सवाल सेहत का

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भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी किस बदतर हाल में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

देश को अगले दस साल में बड़ी संख्या में चिकित्सक मिलने का प्रधानमंत्री ने जो भरोसा दिलाया है, उससे यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वक्त में देश में चिकित्सकों की कमी दूर होगी और इससे स्वास्थ्य सेवाओं की दशा-दिशा दोनों में सुधार आएगा। साथ ही सरकार ने देश के हर जिले में एक मेडिकल कालेज खोलने की बात भी कही है। ये दोनों ही बातें कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

अगर इन दोनों ही बिंदुओं पर काम शुरू हो जाए तो देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है। देश के लिए यह ऐसी जरूरत है जिस पर वर्षों पहले काम शुरू हो जाना चाहिए था। लेकिन लगता है कि स्वास्थ्य जैसा विषय किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि आज देश का स्वास्थ्य क्षेत्र अगर बीमार है, तो उसके मूल में कहीं न कहीं सरकारों की ओर से होती रही उपेक्षा भी है। वरना क्यों आज भी स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का तीन फीसद भी नहीं है? जाहिर है, अगर देश को सेहतमंद बनाना है और नागरिकों को स्वस्थ रखना है तो पहले स्वास्थ्य क्षेत्र की सेहत सुधारनी होगी।

भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी किस बदतर हाल में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। चाहे चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी की बात हो या स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे की, किसी भी मामले में स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा हर नागरिक का अधिकार है और इसे उपलब्ध कराना हर सरकार का दायित्व। लेकिन सरकारें आज भी इस मोर्चे पर नाकाम ही नजर आती हैं।

अगर सरकारें स्वास्थ्य के मोर्चे पर सजग रहतीं, तो देश में चिकित्सा सुविधाएं इतनी बदतर हालत में नहीं होती। अगर महानगरों और बड़े शहरों को छोड़ दें, तो छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं किस हाल में हैं, यह आए दिन देखने-पढ़ने को मिलता रहता है। आज भी लोग कंधों पर या ठेलों पर मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए मजबूर हैं। कहने को सरकारी दस्तावेजों में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, सामुदायिक चिकित्सा केंद्र और जिला अस्पताल सब हैं। पर हकीकत यह है कि ज्यादातर प्राथमिक और सामुदायकि चिकित्सा केंद्रों में डाक्टर नहीं हैं, चिकित्साकर्मी नहीं हैं, दवाइयां और बिस्तर नहीं है। वरना क्यों नीति आयोग अपनी रिपोर्ट में यह कहता है कि उत्तर प्रदेश, बिहार या अन्य राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहाल हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में आबादी की तुलना में चिकित्सकों की भारी कमी है। डेढ़ हजार लोगों पर एक चिकित्सक का होना कम गंभीर बात नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त स्वास्थ्यकर्मी नहीं होंगे तो कैसे स्वास्थ्य सेवाएं चलेंगी? आज भी भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्धारित मानदंडों को हकीकत में पूरा नहीं करतीं।

पिछले साल नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने नीति आयोग को सौंपी एक रिपोर्ट में बताया था कि देश के ज्यादातर अस्पताल चिकित्सकों, विशेषज्ञों और नर्सिंग कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं और किसी भी आपात स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं हैं। यह रिपोर्ट अट्ठाईस राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के अस्पतालों के सर्वे के बाद तैयार की गई थी। पिछले दो साल में कोरोना महामारी ने भी हमें बताया है कि अगर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत नहीं होगा तो हम कैसे संकटों में फंस सकते हैं। भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां और बढ़ेंगी ही। ऐसे में अगर सरकारें अब भी नहीं चेतीं तो इसकी कीमत बीमार नागरिकों के रूप में देश को चुकानी पड़ेगी।

भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी किस बदतर हाल में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। देश को अगले दस साल में बड़ी संख्या में चिकित्सक मिलने का प्रधानमंत्री ने जो भरोसा दिलाया है, उससे यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वक्त में देश में चिकित्सकों की कमी दूर होगी और इससे स्वास्थ्य सेवाओं की दशा-दिशा दोनों में सुधार आएगा। साथ ही सरकार ने देश के हर जिले में एक मेडिकल कालेज खोलने की बात भी कही है। ये दोनों ही बातें कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। अगर इन दोनों ही बिंदुओं पर काम शुरू हो जाए तो देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है। देश के लिए यह ऐसी जरूरत है जिस पर वर्षों पहले काम शुरू हो जाना चाहिए था। लेकिन लगता है कि स्वास्थ्य जैसा विषय किसी सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि आज देश का स्वास्थ्य क्षेत्र अगर बीमार है, तो उसके मूल में कहीं न कहीं सरकारों की ओर से होती रही उपेक्षा भी है। वरना क्यों आज भी स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का तीन फीसद भी नहीं है? जाहिर है, अगर देश को सेहतमंद बनाना है और नागरिकों को स्वस्थ रखना है तो पहले स्वास्थ्य क्षेत्र की सेहत सुधारनी होगी। भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी किस बदतर हाल में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। चाहे चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी की बात हो या स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे की, किसी भी मामले में स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधा हर नागरिक का अधिकार है और इसे उपलब्ध कराना हर सरकार का दायित्व। लेकिन सरकारें आज भी इस मोर्चे पर नाकाम ही नजर आती हैं। अगर सरकारें स्वास्थ्य के मोर्चे पर सजग रहतीं, तो देश में चिकित्सा सुविधाएं इतनी बदतर हालत में नहीं होती। अगर महानगरों और बड़े शहरों को छोड़ दें, तो छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं किस हाल में हैं, यह आए दिन देखने-पढ़ने को मिलता रहता है। आज भी लोग कंधों पर या ठेलों पर मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए मजबूर हैं। कहने को सरकारी दस्तावेजों में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, सामुदायिक चिकित्सा केंद्र और जिला अस्पताल सब हैं। पर हकीकत यह है कि ज्यादातर प्राथमिक और सामुदायकि चिकित्सा केंद्रों में डाक्टर नहीं हैं, चिकित्साकर्मी नहीं हैं, दवाइयां और बिस्तर नहीं है। वरना क्यों नीति आयोग अपनी रिपोर्ट में यह कहता है कि उत्तर प्रदेश, बिहार या अन्य राज्यों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहाल हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में आबादी की तुलना में चिकित्सकों की भारी कमी है। डेढ़ हजार लोगों पर एक चिकित्सक का होना कम गंभीर बात नहीं है। अस्पतालों में पर्याप्त स्वास्थ्यकर्मी नहीं होंगे तो कैसे स्वास्थ्य सेवाएं चलेंगी? आज भी भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्धारित मानदंडों को हकीकत में पूरा नहीं करतीं। पिछले साल नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने नीति आयोग को सौंपी एक रिपोर्ट में बताया था कि देश के ज्यादातर अस्पताल चिकित्सकों, विशेषज्ञों और नर्सिंग कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं और किसी भी आपात स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं हैं। यह रिपोर्ट अट्ठाईस राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों के अस्पतालों के सर्वे के बाद तैयार की गई थी। पिछले दो साल में कोरोना महामारी ने भी हमें बताया है कि अगर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत नहीं होगा तो हम कैसे संकटों में फंस सकते हैं। भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां और बढ़ेंगी ही। ऐसे में अगर सरकारें अब भी नहीं चेतीं तो इसकी कीमत बीमार नागरिकों के रूप में देश को चुकानी पड़ेगी।

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