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मध्यप्रदेश5 घंटे पहले
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पाकिस्तान को परमाणु ताकत बनाने वाले साइंटिस्ट डॉ. अब्दुल कदीर खान का भोपाल से गहरा रिश्ता रहा है। उनक जन्म भोपाल में 1936 में एक साधारण परिवार में हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों की हुकूमत थी। मैट्रिक तक की पढ़ाई उन्होंने भोपाल में ही पूरी की थी। 1947 में विभाजन के बाद जब भारत आजाद हुआ तो खान अपने बड़े भाई-बहनों के साथ पाकिस्तान में बस गए। रविवार सुबह 85 साल की उम्र में डॉ. अब्दुल कदीर खान का पाकिस्तान में निधन हो गया। जानिए भोपाल से जुड़ी उनकी विरासत…
अब्दुल कदीर के भतीजे राष्ट्रीय हॉकी प्लेयर रहे आगा अब्दुल जब्बार खान ने बताया कि उनका परिवार अब भी भोपाल के गिन्नौरी इलाके में रहता है। आजादी के पहले वे संयुक्त परिवार में यहीं रहते थे। वे कहते हैं कि अब्दुल कदीर खान को पाकिस्तान जाने का अफसोस था। वे कहा करते थे कि मुझे हिंदुस्तान में कैरियर बनाना चाहिए था।
जब्बार के मुताबिक, अब्दुल कदीर के पिता अब्दुल गफ्फूर खान देश बंटवारे के विरोध में थे। उन्होंने भोपाल में ही रहने का फैसला लिया था। उनके 5 बेटे और 2 बेटियां थी। इसमें से 4 बेटे और 2 बेटियां पाकिस्तान चले गए थे। एक बेटा हफीज खान अपने पिता के साथ यहीं रह गए। वे नगर निगम में राजस्व निरीक्षक थे। 1995 में वे भी पाकिस्तान चले गए।

कदीर खान का भोपाल स्थित घर। हालांकि, इस मकान को दोबारा बनाया गया है।
पिता होशंगाबाद में हेडमास्टर थे
अब्दुल कदीर खान के पिता अब्दुल गफ्फूर होशंगाबाद में एक स्कूल में हेडमास्टर थे। उनके भाई हमीद खान और महबूब खान के परिवार ने भी भोपाल में ही रहने का फैसला लिया था। आगा अब्दुल जब्बार, हमीद खान के बेटे हैं।
जब्बार खान बताते हैं कि डाॅ. अब्दुल कदीर अक्सर कहा करते थे कि मैंने पाकिस्तान जाकर बहुत बड़ी गलती कर दी। मैं गलत आ गया इस मुल्क (पाकिस्तान) में। मुझे हिंदुस्तान में कैरियर बनाना चाहिए था। जब कभी भी उनका मैसेज, चिट्ठी आती थी, तब वह हमेशा भोपाल छोड़ने का अफसोस जताते थे। वह कहा करते थे कि दुनिया में हमारा भोपाल शहर सबसे खूबसूरत है। मुझे भोपाल में ही रहना था।
1972 में आखिरी बार भोपाल आए थे कदीर
जब्बार बताते हैं कि 1972 में वह आखिरी बार भोपाल आए। अब्दुल कदीर बहुत मिलनसार शख्स थे। हॉकी, पतंगबाजी के बहुत शौकीन थे। हम लोगों को वह गिन्नौरी स्कूल की छत में पतंगबाजी के लिए ले जाया करते थे। बचपन से उन्हें शायरी सुनने का बहुत शौक था। बचपन में हम दोनों एक ही घर में रहे। घर के पास ही उनके साथ खेला करते थे।
पिता बंटवारे को मानने को तैयार नहीं
जब्बार बताते हैं कि अब्दुल कदीर खान के पिता अब्दुल गफ्फूर खान ब्रिटिश हुकूमत के दौरान स्कूल में प्रिंसिपल रहे। वह होशंगाबाद से रिटायर हुए थे। उनके 7 बच्चों में कदीर खान सबसे छोटे बेटे थे। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद जब कदीर खान समेत उनके 5 बच्चे पाकिस्तान जाने लगे तो गफ्फूर ने विरोध किया। उन्होंने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया। बेटे-बेटियां उन पर पाकिस्तान चलने को लेकर काफी दबाव बना रहे थे। गफ्फूर खान ने कभी भी बंटवारे को नहीं माना। उनका मानना था कि देश का विभाजन गलत हुआ। कदीर के सभी भाई-बहनों की मौत हो चुकी है।
गिन्नौरी स्कूल, जहां कदीर ने प्राइमरी तक पढ़ाई की थी।
मैट्रिक तक भोपाल में पढ़े-लिखे
अब्दुल कदीर मैट्रिक तक भोपाल में पढ़े। घर के पास ही गिन्नौरी स्कूल में प्राइमरी शिक्षा हासिल की। इसके बाद जहांगीरिया स्कूल से 8वीं पास की थी। 11वीं की पढ़ाई हमीदिया हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की थी। मैट्रिक पास होने के बाद भोपाल से 1949 में पाकिस्तान चले गए।
दो बार पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज मिला
पेशे से इंजीनियर कदीर खान एक दशक से ज्यादा वक्त तक परमाणु बम बनाने की तकनीक, मिसाइल बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन, मिसाइल में लगने वाले उपकरण और पुर्जों के व्यापार में काम कर चुके हैं। उन्हें 1996 और 1999 में दो बार पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी नवाजा गया।
भोपाल में जन्मे कादिर खान का भारत से लेकर यूरोप तक का सफर
1960 में पाकिस्तान के कराची यूनिवर्सिटी से मेटालर्जी यानि धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद खान ने परमाणु इंजीनियरिंग से संबंधित और पढ़ाई करने के लिए पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स का रुख किया।
लेकिन, ये पाकिस्तान ही था जहां उन्हें काफी शोहरत हासिल हुई। कहा जाता था कि 1980 और 1990 के दशक में इस्लामाबाद के सबसे ताकतवर व्यक्ति डॉ. खान ही थे। स्कूलों की दीवारों पर उनकी तस्वीरें दिखती थीं, उनकी तस्वीरें सड़कों-गलियों में पोस्टरों पर दिखती थीं। उन्हें 1996 और 1999 में दो बार देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी नवाजा गया।
लेबोरेटरी में नौकरी से की शुरुआत
साल 1972 में उन्हें एम्सटर्डम में फिजिकल डायनमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में नौकरी मिली। कंपनी छोटी थी, लेकिन एक मल्टीनेशनल कंपनी यूरेन्को के साथ इसका करार था। बाद में परमाणु उपकरणों और ख़ुफिया जानकारी के बाजार की दुनिया में डॉ. खान के लिए उनका ये काम अहम रहा।
साल 1974 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, पाकिस्तान के ये इंजीनियर फिजिकल डायनमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में ही काम कर रहे थे। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में साल 2018 में छपे एक लेख में कहा गया था- इस घटना ने डॉ. खान के भीतर छिपे राष्ट्रवाद को एक तरह से चुनौती दी और पड़ोसी मुल्क से बराबरी करने में पाकिस्तान की मदद करने की कोशिश करने लगे। दिसंबर 1975 में एक दिन अचानक डॉ. खान और उनका परिवार हॉलैंड छोड़कर पाकिस्तान चला गया था।
Hindi NewsLocalMpThere Was Love From Bhopal; Nephew Abdul Jabbar Said He Regretted Going To Pakistan, He Used To Say I Should Have Made A Career In Indiaमध्यप्रदेश5 घंटे पहलेकॉपी लिंकवीडियोपाकिस्तान को परमाणु ताकत बनाने वाले साइंटिस्ट डॉ. अब्दुल कदीर खान का भोपाल से गहरा रिश्ता रहा है। उनक जन्म भोपाल में 1936 में एक साधारण परिवार में हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों की हुकूमत थी। मैट्रिक तक की पढ़ाई उन्होंने भोपाल में ही पूरी की थी। 1947 में विभाजन के बाद जब भारत आजाद हुआ तो खान अपने बड़े भाई-बहनों के साथ पाकिस्तान में बस गए। रविवार सुबह 85 साल की उम्र में डॉ. अब्दुल कदीर खान का पाकिस्तान में निधन हो गया। जानिए भोपाल से जुड़ी उनकी विरासत…अब्दुल कदीर के भतीजे राष्ट्रीय हॉकी प्लेयर रहे आगा अब्दुल जब्बार खान ने बताया कि उनका परिवार अब भी भोपाल के गिन्नौरी इलाके में रहता है। आजादी के पहले वे संयुक्त परिवार में यहीं रहते थे। वे कहते हैं कि अब्दुल कदीर खान को पाकिस्तान जाने का अफसोस था। वे कहा करते थे कि मुझे हिंदुस्तान में कैरियर बनाना चाहिए था।जब्बार के मुताबिक, अब्दुल कदीर के पिता अब्दुल गफ्फूर खान देश बंटवारे के विरोध में थे। उन्होंने भोपाल में ही रहने का फैसला लिया था। उनके 5 बेटे और 2 बेटियां थी। इसमें से 4 बेटे और 2 बेटियां पाकिस्तान चले गए थे। एक बेटा हफीज खान अपने पिता के साथ यहीं रह गए। वे नगर निगम में राजस्व निरीक्षक थे। 1995 में वे भी पाकिस्तान चले गए।कदीर खान का भोपाल स्थित घर। हालांकि, इस मकान को दोबारा बनाया गया है।पिता होशंगाबाद में हेडमास्टर थेअब्दुल कदीर खान के पिता अब्दुल गफ्फूर होशंगाबाद में एक स्कूल में हेडमास्टर थे। उनके भाई हमीद खान और महबूब खान के परिवार ने भी भोपाल में ही रहने का फैसला लिया था। आगा अब्दुल जब्बार, हमीद खान के बेटे हैं।जब्बार खान बताते हैं कि डाॅ. अब्दुल कदीर अक्सर कहा करते थे कि मैंने पाकिस्तान जाकर बहुत बड़ी गलती कर दी। मैं गलत आ गया इस मुल्क (पाकिस्तान) में। मुझे हिंदुस्तान में कैरियर बनाना चाहिए था। जब कभी भी उनका मैसेज, चिट्ठी आती थी, तब वह हमेशा भोपाल छोड़ने का अफसोस जताते थे। वह कहा करते थे कि दुनिया में हमारा भोपाल शहर सबसे खूबसूरत है। मुझे भोपाल में ही रहना था।1972 में आखिरी बार भोपाल आए थे कदीरजब्बार बताते हैं कि 1972 में वह आखिरी बार भोपाल आए। अब्दुल कदीर बहुत मिलनसार शख्स थे। हॉकी, पतंगबाजी के बहुत शौकीन थे। हम लोगों को वह गिन्नौरी स्कूल की छत में पतंगबाजी के लिए ले जाया करते थे। बचपन से उन्हें शायरी सुनने का बहुत शौक था। बचपन में हम दोनों एक ही घर में रहे। घर के पास ही उनके साथ खेला करते थे।पिता बंटवारे को मानने को तैयार नहींजब्बार बताते हैं कि अब्दुल कदीर खान के पिता अब्दुल गफ्फूर खान ब्रिटिश हुकूमत के दौरान स्कूल में प्रिंसिपल रहे। वह होशंगाबाद से रिटायर हुए थे। उनके 7 बच्चों में कदीर खान सबसे छोटे बेटे थे। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद जब कदीर खान समेत उनके 5 बच्चे पाकिस्तान जाने लगे तो गफ्फूर ने विरोध किया। उन्होंने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया। बेटे-बेटियां उन पर पाकिस्तान चलने को लेकर काफी दबाव बना रहे थे। गफ्फूर खान ने कभी भी बंटवारे को नहीं माना। उनका मानना था कि देश का विभाजन गलत हुआ। कदीर के सभी भाई-बहनों की मौत हो चुकी है।गिन्नौरी स्कूल, जहां कदीर ने प्राइमरी तक पढ़ाई की थी।मैट्रिक तक भोपाल में पढ़े-लिखेअब्दुल कदीर मैट्रिक तक भोपाल में पढ़े। घर के पास ही गिन्नौरी स्कूल में प्राइमरी शिक्षा हासिल की। इसके बाद जहांगीरिया स्कूल से 8वीं पास की थी। 11वीं की पढ़ाई हमीदिया हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की थी। मैट्रिक पास होने के बाद भोपाल से 1949 में पाकिस्तान चले गए।दो बार पाकिस्तान का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज मिलापेशे से इंजीनियर कदीर खान एक दशक से ज्यादा वक्त तक परमाणु बम बनाने की तकनीक, मिसाइल बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन, मिसाइल में लगने वाले उपकरण और पुर्जों के व्यापार में काम कर चुके हैं। उन्हें 1996 और 1999 में दो बार पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी नवाजा गया।भोपाल में जन्मे कादिर खान का भारत से लेकर यूरोप तक का सफर1960 में पाकिस्तान के कराची यूनिवर्सिटी से मेटालर्जी यानि धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद खान ने परमाणु इंजीनियरिंग से संबंधित और पढ़ाई करने के लिए पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम और नीदरलैंड्स का रुख किया।लेकिन, ये पाकिस्तान ही था जहां उन्हें काफी शोहरत हासिल हुई। कहा जाता था कि 1980 और 1990 के दशक में इस्लामाबाद के सबसे ताकतवर व्यक्ति डॉ. खान ही थे। स्कूलों की दीवारों पर उनकी तस्वीरें दिखती थीं, उनकी तस्वीरें सड़कों-गलियों में पोस्टरों पर दिखती थीं। उन्हें 1996 और 1999 में दो बार देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से भी नवाजा गया।लेबोरेटरी में नौकरी से की शुरुआतसाल 1972 में उन्हें एम्सटर्डम में फिजिकल डायनमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में नौकरी मिली। कंपनी छोटी थी, लेकिन एक मल्टीनेशनल कंपनी यूरेन्को के साथ इसका करार था। बाद में परमाणु उपकरणों और ख़ुफिया जानकारी के बाजार की दुनिया में डॉ. खान के लिए उनका ये काम अहम रहा।साल 1974 में जब भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, पाकिस्तान के ये इंजीनियर फिजिकल डायनमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में ही काम कर रहे थे। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में साल 2018 में छपे एक लेख में कहा गया था- इस घटना ने डॉ. खान के भीतर छिपे राष्ट्रवाद को एक तरह से चुनौती दी और पड़ोसी मुल्क से बराबरी करने में पाकिस्तान की मदद करने की कोशिश करने लगे। दिसंबर 1975 में एक दिन अचानक डॉ. खान और उनका परिवार हॉलैंड छोड़कर पाकिस्तान चला गया था।
