शिक्षा का लोकतंत्र

शिक्षा का लोकतंत्र

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हम सबके अपने-अपने अनुभव रहे होंगे कि सबसे ज्यादा सवाल बच्चे करते हैं।

हम सबके अपने-अपने अनुभव रहे होंगे कि सबसे ज्यादा सवाल बच्चे करते हैं, क्योंकि बच्चों के पास चीजों को जानने की ज्यादा जिज्ञासा होती है! स्कूल के संदर्भ में सवाल उठता है कि क्या हमारी स्कूल व्यवस्था इन बच्चों की गहरी जिज्ञासा को बढ़ावा देती है या फिर कुचल देती है! एक बहुत खूबसूरत किस्सा जो मशहूर खगोल वैज्ञानिक फ्रेड हायल ने अपनी आत्मकथा में लिखा। जब हायल प्राथमिक स्कूल में थे तो उनके अध्यापक ने छात्रों को बताया कि एक विशेष प्रकार के फूल में पांच पत्तियां होती हैं! जिज्ञासापूर्ण फ्रेड ने इन फूलों को ढूंढ़ कर तथ्यों को परखना चाहा! अधिकतर फूलों की पांच पत्तियां थीं, लेकिन एक में छह पत्तियां थीं।

उसने इस तथ्य की ओर अध्यापक का ध्यान आकर्षित किया। अगर चार पत्तियां होतीं तो कहा जा सकता था कि एक गिर गई होगी, लेकिन एक अतिरिक्त पत्ती के लिए क्या दलील दी जा सकती थी? क्या पांच पत्तियों का नियम गलत है?- फ्रेड ने पूछा! अध्यापक को यह मंजूर नहीं था कि कोई उससे ऐसे प्रश्न पूछे। अध्यापक ने तुरंत फ्रेड को एक-दो थप्पड़ रसीद कर दिए। लेकिन फ्रेड ने हथियार नहीं डाले। उसने दलील दी कि जायज सवाल का जवाब देने का यह कोई तरीका नहीं है और फिर अपनी मां से कह कर स्कूल बदल दिया! आज के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए तो कुछ अपवादों को छोड़ कर पढ़ाने के तौर-तरीकों में ज्यादा सुधार दिखाई नहीं देता है। पाठ्यक्रम पढ़ाने के वही पुराने ढर्रे आज भी बरकरार हैं। परीक्षाएं भी रटे-रटाए और बंधे हुए नियमों से ही प्रेरित होती हैं।

बहरहाल, रटना हमारे ज्ञान को शिथिल बना देता है। उसे एक ही स्थान पर खड़ा कर देता है। रचनात्मकता और मौलिकता को कमजोर कर देता है। इस व्यवस्था में सोचने के अवसर ही नहीं दिए जाते, बल्कि नया सिखाने के नाम पर बस्ते का बोझ और अधिक बढ़ा दिया जाता है। विषय-वस्तु को रटने और अधिकतम अंक लाने के दबाव के कारण जिज्ञासा पिछड़ जाती है। इस जिज्ञासा के पिछड़ने का मतलब है बच्चों के अंदर विद्यमान क्षमताओं का मरना। कई बार होता है कि बच्चे सवाल करना ही छोड़ देते हैं, क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था चुप्पी की संस्कृति का विकास कर देती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी यह चुप्पी की संस्कृति आमतौर पर देखी जा सकती है। इस चुप्पी की संस्कृति को कैसे तोड़ा जाए, ताकि छात्र-छत्राओं में वह विश्वास पैदा हो अपने शिक्षक के प्रति कि वह शिक्षक है, कोई थानेदार नहीं है और यह स्कूल है कोई फैक्ट्री नही!

कुछ सवालों पर हमें अवश्य विचार करना चाहिए। क्या हम विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? क्या वे अपने सवालों के जवाब स्वयं ढूंढ सकते हैं? जिस प्रकार लुका-छिपी के खेल में किसी को तलाशने में मजा आता है, इसी प्रकार सवालों के जवाब तलाशना और पाना भी रटने से कहीं अधिक आनंददायक हो सकता है! हमें एक कोशिश करने की जरूरत है जहां हम बच्चों को ‘लोकतांत्रिक शैक्षिक वातावरण’ उपलब्ध करा सकें और चुप्पी की संस्कृति को तोड़ कर बिना किसी भय के सवाल पूछने की जिज्ञासा को उत्पन्न कर सकें।

  • सौरभ कांत, न्यू कोंडली, नई दिल्ली

हम सबके अपने-अपने अनुभव रहे होंगे कि सबसे ज्यादा सवाल बच्चे करते हैं। हम सबके अपने-अपने अनुभव रहे होंगे कि सबसे ज्यादा सवाल बच्चे करते हैं, क्योंकि बच्चों के पास चीजों को जानने की ज्यादा जिज्ञासा होती है! स्कूल के संदर्भ में सवाल उठता है कि क्या हमारी स्कूल व्यवस्था इन बच्चों की गहरी जिज्ञासा को बढ़ावा देती है या फिर कुचल देती है! एक बहुत खूबसूरत किस्सा जो मशहूर खगोल वैज्ञानिक फ्रेड हायल ने अपनी आत्मकथा में लिखा। जब हायल प्राथमिक स्कूल में थे तो उनके अध्यापक ने छात्रों को बताया कि एक विशेष प्रकार के फूल में पांच पत्तियां होती हैं! जिज्ञासापूर्ण फ्रेड ने इन फूलों को ढूंढ़ कर तथ्यों को परखना चाहा! अधिकतर फूलों की पांच पत्तियां थीं, लेकिन एक में छह पत्तियां थीं। उसने इस तथ्य की ओर अध्यापक का ध्यान आकर्षित किया। अगर चार पत्तियां होतीं तो कहा जा सकता था कि एक गिर गई होगी, लेकिन एक अतिरिक्त पत्ती के लिए क्या दलील दी जा सकती थी? क्या पांच पत्तियों का नियम गलत है?- फ्रेड ने पूछा! अध्यापक को यह मंजूर नहीं था कि कोई उससे ऐसे प्रश्न पूछे। अध्यापक ने तुरंत फ्रेड को एक-दो थप्पड़ रसीद कर दिए। लेकिन फ्रेड ने हथियार नहीं डाले। उसने दलील दी कि जायज सवाल का जवाब देने का यह कोई तरीका नहीं है और फिर अपनी मां से कह कर स्कूल बदल दिया! आज के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए तो कुछ अपवादों को छोड़ कर पढ़ाने के तौर-तरीकों में ज्यादा सुधार दिखाई नहीं देता है। पाठ्यक्रम पढ़ाने के वही पुराने ढर्रे आज भी बरकरार हैं। परीक्षाएं भी रटे-रटाए और बंधे हुए नियमों से ही प्रेरित होती हैं। बहरहाल, रटना हमारे ज्ञान को शिथिल बना देता है। उसे एक ही स्थान पर खड़ा कर देता है। रचनात्मकता और मौलिकता को कमजोर कर देता है। इस व्यवस्था में सोचने के अवसर ही नहीं दिए जाते, बल्कि नया सिखाने के नाम पर बस्ते का बोझ और अधिक बढ़ा दिया जाता है। विषय-वस्तु को रटने और अधिकतम अंक लाने के दबाव के कारण जिज्ञासा पिछड़ जाती है। इस जिज्ञासा के पिछड़ने का मतलब है बच्चों के अंदर विद्यमान क्षमताओं का मरना। कई बार होता है कि बच्चे सवाल करना ही छोड़ देते हैं, क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था चुप्पी की संस्कृति का विकास कर देती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी यह चुप्पी की संस्कृति आमतौर पर देखी जा सकती है। इस चुप्पी की संस्कृति को कैसे तोड़ा जाए, ताकि छात्र-छत्राओं में वह विश्वास पैदा हो अपने शिक्षक के प्रति कि वह शिक्षक है, कोई थानेदार नहीं है और यह स्कूल है कोई फैक्ट्री नही! कुछ सवालों पर हमें अवश्य विचार करना चाहिए। क्या हम विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? क्या वे अपने सवालों के जवाब स्वयं ढूंढ सकते हैं? जिस प्रकार लुका-छिपी के खेल में किसी को तलाशने में मजा आता है, इसी प्रकार सवालों के जवाब तलाशना और पाना भी रटने से कहीं अधिक आनंददायक हो सकता है! हमें एक कोशिश करने की जरूरत है जहां हम बच्चों को ‘लोकतांत्रिक शैक्षिक वातावरण’ उपलब्ध करा सकें और चुप्पी की संस्कृति को तोड़ कर बिना किसी भय के सवाल पूछने की जिज्ञासा को उत्पन्न कर सकें। सौरभ कांत, न्यू कोंडली, नई दिल्ली

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