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13 मिनट पहलेलेखक: राजेश साहू
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13 सितंबर 1992, गाजियाबाद के भंगेल रोड पर लगा रेलवे फाटक गिरा था। पूर्व विधायक महेंद्र सिंह भाटी की गाड़ी फाटक के एकदम पास खड़ी थी। तभी पीछे से एक गाड़ी आई। हथियार लेकर चार लोग उतरे और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। महेंद्र सिंह और उनके साथ बैठे उदय प्रकाश की हत्या कर दी गई।
सीबीआई ने जांच शुरू की। 15 फरवरी 2015 को डीपी यादव को दोषी मानते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। ठीक 6 साल बाद 10 नवंबर, 2021 को नैनीताल हाईकोर्ट ने फैसला पलटा और डीपी को बाइज्जत बरी कर दिया। ये डीपी यादव कोई मामूली व्यक्ति नहीं बल्कि वो बाहुबली हैं जो घर से दूध बेचने निकले थे और देश के सबसे बड़े शराब माफिया बन गए। पार्टियों ने बुला-बुलाकर विधायक-सांसद और मंत्री बनाया। लेकिन इस बार नामांकन भरने के बाद भी पर्चा वापस ले लिया। आज के बाहुबली में बताते हैं कि धर्मपाल यादव उर्फ डीपी यादव की पूरी कहानी…लेकिन इससे पहले इस मुद्दे पर नीचे दिए सर्वे में हिस्सा ले सकते हैं…
दूध बेचते-बेचते शराब माफिया बन गए
नोएडा सेक्टर 18 के पास ही शरफाबाद गांव है। 25 जुलाई 1948 को यहीं डीपी यादव पैदा हुए। 12 लोगों का परिवार था। मां-बाप के अलावा 7 भाई और 3 बहन। पिता जगदीश नगर में डेयरी चलाते थे। धर्मपाल उसी डेयरी से दूध लेकर साइकिल से दिल्ली में बेचने जाते थे। यहीं मुलाकात हो गई शराब कारोबारी बाबू किशन लाल से। यहीं से डीपी यादव ने दूध की टंकी बंधी साइकिल किनारे रखी और शराब कारोबार में लग गए।

डीपी अपने शुरुआती दिनों में दूध बेचते थे लेकिन कुछ दिनों बाद ही शराब कारोबार करने लगे।
कच्ची शराब पर लगते थे ब्रांडेड लेबल
राजस्थान के जोधपुर से कच्ची शराब आती और दिल्ली में उस पर ब्रांडेड का लेबल लग जाता। हरियाणा, यूपी और दिल्ली में इसकी सप्लाई होती। दूध बेचने वाले धर्मपाल यादव अमीर बन गए। कहते हैं यहीं से उन्होंने अपना नाम धर्मपाल यादव बताने के बजाय डीपी यादव बताना शुरू कर दिया। 1990 तक डीपी के पास अकूत संपत्ति हो गई। और माननीय बनने की इच्छा जाग गई।
1990 में शराब पीकर मर गए 350 लोग
1990 के शुरुआती दिनों की बात है। हरियाणा में डीपी के एक ठेके से शराब खरीदकर पीने वाले करीब 350 लोगों की मौत हो गई। राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक हड़कंप मच गया। जांच बैठा दी गई। हरियाणा पुलिस ने डीपी यादव को आरोपी बनाया और चार्जशीट दाखिल की। लोग बताते हैं कि इस वक्त तक डीपी यादव की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के बीच इतनी पहचान हो गई थी कि उन्हें इस मामले में कुछ नहीं हुआ।
कांग्रेस के जरिए राजनीति में एंट्री
हमने कहानी के शुरुआत में जिस महेंद्र सिंह भाटी की बात की है वह डीपी यादव के राजनीतिक गुरू थे। 80 के दशक में वह दादरी के विधायक थे। उन्होंने डीपी यादव को राजनीति समझाई और नेता बना दिया। हालांकि इसके पहले कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने डीपी को गाजियाबाद जिले का पिछड़ा वर्ग अध्यक्ष बना दिया था। लेकिन असली राजनीति तो महेंद्र सिंह भाटी ने सिखाई और डीपी को बिसरख से ब्लॉक प्रमुख बनवा दिया।

महेंद्र सिंह भाटी ने डीपी यादव को राजनीति सिखाई और बाद में उनकी हत्या का आरोप उन्हीं पर लगा। ये फोटो हमें चेतना मंच की वेबसाइट से मिला।
मुलायम सिंह को पड़ी डीपी की जरूरत
1989 में जनता दल से अलग होकर मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। उन्हें अच्छे नेताओं के साथ पैसे वाले लोगों की भी जरूरत थी। डीपी यादव इसके लिए सबसे उपयुक्त थे। वह सपा में आ गए। पार्टी ने उन्हें जनरल सेक्रेटरी बना दिया। 1992 में उनके राजनीतिक गुरू महेंद्र सिंह भाटी की हत्या हो गई। हत्या में डीपी का हाथ बताया गया। इसके बाद भी मुलायम सिंह ने उन्हें 1993 में टिकट दिया और वह बुलंदशहर से जीतकर विधायक बन गए।
सपा से मोह भंग हुआ और बसपा में चले गए
विधायक बनने के बाद डीपी यादव के अपराधों की लिस्ट लंबी होने लगी। एक के बाद एक नौ हत्याओं में डीपी का नाम आया। डकैती, अपहरण और वसूली के कई मामले दर्ज हुए। टाडा और गैंगस्टर एक्ट में नाम आ गया। कुल मुकदमों की संख्या 25 पहुंच गई। सपा बैकफुट पर चली गई। मुलायम सिंह यादव ने डीपी यादव से किनारा करना शुरू किया। डीपी को ये खराब लगा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी।

डीपी अलग-अलग मामलों में आरोपी बनाए गए, लेकिन हर बार जमानत पर बाहर आ जाते थे।
बसपा ने बुलाया और सांसद बना दिया
सपा से मोह भंग होने के बाद डीपी यादव ने बसपा का दामन थाम लिया। बसपा ने उन्हें 1996 में संभल सीट से लोकसभा चुनाव में उतारा। वह जीतकर पहली बार सांसद बन गए। दो साल बाद ही पार्टी से मोह भंग हो गया। 1998 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा सांसद बन गए। इसके लिए भाजपा ने उन्हें सपोर्ट किया था। डीपी सपा-बसपा के बाद अब भाजपा के खास होने लगे थे।
भाजपा ने किया स्वागत
विधायक और सांसद बनने के बाद डीपी ने अपनी इमेज पर काम करना शुरू किया। लोकसभा की वेबसाइट में उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार से बताया गया। राज्यसभा की वेबसाइट ने बताया कि डीपी नेशनल वालीबॉल और कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी रह चुके हैं। यहां तक कि उन्हें यादव समाज सुधार सभा का प्रमुख तक बताया गया। इन्हीं कारणों से उन्हें भाजपा ने खुलकर समर्थन किया और 2004 में उन्हें राज्यसभा के जरिए सांसद बना दिया लेकिन कुछ ही दिन बाद पार्टी से बाहर कर दिया।
नई पार्टी बना ली
डीपी यादव किसी भी पार्टी में अधिक वक्त तक नहीं टिके। इसकी बड़ी वजह उनका अधिकार बताया जाता है। यही कारण है कि जब वह सारी पार्टियों से माननीय बन चुके तो 2007 में खुद की ही एक पार्टी बना ली। नाम रखा राष्ट्रीय परिवर्तन दल। करीब एक दर्जन सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन जीत मिली सिर्फ दो सीटों पर। सहसवान सीट से खुद महज 109 वोट से जीते और बिसौली सीट पर उनकी पत्नी उमलेश यादव जीतने में सफल रही। 2011 में उनकी पत्नी उमलेश चुनावी खर्च के बारे में चुनाव आयोग को नहीं बता सकी तो उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई।
पत्नी से तलाक के बाद भी साथ रहते थे
एक प्रतिष्ठित वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक डीपी यादव और उनकी पत्नी उमलेश के बीच रिश्ते अच्छे नहीं रहे। उमलेश ने चुनाव आयोग में जो प्रमाण पत्र जमा किया था उसके मुताबिक 1989 में गाजियाबाद के सीजेएम कोर्ट में उनका और डीपी यादव का तलाक हो चुका है।
हार का जो सिलसिला शुरु हुआ वो खत्म नहीं हुआ
2009 में डीपी बसपा में शामिल हुए और बदायूं सीट पर मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 2012 में बसपा छोड़ दी। सपा में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव के पास पहुंचे। अखिलेश ने पार्टी में लेने से मना कर दिया। उन्होंने अपनी पार्टी से कई सीटों पर प्रत्याशी उतार दिए लेकिन सभी हार गए। 2014 में अमित शाह के साथ एक मंच पर दिखे तो कयास लगने लगा कि भाजपा में जाएंगे लेकिन भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल नहीं किया। वह संभल सीट पर अपनी पार्टी के टिकट से लड़े लेकिन जीत नहीं सके।

2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक ही मंच पर डीपी यादव और अमित शाह साथ नजर आए थे।
2015 में उम्रकैद की सजा
महेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने 15 फरवरी 2015 को डीपी यादव को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। फैसले के वक्त डीपी देहरादून की जेल में बंद थे। डीपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए नैनीताल हाईकोर्ट में सीबीआई के फैसले को चुनौती दी। 6 साल बाद 10 नवंबर 2021 को हाईकोर्ट ने डीपी को बाइज्जत बरी कर दिया।
सपा को मान लिया अपना दुश्मन
डीपी यादव पहली बार 1993 में सपा के कारण ही विधायक बने लेकिन 20 साल बाद उसी सपा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझ लिया। उन्होंने अपने साले भारत सिंह की बीवी पूनम यादव को उस बदायूं जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया जहां के सांसद सपा के धर्मेंद्र यादव थे। यहीं की गुन्नौर सीट पर मुलायम सिंह विधायक थे। सपा सरकार में पूनम के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। चुनाव हुआ तो पूनम की तरफ 41 वोट पड़े और सपा की तरफ महज 17 वोट मिले। सपा से दुश्मनी की आलम ये रहा कि वह मुलायम सिंह यादव और रामगोपाल यादव के खिलाफ चुनाव लड़ गए लेकिन दोनों बार हार मिली।
बेटी के प्रेमी की हत्या में आया नाम
डीपी की बेटी भारती नीतीश कटारा नाम के एक लड़के से प्यार करती थी। वह शादी करना चाहती थी। गाजियाबाद में परिवार के ही एक शादी फंक्शन में भारती और नीतीश साथ खड़े होकर बात कर रहे थे। डीपी यादव के बेटे विकास ने ये देख लिया। 17 फरवरी 2002 को नीतीश की अधजली लाश पुलिस को मिली। पुलिस ने जांच शुरू की। विकास के साथ विशाल और सुखदेव पहलवान को गिरफ्तार कर लिया। 6 साल केस चला। नीतीश की मां नीलम कटारा को धमकियां मिली, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। 30 मई 2008 को विशाल, विकास और सुखदेव को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई।
दो साल पहले जेल में बंद डीपी का एक इंटरव्यू आया था। आपराधिक घटनाओं से संबंध पर सवाल पूछने पर उन्होंने इसके लिए समाज और परिस्थितियों को जिम्मेदार बता दिया। कहा, ‘जिंदगी में ज्यों-ज्यों नौजवानी पनपी, त्यों-त्यों समाज मेरे नाम के साथ दबंग-दूधिया, बाहुबली, भू-माफिया, शराब माफिया जैसे शब्द जोड़ता चला गया। आंख के अंधे लोगों को एक ठेठ गरीब किसान का बेटा धर्मपाल कभी नजर ही नहीं आया।’

सहसवान सीट पर डीपी और उमलेश ने पर्चा वापस ले लिया। कुणाल यादव ने चुनाव लड़ा है।
फिलहाल धरमपाल उर्फ डीपी यादव और उनकी पत्नी उमलेश यादव चुनाव मैदान में नहीं हैं। दोनों ने ही सहसवान सीट पर 25 जनवरी को नामांकन जमा किया था, लेकिन 1 फरवरी को पर्चा वापस ले लिया। बेटे कुणाल यादव को अपनी पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव मैदान में उतारा। 14 फरवरी को यहां 57.52% वोट पड़े। अब देखना ये होगा कि डीपी यादव के शुरुआती दिनों की तरह बेटा जीत हासिल करता है या अभी संघर्ष करना पड़ेगा। इसके लिए 10 मार्च तक इंतजार करना पड़ेगा।
13 मिनट पहलेलेखक: राजेश साहूकॉपी लिंक13 सितंबर 1992, गाजियाबाद के भंगेल रोड पर लगा रेलवे फाटक गिरा था। पूर्व विधायक महेंद्र सिंह भाटी की गाड़ी फाटक के एकदम पास खड़ी थी। तभी पीछे से एक गाड़ी आई। हथियार लेकर चार लोग उतरे और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। महेंद्र सिंह और उनके साथ बैठे उदय प्रकाश की हत्या कर दी गई।सीबीआई ने जांच शुरू की। 15 फरवरी 2015 को डीपी यादव को दोषी मानते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। ठीक 6 साल बाद 10 नवंबर, 2021 को नैनीताल हाईकोर्ट ने फैसला पलटा और डीपी को बाइज्जत बरी कर दिया। ये डीपी यादव कोई मामूली व्यक्ति नहीं बल्कि वो बाहुबली हैं जो घर से दूध बेचने निकले थे और देश के सबसे बड़े शराब माफिया बन गए। पार्टियों ने बुला-बुलाकर विधायक-सांसद और मंत्री बनाया। लेकिन इस बार नामांकन भरने के बाद भी पर्चा वापस ले लिया। आज के बाहुबली में बताते हैं कि धर्मपाल यादव उर्फ डीपी यादव की पूरी कहानी…लेकिन इससे पहले इस मुद्दे पर नीचे दिए सर्वे में हिस्सा ले सकते हैं…दूध बेचते-बेचते शराब माफिया बन गएनोएडा सेक्टर 18 के पास ही शरफाबाद गांव है। 25 जुलाई 1948 को यहीं डीपी यादव पैदा हुए। 12 लोगों का परिवार था। मां-बाप के अलावा 7 भाई और 3 बहन। पिता जगदीश नगर में डेयरी चलाते थे। धर्मपाल उसी डेयरी से दूध लेकर साइकिल से दिल्ली में बेचने जाते थे। यहीं मुलाकात हो गई शराब कारोबारी बाबू किशन लाल से। यहीं से डीपी यादव ने दूध की टंकी बंधी साइकिल किनारे रखी और शराब कारोबार में लग गए।डीपी अपने शुरुआती दिनों में दूध बेचते थे लेकिन कुछ दिनों बाद ही शराब कारोबार करने लगे।कच्ची शराब पर लगते थे ब्रांडेड लेबलराजस्थान के जोधपुर से कच्ची शराब आती और दिल्ली में उस पर ब्रांडेड का लेबल लग जाता। हरियाणा, यूपी और दिल्ली में इसकी सप्लाई होती। दूध बेचने वाले धर्मपाल यादव अमीर बन गए। कहते हैं यहीं से उन्होंने अपना नाम धर्मपाल यादव बताने के बजाय डीपी यादव बताना शुरू कर दिया। 1990 तक डीपी के पास अकूत संपत्ति हो गई। और माननीय बनने की इच्छा जाग गई।1990 में शराब पीकर मर गए 350 लोग1990 के शुरुआती दिनों की बात है। हरियाणा में डीपी के एक ठेके से शराब खरीदकर पीने वाले करीब 350 लोगों की मौत हो गई। राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक हड़कंप मच गया। जांच बैठा दी गई। हरियाणा पुलिस ने डीपी यादव को आरोपी बनाया और चार्जशीट दाखिल की। लोग बताते हैं कि इस वक्त तक डीपी यादव की राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के बीच इतनी पहचान हो गई थी कि उन्हें इस मामले में कुछ नहीं हुआ।कांग्रेस के जरिए राजनीति में एंट्रीहमने कहानी के शुरुआत में जिस महेंद्र सिंह भाटी की बात की है वह डीपी यादव के राजनीतिक गुरू थे। 80 के दशक में वह दादरी के विधायक थे। उन्होंने डीपी यादव को राजनीति समझाई और नेता बना दिया। हालांकि इसके पहले कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने डीपी को गाजियाबाद जिले का पिछड़ा वर्ग अध्यक्ष बना दिया था। लेकिन असली राजनीति तो महेंद्र सिंह भाटी ने सिखाई और डीपी को बिसरख से ब्लॉक प्रमुख बनवा दिया।महेंद्र सिंह भाटी ने डीपी यादव को राजनीति सिखाई और बाद में उनकी हत्या का आरोप उन्हीं पर लगा। ये फोटो हमें चेतना मंच की वेबसाइट से मिला।मुलायम सिंह को पड़ी डीपी की जरूरत1989 में जनता दल से अलग होकर मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई। उन्हें अच्छे नेताओं के साथ पैसे वाले लोगों की भी जरूरत थी। डीपी यादव इसके लिए सबसे उपयुक्त थे। वह सपा में आ गए। पार्टी ने उन्हें जनरल सेक्रेटरी बना दिया। 1992 में उनके राजनीतिक गुरू महेंद्र सिंह भाटी की हत्या हो गई। हत्या में डीपी का हाथ बताया गया। इसके बाद भी मुलायम सिंह ने उन्हें 1993 में टिकट दिया और वह बुलंदशहर से जीतकर विधायक बन गए।सपा से मोह भंग हुआ और बसपा में चले गएविधायक बनने के बाद डीपी यादव के अपराधों की लिस्ट लंबी होने लगी। एक के बाद एक नौ हत्याओं में डीपी का नाम आया। डकैती, अपहरण और वसूली के कई मामले दर्ज हुए। टाडा और गैंगस्टर एक्ट में नाम आ गया। कुल मुकदमों की संख्या 25 पहुंच गई। सपा बैकफुट पर चली गई। मुलायम सिंह यादव ने डीपी यादव से किनारा करना शुरू किया। डीपी को ये खराब लगा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी।डीपी अलग-अलग मामलों में आरोपी बनाए गए, लेकिन हर बार जमानत पर बाहर आ जाते थे।बसपा ने बुलाया और सांसद बना दियासपा से मोह भंग होने के बाद डीपी यादव ने बसपा का दामन थाम लिया। बसपा ने उन्हें 1996 में संभल सीट से लोकसभा चुनाव में उतारा। वह जीतकर पहली बार सांसद बन गए। दो साल बाद ही पार्टी से मोह भंग हो गया। 1998 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा सांसद बन गए। इसके लिए भाजपा ने उन्हें सपोर्ट किया था। डीपी सपा-बसपा के बाद अब भाजपा के खास होने लगे थे।भाजपा ने किया स्वागतविधायक और सांसद बनने के बाद डीपी ने अपनी इमेज पर काम करना शुरू किया। लोकसभा की वेबसाइट में उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार से बताया गया। राज्यसभा की वेबसाइट ने बताया कि डीपी नेशनल वालीबॉल और कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी रह चुके हैं। यहां तक कि उन्हें यादव समाज सुधार सभा का प्रमुख तक बताया गया। इन्हीं कारणों से उन्हें भाजपा ने खुलकर समर्थन किया और 2004 में उन्हें राज्यसभा के जरिए सांसद बना दिया लेकिन कुछ ही दिन बाद पार्टी से बाहर कर दिया।नई पार्टी बना लीडीपी यादव किसी भी पार्टी में अधिक वक्त तक नहीं टिके। इसकी बड़ी वजह उनका अधिकार बताया जाता है। यही कारण है कि जब वह सारी पार्टियों से माननीय बन चुके तो 2007 में खुद की ही एक पार्टी बना ली। नाम रखा राष्ट्रीय परिवर्तन दल। करीब एक दर्जन सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन जीत मिली सिर्फ दो सीटों पर। सहसवान सीट से खुद महज 109 वोट से जीते और बिसौली सीट पर उनकी पत्नी उमलेश यादव जीतने में सफल रही। 2011 में उनकी पत्नी उमलेश चुनावी खर्च के बारे में चुनाव आयोग को नहीं बता सकी तो उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई।पत्नी से तलाक के बाद भी साथ रहते थेएक प्रतिष्ठित वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक डीपी यादव और उनकी पत्नी उमलेश के बीच रिश्ते अच्छे नहीं रहे। उमलेश ने चुनाव आयोग में जो प्रमाण पत्र जमा किया था उसके मुताबिक 1989 में गाजियाबाद के सीजेएम कोर्ट में उनका और डीपी यादव का तलाक हो चुका है।हार का जो सिलसिला शुरु हुआ वो खत्म नहीं हुआ2009 में डीपी बसपा में शामिल हुए और बदायूं सीट पर मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 2012 में बसपा छोड़ दी। सपा में शामिल होने के लिए अखिलेश यादव के पास पहुंचे। अखिलेश ने पार्टी में लेने से मना कर दिया। उन्होंने अपनी पार्टी से कई सीटों पर प्रत्याशी उतार दिए लेकिन सभी हार गए। 2014 में अमित शाह के साथ एक मंच पर दिखे तो कयास लगने लगा कि भाजपा में जाएंगे लेकिन भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल नहीं किया। वह संभल सीट पर अपनी पार्टी के टिकट से लड़े लेकिन जीत नहीं सके।2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक ही मंच पर डीपी यादव और अमित शाह साथ नजर आए थे।2015 में उम्रकैद की सजामहेंद्र सिंह भाटी हत्याकांड के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने 15 फरवरी 2015 को डीपी यादव को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। फैसले के वक्त डीपी देहरादून की जेल में बंद थे। डीपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए नैनीताल हाईकोर्ट में सीबीआई के फैसले को चुनौती दी। 6 साल बाद 10 नवंबर 2021 को हाईकोर्ट ने डीपी को बाइज्जत बरी कर दिया।सपा को मान लिया अपना दुश्मनडीपी यादव पहली बार 1993 में सपा के कारण ही विधायक बने लेकिन 20 साल बाद उसी सपा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझ लिया। उन्होंने अपने साले भारत सिंह की बीवी पूनम यादव को उस बदायूं जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया जहां के सांसद सपा के धर्मेंद्र यादव थे। यहीं की गुन्नौर सीट पर मुलायम सिंह विधायक थे। सपा सरकार में पूनम के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। चुनाव हुआ तो पूनम की तरफ 41 वोट पड़े और सपा की तरफ महज 17 वोट मिले। सपा से दुश्मनी की आलम ये रहा कि वह मुलायम सिंह यादव और रामगोपाल यादव के खिलाफ चुनाव लड़ गए लेकिन दोनों बार हार मिली।बेटी के प्रेमी की हत्या में आया नामडीपी की बेटी भारती नीतीश कटारा नाम के एक लड़के से प्यार करती थी। वह शादी करना चाहती थी। गाजियाबाद में परिवार के ही एक शादी फंक्शन में भारती और नीतीश साथ खड़े होकर बात कर रहे थे। डीपी यादव के बेटे विकास ने ये देख लिया। 17 फरवरी 2002 को नीतीश की अधजली लाश पुलिस को मिली। पुलिस ने जांच शुरू की। विकास के साथ विशाल और सुखदेव पहलवान को गिरफ्तार कर लिया। 6 साल केस चला। नीतीश की मां नीलम कटारा को धमकियां मिली, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। 30 मई 2008 को विशाल, विकास और सुखदेव को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई।दो साल पहले जेल में बंद डीपी का एक इंटरव्यू आया था। आपराधिक घटनाओं से संबंध पर सवाल पूछने पर उन्होंने इसके लिए समाज और परिस्थितियों को जिम्मेदार बता दिया। कहा, ‘जिंदगी में ज्यों-ज्यों नौजवानी पनपी, त्यों-त्यों समाज मेरे नाम के साथ दबंग-दूधिया, बाहुबली, भू-माफिया, शराब माफिया जैसे शब्द जोड़ता चला गया। आंख के अंधे लोगों को एक ठेठ गरीब किसान का बेटा धर्मपाल कभी नजर ही नहीं आया।’सहसवान सीट पर डीपी और उमलेश ने पर्चा वापस ले लिया। कुणाल यादव ने चुनाव लड़ा है।फिलहाल धरमपाल उर्फ डीपी यादव और उनकी पत्नी उमलेश यादव चुनाव मैदान में नहीं हैं। दोनों ने ही सहसवान सीट पर 25 जनवरी को नामांकन जमा किया था, लेकिन 1 फरवरी को पर्चा वापस ले लिया। बेटे कुणाल यादव को अपनी पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव मैदान में उतारा। 14 फरवरी को यहां 57.52% वोट पड़े। अब देखना ये होगा कि डीपी यादव के शुरुआती दिनों की तरह बेटा जीत हासिल करता है या अभी संघर्ष करना पड़ेगा। इसके लिए 10 मार्च तक इंतजार करना पड़ेगा।