मृत्यु दंड के लिए अपराध की घृणित प्रकृति ही एकमात्र आधार नहीं हो सकती – सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने 98 पेज के फैसले में कहा कि इस मामले की तरह अपराध को अंजाम देने की जघन्य प्रकृति निश्चित रूप से गंभीर तथ्यों को उजागर करती है और अंतरात्मा को झकझोरता भी है।

देश की सर्वोच्च अदालत कई बार अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रही है। इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने सात साल की बच्ची से हैवानियत कर हत्या करने के एक दोषी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर हर जगह चर्चा हो रही है। हालांकि, अदालत ने सजा में बदलाव को लेकर कई कारण भी दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की मौत सजा को आजीवन कारावास में बदलने के पीछे कारण देते हुए बताया कि “मृत्यु दंड के लिए अपराध की घृणित प्रकृति ही एकमात्र आधार नहीं हो सकती है।” इसके अलावा यह भी नहीं कहा जा सकता है कि दोषी के पुनर्वास या सुधरने की कोई संभावना नहीं है।

मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि देखा जाए तो दोषी की पृष्ठभूमि आपराधिक नहीं है, सामाजिक तौर पर भी वह निम्न आर्थिक श्रेणी से आता है। उसके परिवार में पत्नी, बच्चे और बूढ़े पिता हैं और जेल के अंदर भी उसका आचरण बेदाग रहा है।

अदालत ने कहा कि जब सभी बातों को एक साथ रखा जाता है और यह कल्पना की जाती है कि दोषी के सुधरने या पुनर्वास की संभावना को खारिज करने के लिए रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है। ऐसे में इस केस को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ मामला‘ भी माना जाना सही नहीं है। इसके बाद कोर्ट ने दोषी के सभी अपराधों को बरकरार रखते हुए सजा में बदलाव कर दिया।

हालांकि, पीठ ने सजा के बदलाव में सशर्त कहा है कि दोषी को 30 साल की सजा भुगतने से पहले किसी भी तरह की रिहाई या छूट नहीं दी जाएगी। पीठ ने यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के अक्टूबर 2017 के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनाया था। वहीं, हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के द्वारा 2016 में सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। उस समय आरोपी को धारा 376, 302, 201 आईपीसी और धारा 5/6 पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी पाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, दोषी साल 2015 में अंजाम दिए गए अपराध के वक्त 33 साल का था। ऐसे में केस से जुड़ी सभी बातों को ध्यान में रखते हुए धारा – 302 के तहत न्यूनतम 30 वर्ष का वास्तविक कारावास देते हुए दोषी को उम्रकैद की सजा देना न्यायोचित होगा।

बता दें कि, साल 2015 में दोषी शख्स बहला-फुसलाकर एक सात साल बच्ची को सूनसान जगह पर ले गया था। फिर बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर शव को घसीटकर नदी के पुल के पास फेंक दिया था। बाद में पकड़े जाने पर उसकी निशानदेही पर शव को बरामद कर लिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 98 पेज के फैसले में कहा कि इस मामले की तरह अपराध को अंजाम देने की जघन्य प्रकृति निश्चित रूप से गंभीर तथ्यों को उजागर करती है और अंतरात्मा को झकझोरता भी है। देश की सर्वोच्च अदालत कई बार अपने फैसलों को लेकर चर्चा में रही है। इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने सात साल की बच्ची से हैवानियत कर हत्या करने के एक दोषी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर हर जगह चर्चा हो रही है। हालांकि, अदालत ने सजा में बदलाव को लेकर कई कारण भी दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की मौत सजा को आजीवन कारावास में बदलने के पीछे कारण देते हुए बताया कि “मृत्यु दंड के लिए अपराध की घृणित प्रकृति ही एकमात्र आधार नहीं हो सकती है।” इसके अलावा यह भी नहीं कहा जा सकता है कि दोषी के पुनर्वास या सुधरने की कोई संभावना नहीं है। मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस ए.एम. खानविलकर, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि देखा जाए तो दोषी की पृष्ठभूमि आपराधिक नहीं है, सामाजिक तौर पर भी वह निम्न आर्थिक श्रेणी से आता है। उसके परिवार में पत्नी, बच्चे और बूढ़े पिता हैं और जेल के अंदर भी उसका आचरण बेदाग रहा है। अदालत ने कहा कि जब सभी बातों को एक साथ रखा जाता है और यह कल्पना की जाती है कि दोषी के सुधरने या पुनर्वास की संभावना को खारिज करने के लिए रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है। ऐसे में इस केस को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ मामला‘ भी माना जाना सही नहीं है। इसके बाद कोर्ट ने दोषी के सभी अपराधों को बरकरार रखते हुए सजा में बदलाव कर दिया। हालांकि, पीठ ने सजा के बदलाव में सशर्त कहा है कि दोषी को 30 साल की सजा भुगतने से पहले किसी भी तरह की रिहाई या छूट नहीं दी जाएगी। पीठ ने यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के अक्टूबर 2017 के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनाया था। वहीं, हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के द्वारा 2016 में सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। उस समय आरोपी को धारा 376, 302, 201 आईपीसी और धारा 5/6 पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी पाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, दोषी साल 2015 में अंजाम दिए गए अपराध के वक्त 33 साल का था। ऐसे में केस से जुड़ी सभी बातों को ध्यान में रखते हुए धारा – 302 के तहत न्यूनतम 30 वर्ष का वास्तविक कारावास देते हुए दोषी को उम्रकैद की सजा देना न्यायोचित होगा। बता दें कि, साल 2015 में दोषी शख्स बहला-फुसलाकर एक सात साल बच्ची को सूनसान जगह पर ले गया था। फिर बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर शव को घसीटकर नदी के पुल के पास फेंक दिया था। बाद में पकड़े जाने पर उसकी निशानदेही पर शव को बरामद कर लिया गया था।

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