महिला की सुध

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उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी का नया नारा है ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के साथ कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान किया है।

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी का नया नारा है ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के साथ कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान किया है। यानी कुल 403 विधानसभा सीटों में से 161 पर कांग्रेस की महिला उम्मीदवार नजर आएंगी। आखिर कांग्रेस का चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने के पीछे तर्क क्या है?

उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अगर नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट बताती है कि 2017 में महिलाओं के प्रति अपराध के 56011 मामले दर्ज थे, जबकि 2019 में इनकी संख्या बढ़ कर 59853 हो गई। प्रियंका गांधी ने इसे बहुत अच्छी तरह से समझने की कोशिश की है। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और अन्य पार्टियों में महिलाओं को कोई खास तवज्जो नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों की नाराज महिला नेत्रियां कांग्रेस के पाले में जा सकती हैं। उत्तर प्रदेश में इस समय 14.66 करोड़ कुल मतदाताओं में से महिला वोटरों की संख्या 6.70 करोड़ है, पर इस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा में केवल चालीस महिला विधायक हैं।

कांग्रेस में इस वक्त कोई मजबूत महिला नेता नहीं है। वर्तमान में उसके पास विधानसभा में एकमात्र महिला विधायक है। प्रियंका गांधी के बयान से यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की चालीस फीसद सीटों पर अपराध की शिकार महिलाओं को उम्मीदवार बनाने की कोशिश करेंगी। पर यह तो बाद में पता चलेगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में महिला सशक्तीकरण की क्या नई इबारत लिखी जाएगी।

जो कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महिला हितों की पैरवी कर रही है, अगर उसी में महिला जिम्मेदारी की संख्या पर नजर डालें, तो कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्षों की सूची में हरियाणा की कुमारी शैलजा के अलावा आपको किसी भी राज्य के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में कोई महिला नजर नहीं आएगी। कुछेक राज्यों में वर्किंग प्रेसिडेंट के रूप में इक्का-दुक्का महिलाएं ही काम कर रही हैं। युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में शायद ही कोई महिला है। कांग्रेस के चुनाव प्राधिकरण के पांच सदस्यों में से केवल एक महिला सदस्य को रखा गया है और कांग्रेस की कोर ग्रुप समिति के सात सदस्यों में एक भी महिला नहीं है। राज्य स्तर पर प्रियंका गांधी की सोच अगर बहुत अच्छी है, तो राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सोच इतनी अलग क्यों है?

आखिर प्रियंका गांधी ने महज उत्तर प्रदेश में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान क्यों किया? उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में भी चुनाव होने वाले हैं। प्रियंका गांधी इन राज्यों पर कोई विशेष ध्यान क्यों नहीं देना चाहती हैं? क्या वे इन राज्यों की महिलाओं के लिए नहीं सोच रही हैं? अगर प्रियंका गांधी को महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक नई तस्वीर बनानी है, तो उन्हें हर राज्य में चालीस फीसद महिला उम्मीदवार उतारने का ऐलान करना चाहिए।
’निखिल कुमार सिंह, जौनपुर, उप्र

आंदोलन में भटकाव

प्रारंभिक दौर में किसान आंदोलन का उद्देश्य और राह सही होने से सरकार, मीडिया और जनता की सहानूभुति और समर्थन मिला। केंद्र सरकार ने वार्ता के माध्यम से हल निकालने का भरसक प्रयास किया, किंतु इसमें सियासी मकसद आने से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगा। आम रास्ते जाम होने, हिंसा तथा नाजायज गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को और लखीमपुर घटना पर उप्र शासन को भी फटकार लगाई।

अदालत, प्रशासन और विशेषज्ञों आदि की किसानों द्वारा तथा किसानों की सरकार द्वारा अनसुनी से आंदोलन खतरनाक मोड़ पर जा सकता है। किसान और सरकार से ऊपर देश है और देश को खतरे और बदनामी से बचाने, सियासी तथा उपद्रवी लोगों को दूर रखने के लिए किसान और सरकार को मिल कर हल खोजना होगा, ताकि भटका हुआ आंदोलन शीघ्र समाप्त हो सके।
’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, तराना, उज्जैन

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी का नया नारा है ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के साथ कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान किया है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी का नया नारा है ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के साथ कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान किया है। यानी कुल 403 विधानसभा सीटों में से 161 पर कांग्रेस की महिला उम्मीदवार नजर आएंगी। आखिर कांग्रेस का चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने के पीछे तर्क क्या है? उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध पर अगर नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट बताती है कि 2017 में महिलाओं के प्रति अपराध के 56011 मामले दर्ज थे, जबकि 2019 में इनकी संख्या बढ़ कर 59853 हो गई। प्रियंका गांधी ने इसे बहुत अच्छी तरह से समझने की कोशिश की है। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और अन्य पार्टियों में महिलाओं को कोई खास तवज्जो नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों की नाराज महिला नेत्रियां कांग्रेस के पाले में जा सकती हैं। उत्तर प्रदेश में इस समय 14.66 करोड़ कुल मतदाताओं में से महिला वोटरों की संख्या 6.70 करोड़ है, पर इस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा में केवल चालीस महिला विधायक हैं। कांग्रेस में इस वक्त कोई मजबूत महिला नेता नहीं है। वर्तमान में उसके पास विधानसभा में एकमात्र महिला विधायक है। प्रियंका गांधी के बयान से यह आशय निकाला जा सकता है कि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की चालीस फीसद सीटों पर अपराध की शिकार महिलाओं को उम्मीदवार बनाने की कोशिश करेंगी। पर यह तो बाद में पता चलेगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में महिला सशक्तीकरण की क्या नई इबारत लिखी जाएगी। जो कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महिला हितों की पैरवी कर रही है, अगर उसी में महिला जिम्मेदारी की संख्या पर नजर डालें, तो कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्षों की सूची में हरियाणा की कुमारी शैलजा के अलावा आपको किसी भी राज्य के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में कोई महिला नजर नहीं आएगी। कुछेक राज्यों में वर्किंग प्रेसिडेंट के रूप में इक्का-दुक्का महिलाएं ही काम कर रही हैं। युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में शायद ही कोई महिला है। कांग्रेस के चुनाव प्राधिकरण के पांच सदस्यों में से केवल एक महिला सदस्य को रखा गया है और कांग्रेस की कोर ग्रुप समिति के सात सदस्यों में एक भी महिला नहीं है। राज्य स्तर पर प्रियंका गांधी की सोच अगर बहुत अच्छी है, तो राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सोच इतनी अलग क्यों है? आखिर प्रियंका गांधी ने महज उत्तर प्रदेश में चालीस फीसद महिला उम्मीदवारों को उतारने का ऐलान क्यों किया? उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में भी चुनाव होने वाले हैं। प्रियंका गांधी इन राज्यों पर कोई विशेष ध्यान क्यों नहीं देना चाहती हैं? क्या वे इन राज्यों की महिलाओं के लिए नहीं सोच रही हैं? अगर प्रियंका गांधी को महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक नई तस्वीर बनानी है, तो उन्हें हर राज्य में चालीस फीसद महिला उम्मीदवार उतारने का ऐलान करना चाहिए।’निखिल कुमार सिंह, जौनपुर, उप्र आंदोलन में भटकाव प्रारंभिक दौर में किसान आंदोलन का उद्देश्य और राह सही होने से सरकार, मीडिया और जनता की सहानूभुति और समर्थन मिला। केंद्र सरकार ने वार्ता के माध्यम से हल निकालने का भरसक प्रयास किया, किंतु इसमें सियासी मकसद आने से आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगा। आम रास्ते जाम होने, हिंसा तथा नाजायज गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को और लखीमपुर घटना पर उप्र शासन को भी फटकार लगाई। अदालत, प्रशासन और विशेषज्ञों आदि की किसानों द्वारा तथा किसानों की सरकार द्वारा अनसुनी से आंदोलन खतरनाक मोड़ पर जा सकता है। किसान और सरकार से ऊपर देश है और देश को खतरे और बदनामी से बचाने, सियासी तथा उपद्रवी लोगों को दूर रखने के लिए किसान और सरकार को मिल कर हल खोजना होगा, ताकि भटका हुआ आंदोलन शीघ्र समाप्त हो सके।’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, तराना, उज्जैन

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