉपी लिंकवीडियोयूपी में छठे और सातवें चरण में धार्मिक नगरियों में वोटिंग होनी है। अयोध्या, मथुरा, प्रयागराज में चुनाव हो चुके हैं। अब काशी, गोरखपुर और मिर्जापुर की बारी है। वाराणसी में लोग काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद BJP का सपोर्ट कर रहे हैं तो गोरखपुर का चुनाव इंटरेस्टिंग हो गया है। यहां शहरी क्षेत्र में BJP की पकड़ मजबूत है, तो गांवों में साइकिल का बटन दबाने की बातें हो रही हैं।यूपी की पॉलिटिक्स पर धर्म कितना असर डालता है। यह जानने के लिए हम 5 शहरों में पहुंचे। कई मंदिर, मठों, धर्मशालाओं में घूम-घूमकर पुजारियों से बात की। हमने यहां के लोगों की समस्याएं और यहां उनके चुनावी मुद्दे जाने हैं। आइए एक-एक करके इन शहरों की यात्रा पर चलते हैं।धार्मिक नगरी 1: वाराणसी‌‌वाराणसी में सुबह के 5 बजे थे। मठों,मंदिरों से घंटों और वैदिक मंत्रोच्चार की आवाजें आ रही हैं। उधर दशाश्वमेध घाट पर गंगा में डुबकी लगाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। कुछ पंडे लोगों के माथे पर बिना पूछे चंदन लगाकर 10 रुपए मांग रहे हैं। दुकानों पर फ्री लॉकर, होटल बुकिंग के पोस्टरों के साथ सपा, भाजपा और कांग्रेस के चुनावी पर्चे भी चिपके दिखे। यहां हम पुराने वाराणसी की लगभग 35 से ज्यादा गलियों में चार घंटे तक घूमते रहे। कुल मिलाकर यहां BJP और सपा की सीधी टक्कर है। इसमें भाजपा सपा से 20 है।काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में छोटी-बड़ी 23 इमारतें और 27 मंदिर हैं। इस पूरे कॉरिडोर को लगभग 50,000 वर्ग मीटर के एक बड़े कैंपस में बनाया गया है। यहां अलग-अलग तरह की 5,000 लाइटें लगाई गई हैं। इसकी कुल लागत 900 करोड़ रुपए है।काशी विश्वनाथ कॉरिडोर दिलाएगा भाजपा को बहुमतवाराणसी के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बाहर प्रसाद की दुकान पर हमें वीरेंद्र सिंह मिल गए। उन्होंने बताया, ” 2014 से पीएम मोदी ने वाराणसी के लिए बहुत कुछ किया है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बनने के बाद यहां के लोगों को रोजगार मिल रहा है। दुनिया भर में वाराणसी का नाम रोशन हुआ है। BJP ‌वाराणसी की सभी विधानसभा सीटों पर प्रचंड बहुमत से जीतेगी। प्रदेश का आंकड़ा 350 पार होगा।’’संस्कृत पढ़ने वाले छात्रों को नहीं मिलती सरकारी स्कॉलरशिप…वाराणसी के केदारनाथ गोयनका वेद विद्यालय में हमें बच्चे मंत्रों का पाठ करते मिले। हाथ चलाते हुए इन बच्चों को संस्कृत के श्लोक पढ़ते देख काफी सुकून मिलता है। हमने यहां के आचार्य शेषनाथ तिवारी से बात की। उन्होंने बताया,” चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार दोनों ने ही संस्कृत विश्वविद्यालयों के बारे में नहीं सोचा। वाराणसी के छात्रों के लिए गुरुकुल परंपरा वाले छात्रावास की सुविधा बिल्कुल खत्म हो चुकी है। वैदिक शिक्षा लेने वाले बच्चों को सरकारी स्कॉलरशिप भी नहीं मिलती है। ”केदारनाथ गोयनका वेद विद्यालय के आचार्य शेषनाथ तिवारी। साथ में वैदिक शिक्षा लेने वाले छात्र।बीते पांच वर्षों में बंद हो गईं 100 से अधिक वैदिक पाठशालाएंआचार्य शेषनाथ आगे कहते हैं,”वाराणसी में वैदिक स्कूलों की हालत गिरती चली जा रही है। बीते 5 वर्षों में यहां 100 से अधिक वैदिक पाठशालाएं धन के अभाव और महामारी के कारण बंद हो चुकी हैं। संस्कृत विश्वविद्यालयों को अगर सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलता है, तो इन वैदिक स्कूलों का आर्थिक विकास हो पाएगा।”धर्म किसी एक व्यक्ति या पार्टी विशेष का नहींरविदास गेट इलाके के पास अस्सी गली में श्री राधव मंदिर अखाड़ा गूदड़ दास मठ है। यहां के महंत रामदास ने बताया,” आजकल की राजनीतिक पार्टियां धर्म के नाम पर वोट मांगती हैं। मैं इसके सख्त खिलाफ हूं। धर्म किसी एक व्यक्ति या पार्टी विशेष का नहीं है। यह तो सभी के लिए है। कई पार्टियां इसे अपने फायदे के लिए चुनाव में मुद्दा बनाती हैं। यह ठीक बात नहीं है।”वाराणसी के वैदिक स्कूलों से पढ़कर लोगों ने पाई तरक्कीआचार्य महेश द्विवेदी कहते हैं कि वाराणसी में गुरुकुल पंरपरा में आने वाले आवासीय छात्रावास कम होते जा रहे हैं। इससे छात्रों को यहां रहकर पढ़ाई करने में परेशानी हो रही है।आचार्य संस्कृत ब्रम्ह विद्या महाविद्यालय में व्याकरण के आचार्य महेश द्विवेदी बताते हैं, “ देश में जितने भी अखाड़े हैं, उनमें बड़े-बड़े महामंडलेश्वर और महाराज लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से ही पढ़कर निकले हैं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी और BHU में व्याकरण विभाग के अध्यक्ष राम नारायण द्विवेदी भी गुरुकुल परंपरा से पढ़कर आज बड़े पद पर पहुंचे हैं।’’धार्मिक नगरी 2: गोरखपुर5 साल पहले जहां से निकलकर एक महंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। लोगों ने कहा कि उस वक्त से ही यूपी में धर्म की राजनीति ने और जोर पकड़ लिया। साल 2022 के इस चुनावी माहौल में गोरखपुर में जगह-जगह बस एक की नारा सुनाई दे रहा है, “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे।”लेकिन जब हमने धर्म और राजनीति पर यहां के लोगों से बात की तो इसका एक दूसरा ही पहलू हमारे सामने आया…कहीं नहीं गए थे राम, जो हम उनको लाएंगेमंदिर बनवा दिए इसका मतलब ये नहीं की हर हिन्दू बीजेपी को ही वोट देगा।धर्म की राजनीति के सवाल पर प्रतीक कहते है, BJP सरकार हमेशा “जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे” का नारा लगाकर प्रचार करती रहती है। लेकिन इस बार हम उनसे कहना चाहते हैं कि “कहीं नहीं गए थे राम, जो हम उनको लाएंगे।”उन्होंने कहा, अब धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद करें। क्योंकि राम मंदिर के ठेकेदार, हिन्दुओं के ठेकेदार नहीं हो गए हैं। इसलिए जरूरी नहीं कि राम मंदिर बनवा दिया है तो हर हिंदू BJP को ही वोट देगा।वहीं शिव मंदिर में दर्शन करने आए लोग कहते हैं, “पूजा करना या धर्म को मानना गलत नहीं है। जब तक योगी जी सांसद थे उससे हिंदुत्व को फायदा ही हुआ है। लेकिन उनके CM बनने के बाद धर्म की गन्दी राजनीति बढ़ गई है।”हमारा एक ही धर्म होना चाहिए, मानवताचुनाव जीतने के लिए ही राम मंदिर बनवाया गया है।यूपी में जब भी चुनाव होता है, हिंदू-मुसलमान चाइना-पाकिस्तान, यही सब होने लगता है। BJP के पास इसके अलावा और कोई ही मुद्दा नहीं हैं। अगर कोई राजनीति में आता है तो उसे धर्म और जाति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए।मंदिर के बाहर एक शादीशुदा कपल ने हमें बताया कि, BJP को चुनाव में फायदा हो इसलिए ही राम मंदिर बनवाया गया है। गोरखपुर में धर्म की राजनीति बहुत होती है। लेकिन इस बार पढ़े-लिखे लोग मंदिर के नाम पर वोट नहीं देंगे।युवाओं ने कहा बांटने की राजनीति पूरे देश में चल रही हैयुवाओं ने कहा, “धर्म नहीं रोजगार होना चाहिए मुद्दा”।गोरखपुर में पढ़ाई कर रहे अनिकेत यादव ने कहा, “चुनाव जब आता है, बहार लेकर आता है। पुरानी भर्ती पता नहीं, नई हजार लेकर आता है।”यही हाल है यूपी का। चुनाव जब आते हैं तो धर्म दिखता है, रोजगार कहीं नहीं दिखता। लेकिन युवाओं को रोजगार चाहिए। राजनीति से हम धर्म को अलग नहीं कर सकते हैं। लेकिन धर्म सत्ता में नहीं मन की संतुष्टि के लिए होना चाहिए।वहीं शुभम मिश्रा और वशिष्ट कनौजिया कहते हैं कि यूपी में बांटने वाली राजनीति हर जगह हो रही है। ये गलत है। यह मौका हम लोगों ने ही सरकार को दिया है। हमें धर्म के नाम पर वोट नहीं करना चाहिए। अपने विधायक के काम को देखकर वोट करना होगा। तभी हम राजनीति और आस्था दोनों में सफल हो पाएंगे।धर्म नगरी 3: चित्रकूटभगवान राम ने यहां 11 वर्ष, 11 महीने और 11 दिन बिताए थे। हम भी यहां के चुनावी हाल-चाल जानने के लिए यहां पहुंचे थे। यहां राम घाट है जो मंदाकिनी नदी के तट पर बना है। यहां मौजूद महंत जयराम दास ने बताया, “भगवान राम यहीं स्नान किया करते थे। फिर दिन का वक्त कामतानाथ पर्वत पर बिताया करते थे। जहां उनके भरत जी से मिलने के दौरान के पदचिन्ह बने हुए हैं।’’रामायण कल में कामद गिरि से 2 किलोमीटर दूर इस चट्टान पर राम और सीता विश्राम किया करते थे।यहां राम शैया नाम का विशाल पत्थर है। यहां रामायण काल में राम और सीता विश्राम करते थे। हम एक-एक करके इन सभी जगहों से गुजरे और लोगों से चुनावी माहौल जाना…जिसमें लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं वो मंदाकिनी नदी गंदी हैरामघाट से कामतानाथ पर्वत की तरफ बढ़े तो माइक देख कर सीताराम गुप्ता और कन्हैया लाल अग्रवाल ने हमें रोक लिया। उन्होंने कहा, “मंदाकिनी गंदी है। इसकी सफाई का काम नहीं होता है। देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालु इसी नदी में डुबकी लगाते हैं। यहां की सड़कें भी खराब हैं।” हमने पूछा कौन जीत रहा है तो बोले, “भाजपा-सपा में मामला फंस गया है।कोई भी जीत सकता है। यहां कांग्रेस गायब है। ”मंदाकिनी नदी किनारे राम घाट, शाम की आरती का सुंदर नजारा।वोट मांगने वाले नेता गरीबों को नहीं दिला पाए पक्की छतकामतानाथ पर्वत पहुंचे तो प्रसाद की दुकानें दिखीं। यहीं अपनी झोपड़ी में फूल माला की दुकान लगाए बैठे बुजुर्ग ने कहा, “यहां मंत्री-मिनिस्टर परिक्रमा करने आते हैं। वोट भी मांगते हैं। लेकिन पक्का मकान देने की बात नहीं करते। मैं और तुम्हारी दाई इसी कच्ची झोपड़ी में 70 साल से रह रहे हैं।”भाजपा ने परिक्रमा मार्ग को चमका दिया… यहां कमल खिलेगायोगी सरकार की तारीफ करते हुए दो बाबा, कामदगिरि परिक्रमा मार्ग में भीख मांगते हैं।हम 5 किमी की परिक्रमा का एक तिहाई हिस्सा पूरा कर चुके थे। लगभग डेढ़ किमी का रास्ता बचा था। आगे काले कपड़े पहने हुए दो बाबा मिले। उन्होंने बताया, “योगी-मोदी की सरकार आने वाली है। पहले यहां परिक्रमा का रास्ता सही नहीं था, अब बाबा ने सब चकाचक कर दिया है। पहले परिक्रमा करने वालों को धूप-बारिश झेलनी पड़ती थी, अब पूरे रास्ते पर टीन शेड लगा दिए गए हैं। इसका फायदा भाजपा को मिलेगा और यहां कमल खिलेगा।”धार्मिक नगरी 4 : प्रयागराजप्रयागराज का संगम न सिर्फ धार्मिक रूप से अति महत्वपूर्ण है बल्कि राजनीतिक रूप से भी इसका उतना ही महत्व है। 2019 के चुनाव से ठीक पहले अर्धकुंभ आयोजित हुआ। पीएम नरेंद्र मोदी आए और उन्होंने सफाई कर्मियों को कुर्सी पर बैठाकर उनका पैर धोया। उस क्षण ने न सिर्फ यहां के बल्कि पूरे देश के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया था। अर्धकुंभ को महाकुंभ की तरह आयोजित करवाकर यूपी सरकार ने भी जनता के बीच एक मजबूत संदेश दिया।संगम तट पर हर साल होने वाले माघ मेले में लगभग 3 करोड़ लोग आते हैं।यूपी चुनाव में संगम की भूमिकायोगी सरकार ने 2019 में भव्य कुंभ-दिव्य कुंभ का आयोजन किया। अरबों रुपए लगाए गए। जो आया देखता रह गया। न सिर्फ संगम बल्कि पूरे शहर का काया पलट हो गया। नतीजा यह हुआ कि लोग सरकार से खुश हो गए। हर साल माघ मेला का आयोजन होता रहा है। पूरे मेले में लोगों को प्रभावित करने के लिए सरकार की होर्डिंग्स लगी होती है।संगम और प्रयागराज की राजनीतिहमने इस सिलसिले में बड़े हनुमान जी मंदिर में दर्शन करने आए एडवोकेट जय प्रकाश शुक्ला से बात की। उन्होंने कहा, “संगम में नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा लेकर आते हैं, अधिकतर बार उन्हें सफलता हाथ लग जाती है।” इसपर हमने पूछा, अगर एक ही विधानसभा के सभी प्रत्याशी आ जाएं तो क्या होगा? उन्होंने कहा, “अब तो कहानी पलट जाएगी, जिसकी श्रद्धा ज्यादा बेहतर होगी उसे कामयाबी मिलेगी।”प्रयागराज के बड़े हनुमान मंदिर में रोजाना 5 हजार से अधिक लोग आते हैं। यह प्रयागराज के मुख्य धार्मिक स्थानों में एक है।संगम घाट पर आजमगढ़ से आए विवेक तिवारी कहते हैं कि यहां लोग राजनीतिक मुद्दे लेकर नहीं आते। उन्होंने अगली ही लाइन में कहा, “लेकिन नेता यहां राजनीतिक फायदे के लिए जरूर आते हैं। इसका उन्हें फायदा भी मिलता है। प्रत्येक सीएम, डिप्टी सीएम हर छह महीने में यहां जरूर आता है। इसकी बड़ी वजह ‘धर्म का आदर’ करने का संदेश देने की है।”धार्मिक नगरी 5 : अम्बेडकर नगरअम्बेडकर नगर के किछौछा में मशहूर सूफी संत सैय्यद मखदूम अशरफ की दरगाह है। इसे किछौछा शरीफ दरगाह कहा जाता है। इस दरगाह की तरफ जाने वाले रास्ते पर काफी भीड़ रहती है। जो दिल्ली के चांदनी चौक की याद दिलाती है। ये गलियां चुनावी पोस्टरों से पटी पड़ी हैं। यहां सपा के पोस्टर और झंडे देखकर लगता है कि इस बार यहां साइकिल रफ्तार भरने वाली है।सैय्यद मखदूम अशरफ की दरगाह पर हर रोज 2000 से ज्यादा लोग आते हैं। यहां की पांच विधानसभा सीटों पर छठे चरण में तीन मार्च को मतदान होगा।45% मुस्लिम वोटर तय करेंगे पार्टियों की हार-जीतये दरगाह अम्बेडकर नगर के टांडा विधानसभा में आती है। यहां पर मुस्लिम वर्ग के 45% वोटर हैं। यहां रहने वाले मंजूर अहमद कहते हैं, “ यहां पर सपा और बसपा के बीच लड़ाई है। लेकिन अखिलेश सरकार में यहां बहुत काम हुआ है। इसलिए हमारा वोट सपा को ही जाएगा।”दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग हर साल दीपावली में दीप जलाने आते हैं। यह स्थान हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है।सपा ने मस्जिदों के बारे में सोचा… हमारा वोट साइकिल कोकिछौछा शरीफ दरगाह के पास होटल पर मिले नसीम ने बताया, “भाजपा मंदिरों के निर्माण में जिनता जोर लगाती है। उतना मस्जिद और दरगाह पर ध्यान नहीं देती है। 2017 में बीजेपी के आने के बाद महंगाई, रोजगार और शिक्षा की हालत खराब होती जा रही है। सपा के आने से इस क्षेत्र का विकास होगा।”

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