भारतीय बच्चे दिल की बीमारी के शिकार:बच्चे गर्भ से ही बन रहे दिल के मरीज; एक्सपर्ट से जानें इसकी वजह, लक्षण और बचाव के तरीके

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2 घंटे पहलेलेखक: आयुषी गोस्वामी

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देश में नवजात और छोटे बच्चों में जन्मजात बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में से एक बीमारी है कॉन्‍जेनिटल हार्ट डिसीज (CHD)। जब बच्चे को गर्भ में ही दिल से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं, तब उसे CHD का मरीज माना जाता है।

आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 2 लाख बच्चे CHD के साथ पैदा होते हैं। इलाज की बात करें तो AIIMS के अनुसार, उत्तर भारत में 17%, दक्षिण भारत में 72% और उत्तर पूर्वी भारत में 0% बच्चों को ही उपचार मिल पाता है।

CHD के लक्षण, रिस्क फैक्टर्स और बचाव के तरीके जानने के लिए हमने मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम के सीनियर कंसल्टेंट- पीडियाट्रिक्स कार्डियोलॉजी डॉ अमित मिसरी से बात की।

सवाल: CHD के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?

जवाब: डायबिटीज, प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले संक्रमण, एक्सरे रेडिएशन और प्रेग्नेंसी के वक्त गलत दवाओं का इस्तेमाल CHD के कुछ रिस्क फैक्टर्स हैं। इनके अलावा यदि गर्भवती महिला को स्मोकिंग और शराब की लत लगी है, तो वह बच्चे के दिल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। CHD आनुवंशिक बीमारी भी हो सकती है।

सवाल: समय पर CHD का इलाज न होने से बच्चा कैसे प्रभावित हो सकता है?

जवाब: CHD का सही वक्त पर इलाज न हो तो बच्चे को सांस संबंधित परेशानियां हो सकती हैं। इसके साथ ही वजन न बढ़ना भी CHD का एक कॉम्प्लिकेशन है। इस बीमारी के कारण बच्चों के विकास पर भी असर पड़ता है। CHD के मरीजों के दिल की धड़कन कभी तेज तो कभी धीमी चलती है। उन्हें दिल में खून के थक्के जमने का भी खतरा होता है।

CHD का असर बच्चों की फिजिकल हेल्थ के साथ-साथ मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है। उन्हें लगातार मूड स्विंग्स होते हैं। शारीरिक विकास न होने की वजह से वो इनसिक्योरिटी के शिकार हो जाते हैं।

सवाल: CHD से बचाव के क्या तरीके हैं?

जवाब: CHD की कोई सटीक वजह न होने के कारण इससे बचना मुश्किल हो जाता है। फिर भी कुछ तरीके हमारी मदद कर सकते हैं।

  • प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले रूबेला की वैक्सीन लगवाएं।
  • डायबिटीज और मिर्गी जैसी बीमारियों को कंट्रोल करें।
  • प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर की सलाह पर ही कोई दवा लें।
  • स्मोकिंग और शराब से बचें।
  • रेडिएशन की चपेट में न आएं।
  • प्रेग्नेंसी प्लान करने के 2-3 महीने पहले से फोलिक एसिड युक्त मल्टीविटामिन का सेवन करना शुरू कर दें। इससे बच्चे को न्यूट्रिएंट्स की कमी नहीं होगी।

Hindi NewsHappylifeHeart Patients Becoming Children From The Womb; Learn From Experts Its Causes, Symptoms And Methods Of Prevention2 घंटे पहलेलेखक: आयुषी गोस्वामीकॉपी लिंकदेश में नवजात और छोटे बच्चों में जन्मजात बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इन्हीं में से एक बीमारी है कॉन्‍जेनिटल हार्ट डिसीज (CHD)। जब बच्चे को गर्भ में ही दिल से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं, तब उसे CHD का मरीज माना जाता है।आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 2 लाख बच्चे CHD के साथ पैदा होते हैं। इलाज की बात करें तो AIIMS के अनुसार, उत्तर भारत में 17%, दक्षिण भारत में 72% और उत्तर पूर्वी भारत में 0% बच्चों को ही उपचार मिल पाता है।CHD के लक्षण, रिस्क फैक्टर्स और बचाव के तरीके जानने के लिए हमने मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम के सीनियर कंसल्टेंट- पीडियाट्रिक्स कार्डियोलॉजी डॉ अमित मिसरी से बात की।सवाल: CHD के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?जवाब: डायबिटीज, प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले संक्रमण, एक्सरे रेडिएशन और प्रेग्नेंसी के वक्त गलत दवाओं का इस्तेमाल CHD के कुछ रिस्क फैक्टर्स हैं। इनके अलावा यदि गर्भवती महिला को स्मोकिंग और शराब की लत लगी है, तो वह बच्चे के दिल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। CHD आनुवंशिक बीमारी भी हो सकती है।सवाल: समय पर CHD का इलाज न होने से बच्चा कैसे प्रभावित हो सकता है?जवाब: CHD का सही वक्त पर इलाज न हो तो बच्चे को सांस संबंधित परेशानियां हो सकती हैं। इसके साथ ही वजन न बढ़ना भी CHD का एक कॉम्प्लिकेशन है। इस बीमारी के कारण बच्चों के विकास पर भी असर पड़ता है। CHD के मरीजों के दिल की धड़कन कभी तेज तो कभी धीमी चलती है। उन्हें दिल में खून के थक्के जमने का भी खतरा होता है।CHD का असर बच्चों की फिजिकल हेल्थ के साथ-साथ मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है। उन्हें लगातार मूड स्विंग्स होते हैं। शारीरिक विकास न होने की वजह से वो इनसिक्योरिटी के शिकार हो जाते हैं।सवाल: CHD से बचाव के क्या तरीके हैं?जवाब: CHD की कोई सटीक वजह न होने के कारण इससे बचना मुश्किल हो जाता है। फिर भी कुछ तरीके हमारी मदद कर सकते हैं।प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले रूबेला की वैक्सीन लगवाएं।डायबिटीज और मिर्गी जैसी बीमारियों को कंट्रोल करें।प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर की सलाह पर ही कोई दवा लें।स्मोकिंग और शराब से बचें।रेडिएशन की चपेट में न आएं।प्रेग्नेंसी प्लान करने के 2-3 महीने पहले से फोलिक एसिड युक्त मल्टीविटामिन का सेवन करना शुरू कर दें। इससे बच्चे को न्यूट्रिएंट्स की कमी नहीं होगी।

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