उत्तराखंड में मुख्यमंत्री कौन:चुनाव हार चुके धामी पर संशय, पर एक गुट उन्हें ही CM चाहता है; बलूनी और भट्‌ट भी दौड़ में शामिल

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नई दिल्ली3 घंटे पहलेलेखक: धर्मेंद्र कृष्ण तिवारी

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उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विधानसभा का चुनाव हार गए हैं। उनकी हार ने 70 में से 47 सीट जीतने वाली भाजपा को नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर चिंतित कर दिया है। पार्टी में जहां सतपाल महाराज और धन सिंह रावत जैसे सीनियर नेताओं को कुर्सी सौंपने की चर्चाएं हैं, वहीं जोशीले अनिल बलूनी और अजय भट्‌ट के नाम भी जोर-शोर से उछल रहे हैं। इन सब के बीच पार्टी का एक गुट अब भी पुष्कर सिंह धामी को ही मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। ऐसी संभावनाएं जताई जा रही हैं कि पार्टी होली के बाद सीएम के नाम का ऐलान करेगी।

उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री इन्हीं पांच नामों में से एक हो सकता है। तो आइये हम आपको बताते हैं, पुष्कर सिंह धामी को टक्कर देने वाले बाकी चार नेताओं के बारे में। क्यों हैं इनका दावा मजबूत… ये जानने से पहले पोल में हिस्सा लीजिए-

धन सिंह रावत: राम जन्मभूमि के लिए जेल गए, छुआछूत, बाल विवाह और शराब के खिलाफ अभियान चलाया

उत्तराखंड राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने 1989 में स्वयंसेवक के रूप में RSS जॉइन की थी।

उत्तराखंड राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने 1989 में स्वयंसेवक के रूप में RSS जॉइन की थी।

यह पहली बार नहीं है, जब धन सिंह रावत का नाम उत्तराखंड के CM के तौर पर चर्चा में आया हो। मार्च 2021 में अपने पांच साल पूरे करने से पहले ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। तब धन सिंह रावत को अगले CM के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन बाजी लगी गढ़वाल से सांसद तीरथ सिंह रावत के हाथ। उनके बाद पुष्कर सिंह धामी के सिर पर ताज सजा।

उत्तराखंड राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत अपने कार्य करने की शैली के प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म 7 अक्टूबर, 1971 के दिन गढ़वाल जिले के नौगांव नामक गांव में हुआ था। साल 1989 में ही धन सिंह रावत ने स्वयंसेवक के रूप में RSS जॉइन की थी। अपनी जवानी के दिनों में धन सिंह ने छुआछूत व्यवस्था, बाल विवाह और शराब के खिलाफ अभियान चलाया था. राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान भी धन सिंह ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। इसके लिए उन्हें जेल भी हुई थी।

सतपाल महाराज: उत्तराखंड का बड़ा नाम, लेकिन दलबल से जुड़ा है इतिहास

पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की पहचान राजनीतिक व्यक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरु के तौर पर भी है और संत समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ है।

पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की पहचान राजनीतिक व्यक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरु के तौर पर भी है और संत समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ है।

उत्तराखंड की राजनीति में सतपाल महाराज बड़ा नाम है। 21 सितंबर 1951 में जन्में सतपाल महाराज ने अपना राजनीतिक करियर कांग्रेस के साथ शुरू किया था। नारायण दत्त तिवारी ने जब कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, तो सतपाल महाराज उसके प्रदेश अध्यक्ष बने। देवगोड़ा सरकार और गुजराल सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। बाद में वे कांग्रेस में वापस आ गए।

साल 2016 में हरीश रावत सरकार में बगावत का बिगुल फूंककर भाजपा के पाले में चले गए थे। कांग्रेस पृष्ठभूमि के होने की वजह से सतपाल महाराज की मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद को झटका लग सकता है, लेकिन हाल ही में भाजपा ने असम में कांग्रेस से आए हिमंत विस्बा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया है। यह देखकर सतपाल महाराज का हौसला बुलंद हो गया है।

अनिल बलूनी: कभी पत्रकार थे, अब मोदी-शाह के करीबी और पार्टी में अच्छी पकड़ वाले नेता

मोदी जब गुजरात के सीएम थे तब बलूनी वहां के राज्यपाल के OSD थे।

मोदी जब गुजरात के सीएम थे तब बलूनी वहां के राज्यपाल के OSD थे।

अनिल बलूनी उत्तराखंड से राज्यसभा सदस्य और बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी हैं। उन्होंने उत्तराखंड की जमीन से ही सियासत सीखी है। बलूनी को शांत स्वभाव के नेताओं में गिना जाता है। एक समय अनिल बलूनी पत्रकार हुआ करते थे और आज वह प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के करीबियों में गिने जाते हैं। पार्टी में उनकी अच्छी पकड़ है। अनिल उत्तराखंड के लोगों की नब्ज टटोलने में माहिर हैं।

अनिल बलूनी का जन्म 2 सितंबर 1972 को उत्तराखंड में हुआ था। राज्य के नकोट गांव में जन्मे बलूनी युवावस्था से ही राजनीति में एक्टिव हैं. वे पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के प्रदेश महामंत्री रहे, फिर निशंक सरकार में वन्यजीव बोर्ड में उपाध्यक्ष, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और फिर राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख बने। अनिल 26 साल की उम्र में राजनीति में उतर आए थे और राज्य के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में कोटद्वार सीट चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया था। बलूनी ने कोर्ट पहुंच गए थे और फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2004 में कोटद्वार से उपचुनाव लड़ा। हालांकि, वह हार गए थे। जब सुंदर सिंह भंडारी को बिहार का राज्यपाल बनाया गया, तो उन्होंने अनिल बलूनी को अपना ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) चुना। सुंदर जब गुजरात के राज्यपाल बने तो भी बलूनी को साथ ले गए। यह वह समय था, जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हुआ करते थे।

अजय भट्‌ट: सब्जी की दुकान पर काम किया, अब मोदी कैबिनेट में मंत्री

अजय भट्‌ट ने 1980 में विद्यार्थी परिषद की सदस्यता ली थी।

अजय भट्‌ट ने 1980 में विद्यार्थी परिषद की सदस्यता ली थी।

1 मई 1961 को रानीखेत अल्मोड़ा में जन्में अजय भट्‌ट के बचपन में ही उनके पिता कमलापति भट्ट का निधन हो गया था। तब भट्ट ने एक छोटी सी सब्जी की दुकान में काम किया। अपना परिवार संभाला। पढ़ लिखकर वकील बनें और आज केंद्र की सरकार में रक्षा राज्य मंत्री और पर्यटन राज्य मंत्री का जिम्मा संभाल रहे हैं। भट्ट ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पू्र्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को 2019 के आम चुनाव में तीन लाख से ज्यादा वोटों से हराया था। उत्तराखंड में कांग्रेस शासनकाल में भट्ट ने नेता प्रतिपक्ष की बखूबी भूमिका निभाते हुए कांग्रेस को कई बार सदन में आड़े हाथों भी लिया था।

भट्ट को राजनीति का लंबा अनुभव है। वह उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश प्रभारी भी रह चुके हैं। पार्टी के सभी गुटों के साथ तालमेल बनाकर उन्होंने भाजपा को उत्तराखंड में एक मजबूती भी दी। विधानसभा चुनाव में भी भट्ट ने अहम योगदान निभाया था। भाजपा कार्यकाल के दौरान उत्तराखंड सरकार में वह कई पदों पर रह चुके हैं। सांसद बनने से पहले भट्ट रानीखेत, अल्मोड़ा से विधायक भी रह चुके हैं। अभिभाजित उत्तर प्रदेश में भी वह विधायक रहे। 2001-2002 में उत्तराखंड सरकार में संसदीय कार्य, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन मंत्री रहे। 2012-2017 तक वह नेता प्रतिपक्ष थे।

पुष्कर सिंह धामी: कोश्यारी और राजनाथ के करीबी, उत्तराखंड के पहले भाजयुमो अध्यक्ष

पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री बने थे।

पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री बने थे।

16 सितंबर 1975 को पिथैरागढ़ के तुंडी गांव में जन्में पुष्कर सिंह धामी भले ही विधानसभा का चुनाव हार गए हों। लेकिन, अब भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़े हुए हैं। उसका कारण है, पार्टी में उनकी मजबूत पकड़ और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का करीबी होना। इसके अलावा धामी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भी करीबी माने जाते हैं। जब उत्तराखंड अलग राज्य बना था, तब धामी भारतीय जनता युवा मोर्चा के राज्य के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

पुष्कर सिंह धामी 2012 में पहली बार खटीमा सीट से विधायक बने। उन्होंने तब कांग्रेस के देवेंद्र चंद को करीब 5 हजार वोटों से अंतर से हराया था। 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में धामी ने खटीमा से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी को 3 हजार से कम अंतर से हराया। वह उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री बने। इस बार कापड़ी ने उन्हें छह हजार वोटों से हरा दिया है।

चौंका सकते हैं मदन कौशिक

उत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक चुनाव के बाद गृह मंत्री अमित शाह से मिलेंगे।

उत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक चुनाव के बाद गृह मंत्री अमित शाह से मिलेंगे।

भाजपा के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष और 5 बार के विधायक मदन कौशिक का नाम भी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश हो सकता है। पिछली बार भी उनके नाम की चर्चाएं तेज थीं, लेकिन चुनाव का समय नजदीक होने और उनके पास प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी होने के कारण उस पर चर्चा नहीं हुई थी। तब पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था और मदन को संगठन की मजबूती और मैनेजमेंट पर काम करने को कहा गया था। चुनाव परिणाम आते ही मदन दिल्ली जाकर अमित शाह से भी मिल चुके है। माना जा रहा है कि पार्टी की सत्ता में वापसी का इनाम उन्हें भी मिल सकता है।

धामी को कापड़ी ने 6579 वोटों से हराया
उधम सिंह नगर की खटीमा से पुष्कर सिंह धामी 6579 वोट से हार गए हैं। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी भुवन चंद्र कापड़ी ने करारी शिकस्त दी। धामी को 41598 वोट ही मिले, जबकि भुवन चंद्र कापड़ी ने 48177 वोट हासिल कर लिए।

धामी के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार कैलाश
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं। पुष्कर धामी को खटीमा सीट से हार मिली है, जबकि कैलाश ने चंपावत सीट पर जीत दर्ज की है। कैलाश ने कहा कि पुष्कर धामी के ही नेतृत्व में भाजपा उत्तराखंड की सत्ता में आई है। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए वे अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं।

CM की हार का मिथक नहीं टूटा
उत्तराखंड में CM रहते कोई व्यक्ति चुनाव नहीं जीत पाया। यह मिथक इस बार भी नहीं टूट पाया। 2012 में तत्कालीन CM बीसी खंडूरी और 2017 में तत्कालीन CM हरीश रावत अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। 2022 में अब पुष्कर सिंह धामी भी चुनाव हार गए। ऐसे में अब भाजपा के सामने सीएम पद के लिए नए चेहरे की तलाश होगी।

Hindi NewsNationalA Faction Wants Him As CM On Suspicion Of Dhami, Who Has Lost The Election, Baluni And Bhatt Are Also Involved In The Race.नई दिल्ली3 घंटे पहलेलेखक: धर्मेंद्र कृष्ण तिवारीकॉपी लिंकउत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विधानसभा का चुनाव हार गए हैं। उनकी हार ने 70 में से 47 सीट जीतने वाली भाजपा को नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर चिंतित कर दिया है। पार्टी में जहां सतपाल महाराज और धन सिंह रावत जैसे सीनियर नेताओं को कुर्सी सौंपने की चर्चाएं हैं, वहीं जोशीले अनिल बलूनी और अजय भट्‌ट के नाम भी जोर-शोर से उछल रहे हैं। इन सब के बीच पार्टी का एक गुट अब भी पुष्कर सिंह धामी को ही मुख्यमंत्री बनाना चाहता है। ऐसी संभावनाएं जताई जा रही हैं कि पार्टी होली के बाद सीएम के नाम का ऐलान करेगी।उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री इन्हीं पांच नामों में से एक हो सकता है। तो आइये हम आपको बताते हैं, पुष्कर सिंह धामी को टक्कर देने वाले बाकी चार नेताओं के बारे में। क्यों हैं इनका दावा मजबूत… ये जानने से पहले पोल में हिस्सा लीजिए-धन सिंह रावत: राम जन्मभूमि के लिए जेल गए, छुआछूत, बाल विवाह और शराब के खिलाफ अभियान चलायाउत्तराखंड राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने 1989 में स्वयंसेवक के रूप में RSS जॉइन की थी।यह पहली बार नहीं है, जब धन सिंह रावत का नाम उत्तराखंड के CM के तौर पर चर्चा में आया हो। मार्च 2021 में अपने पांच साल पूरे करने से पहले ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। तब धन सिंह रावत को अगले CM के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन बाजी लगी गढ़वाल से सांसद तीरथ सिंह रावत के हाथ। उनके बाद पुष्कर सिंह धामी के सिर पर ताज सजा।उत्तराखंड राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत अपने कार्य करने की शैली के प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म 7 अक्टूबर, 1971 के दिन गढ़वाल जिले के नौगांव नामक गांव में हुआ था। साल 1989 में ही धन सिंह रावत ने स्वयंसेवक के रूप में RSS जॉइन की थी। अपनी जवानी के दिनों में धन सिंह ने छुआछूत व्यवस्था, बाल विवाह और शराब के खिलाफ अभियान चलाया था. राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान भी धन सिंह ने सक्रिय रूप से भाग लिया था। इसके लिए उन्हें जेल भी हुई थी।सतपाल महाराज: उत्तराखंड का बड़ा नाम, लेकिन दलबल से जुड़ा है इतिहासपर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की पहचान राजनीतिक व्यक्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरु के तौर पर भी है और संत समाज में भी उनकी अच्छी पकड़ है।उत्तराखंड की राजनीति में सतपाल महाराज बड़ा नाम है। 21 सितंबर 1951 में जन्में सतपाल महाराज ने अपना राजनीतिक करियर कांग्रेस के साथ शुरू किया था। नारायण दत्त तिवारी ने जब कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, तो सतपाल महाराज उसके प्रदेश अध्यक्ष बने। देवगोड़ा सरकार और गुजराल सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। बाद में वे कांग्रेस में वापस आ गए।साल 2016 में हरीश रावत सरकार में बगावत का बिगुल फूंककर भाजपा के पाले में चले गए थे। कांग्रेस पृष्ठभूमि के होने की वजह से सतपाल महाराज की मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद को झटका लग सकता है, लेकिन हाल ही में भाजपा ने असम में कांग्रेस से आए हिमंत विस्बा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया है। यह देखकर सतपाल महाराज का हौसला बुलंद हो गया है।अनिल बलूनी: कभी पत्रकार थे, अब मोदी-शाह के करीबी और पार्टी में अच्छी पकड़ वाले नेतामोदी जब गुजरात के सीएम थे तब बलूनी वहां के राज्यपाल के OSD थे।अनिल बलूनी उत्तराखंड से राज्यसभा सदस्य और बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी हैं। उन्होंने उत्तराखंड की जमीन से ही सियासत सीखी है। बलूनी को शांत स्वभाव के नेताओं में गिना जाता है। एक समय अनिल बलूनी पत्रकार हुआ करते थे और आज वह प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के करीबियों में गिने जाते हैं। पार्टी में उनकी अच्छी पकड़ है। अनिल उत्तराखंड के लोगों की नब्ज टटोलने में माहिर हैं।अनिल बलूनी का जन्म 2 सितंबर 1972 को उत्तराखंड में हुआ था। राज्य के नकोट गांव में जन्मे बलूनी युवावस्था से ही राजनीति में एक्टिव हैं. वे पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के प्रदेश महामंत्री रहे, फिर निशंक सरकार में वन्यजीव बोर्ड में उपाध्यक्ष, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और फिर राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख बने। अनिल 26 साल की उम्र में राजनीति में उतर आए थे और राज्य के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में कोटद्वार सीट चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया था। बलूनी ने कोर्ट पहुंच गए थे और फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2004 में कोटद्वार से उपचुनाव लड़ा। हालांकि, वह हार गए थे। जब सुंदर सिंह भंडारी को बिहार का राज्यपाल बनाया गया, तो उन्होंने अनिल बलूनी को अपना ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) चुना। सुंदर जब गुजरात के राज्यपाल बने तो भी बलूनी को साथ ले गए। यह वह समय था, जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हुआ करते थे।अजय भट्‌ट: सब्जी की दुकान पर काम किया, अब मोदी कैबिनेट में मंत्रीअजय भट्‌ट ने 1980 में विद्यार्थी परिषद की सदस्यता ली थी।1 मई 1961 को रानीखेत अल्मोड़ा में जन्में अजय भट्‌ट के बचपन में ही उनके पिता कमलापति भट्ट का निधन हो गया था। तब भट्ट ने एक छोटी सी सब्जी की दुकान में काम किया। अपना परिवार संभाला। पढ़ लिखकर वकील बनें और आज केंद्र की सरकार में रक्षा राज्य मंत्री और पर्यटन राज्य मंत्री का जिम्मा संभाल रहे हैं। भट्ट ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पू्र्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को 2019 के आम चुनाव में तीन लाख से ज्यादा वोटों से हराया था। उत्तराखंड में कांग्रेस शासनकाल में भट्ट ने नेता प्रतिपक्ष की बखूबी भूमिका निभाते हुए कांग्रेस को कई बार सदन में आड़े हाथों भी लिया था।भट्ट को राजनीति का लंबा अनुभव है। वह उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश प्रभारी भी रह चुके हैं। पार्टी के सभी गुटों के साथ तालमेल बनाकर उन्होंने भाजपा को उत्तराखंड में एक मजबूती भी दी। विधानसभा चुनाव में भी भट्ट ने अहम योगदान निभाया था। भाजपा कार्यकाल के दौरान उत्तराखंड सरकार में वह कई पदों पर रह चुके हैं। सांसद बनने से पहले भट्ट रानीखेत, अल्मोड़ा से विधायक भी रह चुके हैं। अभिभाजित उत्तर प्रदेश में भी वह विधायक रहे। 2001-2002 में उत्तराखंड सरकार में संसदीय कार्य, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन मंत्री रहे। 2012-2017 तक वह नेता प्रतिपक्ष थे।पुष्कर सिंह धामी: कोश्यारी और राजनाथ के करीबी, उत्तराखंड के पहले भाजयुमो अध्यक्षपुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री बने थे।16 सितंबर 1975 को पिथैरागढ़ के तुंडी गांव में जन्में पुष्कर सिंह धामी भले ही विधानसभा का चुनाव हार गए हों। लेकिन, अब भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़े हुए हैं। उसका कारण है, पार्टी में उनकी मजबूत पकड़ और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का करीबी होना। इसके अलावा धामी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भी करीबी माने जाते हैं। जब उत्तराखंड अलग राज्य बना था, तब धामी भारतीय जनता युवा मोर्चा के राज्य के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।पुष्कर सिंह धामी 2012 में पहली बार खटीमा सीट से विधायक बने। उन्होंने तब कांग्रेस के देवेंद्र चंद को करीब 5 हजार वोटों से अंतर से हराया था। 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में धामी ने खटीमा से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी को 3 हजार से कम अंतर से हराया। वह उत्तराखंड के 11वें मुख्यमंत्री बने। इस बार कापड़ी ने उन्हें छह हजार वोटों से हरा दिया है।चौंका सकते हैं मदन कौशिकउत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक चुनाव के बाद गृह मंत्री अमित शाह से मिलेंगे।भाजपा के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष और 5 बार के विधायक मदन कौशिक का नाम भी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश हो सकता है। पिछली बार भी उनके नाम की चर्चाएं तेज थीं, लेकिन चुनाव का समय नजदीक होने और उनके पास प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी होने के कारण उस पर चर्चा नहीं हुई थी। तब पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था और मदन को संगठन की मजबूती और मैनेजमेंट पर काम करने को कहा गया था। चुनाव परिणाम आते ही मदन दिल्ली जाकर अमित शाह से भी मिल चुके है। माना जा रहा है कि पार्टी की सत्ता में वापसी का इनाम उन्हें भी मिल सकता है।धामी को कापड़ी ने 6579 वोटों से हरायाउधम सिंह नगर की खटीमा से पुष्कर सिंह धामी 6579 वोट से हार गए हैं। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी भुवन चंद्र कापड़ी ने करारी शिकस्त दी। धामी को 41598 वोट ही मिले, जबकि भुवन चंद्र कापड़ी ने 48177 वोट हासिल कर लिए।धामी के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार कैलाशउत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं। पुष्कर धामी को खटीमा सीट से हार मिली है, जबकि कैलाश ने चंपावत सीट पर जीत दर्ज की है। कैलाश ने कहा कि पुष्कर धामी के ही नेतृत्व में भाजपा उत्तराखंड की सत्ता में आई है। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए वे अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं।CM की हार का मिथक नहीं टूटाउत्तराखंड में CM रहते कोई व्यक्ति चुनाव नहीं जीत पाया। यह मिथक इस बार भी नहीं टूट पाया। 2012 में तत्कालीन CM बीसी खंडूरी और 2017 में तत्कालीन CM हरीश रावत अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। 2022 में अब पुष्कर सिंह धामी भी चुनाव हार गए। ऐसे में अब भाजपा के सामने सीएम पद के लिए नए चेहरे की तलाश होगी।

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