सपा-रालोद गठबंधन का पूरा जोर रोजी-रोटी और खेत-खलिहान पर

सपा-रालोद गठबंधन का पूरा जोर रोजी-रोटी और खेत-खलिहान पर

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल सपा-रालोद गठबंधन जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ रहा है और उसका पूरा ध्यान बुनियादी समस्याओं पर केंद्रित है।

सुरेंद्र सिंघल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल सपा-रालोद गठबंधन जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ रहा है और उसका पूरा ध्यान बुनियादी समस्याओं पर केंद्रित है। सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एमएलसी एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन एक-दूसरे की जरूरत है और अखिलेश यादव ने गठबंधन के साथ ही जयंत चौधरी के प्रति पूरी उदारता और सम्मान प्रदर्शित किया है। जाटों का वोट हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने कई उम्मीदवारों को रालोद का चुनाव चिन्ह नल आवंटित किया है।

भाजपा के बड़े नेताओं स्वामी प्रसाद मौर्य, डा. धर्म सिंह सैनी आदि पिछड़ी जातियों के बड़े नेताओं को सपा में शामिल कराकर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के इस महत्त्वपूर्ण चुनाव में पिछड़ी जातियों की गोलबंदी को मुख्य मुद्दा बना दिया है। पिछले चुनावों में भाजपा को गैर यादव, पिछड़ी जातियों की एकमुश्त समर्थन हासिल हुआ था और भाजपा सहयोगी दलों के साथ सवा तीन सौ का रेकार्ड आंकड़ा छू गई थी। अखिलेश यादव के करीबी राजेंद्र चौधरी का कहना है कि सत्तारूढ़ दल का फोकस ध्रुवीकरण की सियासत पर ज्यादा है। जबकि अखिलेश यादव जनता से जुड़े मुद्दों पर फोकस किए हुए हैं।

समाजवादी पार्टी ने इस बार पहले और दूसरे चरण के चुनाव से इमरान मसूद, माविया अली, कादिर राणा और अमीर आलम लोगों को टिकट से दूर रखा है। इमरान मसूद की उम्मीदवारी को लेकर अखिलेश पर जबरदस्त दबाव बनाया गया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। मुजफ्फरनगर का मशहूर कादिर राणा घराना भी सपा-रालोद की चुनावी सियासत से बाहर हो गया। मुजफ्फरनगर जिले में सपा-रालोद ने छह में से एक भी सीट पर मुसलिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। सपा के विधायक और कैराना के प्रत्याशी नाहिद हसन को पुलिस ने गैंगस्टर के एक मामले में जेल में डाल दिया।

पार्टी को एहतियात के तौर पर नाहिद हसन की बहन इकरा हसन को निर्दलीय नामांकन कराना पड़ा। इकरा हसन दिल्ली के श्रीराम कालेज और लंदन से पढ़ाई कर चुकी हैं। सामाजिक और राजनैतिक विश्लेषक और चार दशक तक पत्रकार रहे सतीश चंद गर्ग कहते हैं कि 1989 में मुसलिम कांग्रेस से हटा और बाद में सपा की तरफ चला गया। फिर सपा-बसपा में बंटता रहा। देवबंद के बदर आलम काजमी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में 143 सीटों पर मुसलिम अपना असर रखते हैं। दारूल उलूम देवबंद के अशरफ उस्मानी बताते हैं कि समाजवादी पार्टी ने 40 में से 12, बसपा ने 58 में से 16 और कांग्रेस ने 58 में 11 मुसलिमों को चुनाव मैदान में उतारा है।

सेंटर फार दि स्टेडी आफ डवलपिंग सोसायटी (सीएफडीएस) के अनुसार 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 41 फीसद वोट मिले थे। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसने 42.44 फीसद मत मिले थे। लोकसभा चुनाव 2019 में पूरे उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को 50 फीसद और लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 52 फीसद वोट मिले थे। कुलपति और पूर्व आइपीएस डा अशोक कुमार राघव कहते हैं कि अखिलेश यादव का पूरा जोर इस चुनाव में कर्मचारियों की पेंशन बहाली, विद्युत उपभोक्ताओं को 300 यूनिट मुफ्त बिजली, गन्ने का समय से भुगतान और सभी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जैसे जनपक्षीय मुद्दों पर है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल सपा-रालोद गठबंधन जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ रहा है और उसका पूरा ध्यान बुनियादी समस्याओं पर केंद्रित है। सुरेंद्र सिंघल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल सपा-रालोद गठबंधन जनता के मुद्दों पर चुनाव लड़ रहा है और उसका पूरा ध्यान बुनियादी समस्याओं पर केंद्रित है। सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एमएलसी एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन एक-दूसरे की जरूरत है और अखिलेश यादव ने गठबंधन के साथ ही जयंत चौधरी के प्रति पूरी उदारता और सम्मान प्रदर्शित किया है। जाटों का वोट हासिल करने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने कई उम्मीदवारों को रालोद का चुनाव चिन्ह नल आवंटित किया है। भाजपा के बड़े नेताओं स्वामी प्रसाद मौर्य, डा. धर्म सिंह सैनी आदि पिछड़ी जातियों के बड़े नेताओं को सपा में शामिल कराकर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के इस महत्त्वपूर्ण चुनाव में पिछड़ी जातियों की गोलबंदी को मुख्य मुद्दा बना दिया है। पिछले चुनावों में भाजपा को गैर यादव, पिछड़ी जातियों की एकमुश्त समर्थन हासिल हुआ था और भाजपा सहयोगी दलों के साथ सवा तीन सौ का रेकार्ड आंकड़ा छू गई थी। अखिलेश यादव के करीबी राजेंद्र चौधरी का कहना है कि सत्तारूढ़ दल का फोकस ध्रुवीकरण की सियासत पर ज्यादा है। जबकि अखिलेश यादव जनता से जुड़े मुद्दों पर फोकस किए हुए हैं। समाजवादी पार्टी ने इस बार पहले और दूसरे चरण के चुनाव से इमरान मसूद, माविया अली, कादिर राणा और अमीर आलम लोगों को टिकट से दूर रखा है। इमरान मसूद की उम्मीदवारी को लेकर अखिलेश पर जबरदस्त दबाव बनाया गया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। मुजफ्फरनगर का मशहूर कादिर राणा घराना भी सपा-रालोद की चुनावी सियासत से बाहर हो गया। मुजफ्फरनगर जिले में सपा-रालोद ने छह में से एक भी सीट पर मुसलिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। सपा के विधायक और कैराना के प्रत्याशी नाहिद हसन को पुलिस ने गैंगस्टर के एक मामले में जेल में डाल दिया। पार्टी को एहतियात के तौर पर नाहिद हसन की बहन इकरा हसन को निर्दलीय नामांकन कराना पड़ा। इकरा हसन दिल्ली के श्रीराम कालेज और लंदन से पढ़ाई कर चुकी हैं। सामाजिक और राजनैतिक विश्लेषक और चार दशक तक पत्रकार रहे सतीश चंद गर्ग कहते हैं कि 1989 में मुसलिम कांग्रेस से हटा और बाद में सपा की तरफ चला गया। फिर सपा-बसपा में बंटता रहा। देवबंद के बदर आलम काजमी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में 143 सीटों पर मुसलिम अपना असर रखते हैं। दारूल उलूम देवबंद के अशरफ उस्मानी बताते हैं कि समाजवादी पार्टी ने 40 में से 12, बसपा ने 58 में से 16 और कांग्रेस ने 58 में 11 मुसलिमों को चुनाव मैदान में उतारा है। सेंटर फार दि स्टेडी आफ डवलपिंग सोसायटी (सीएफडीएस) के अनुसार 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 41 फीसद वोट मिले थे। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसने 42.44 फीसद मत मिले थे। लोकसभा चुनाव 2019 में पूरे उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को 50 फीसद और लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 52 फीसद वोट मिले थे। कुलपति और पूर्व आइपीएस डा अशोक कुमार राघव कहते हैं कि अखिलेश यादव का पूरा जोर इस चुनाव में कर्मचारियों की पेंशन बहाली, विद्युत उपभोक्ताओं को 300 यूनिट मुफ्त बिजली, गन्ने का समय से भुगतान और सभी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद जैसे जनपक्षीय मुद्दों पर है।

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