प्रत्यक्ष की जीवंतता
मेरे एक मित्र अक्सर बगल वाली दुकान पर लगे रंजन पेन के बोर्ड को देखते ही कहते हैं कि मैं तो लिखना ही भूल गया हूं। हेमंत कुमार पारीक उस छोटे से बाजार में किताबों की पहले दस-बारह गुमटियां हुआ करती थीं। अब वहां मात्र एक पुस्तक विक्रेता बचा है- लल्लू। यह पुस्तैनी धंधा है…Continue Reading