देश को 15000 सैनिक देने वाले गांव की कहानी:मगहर गांव में फौज की नौकरी के बिना लड़के शादी नहीं करते

news image

34 मिनट पहलेलेखक: देवांशु तिवारी

गाजीपुर से किमी 40 किमी दूर पड़ता है गहमर गांव। आबादी के लिहाज से ये एशिया का सबसे बड़ा गांव है। लेकिन ये इसकी पहचान नहीं है। इसकी पहचान है देशभक्ति का जुनून, जिसके चलते इस गांव के हर परिवार का कोई न कोई व्यक्ति सेना में है या रह चुका है।

गहमर के हर घर में फौजियों की तस्वीरें,वर्दियां और सेना के मेडल अलमारियों में सजे दिखते हैं। यहां के 12 लोगों ने साल 1965 और 1971 की जंग से लेकर कारगिल की लड़ाई तक भारतीय सेना का मान बढ़ाया है। यहां के लोग कहते हैं कि गहमर में जब तक लड़कों की सेना में भर्ती नहीं होती उनकी शादी भी नहीं की जाती है। चलिए इस गांव का एक चक्कर लगा आते हैं।

गहमर गांव लगभग 8 वर्ग मील यानी 20 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। ये गांव 22 पट्टियों यानी टोलों में बंटा हुआ है। गहमर से बनारस जाने में 2 घंटे का समय लगता है।

गहमर गांव लगभग 8 वर्ग मील यानी 20 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। ये गांव 22 पट्टियों यानी टोलों में बंटा हुआ है। गहमर से बनारस जाने में 2 घंटे का समय लगता है।

सरहद पर लड़ने वाले गांव के 15000 लोग
‘हमारा गांव फैजियों का गांव है। यहां मां की कोख से ही बच्चा फौजी बनकर पैदा होता है।” गहमर में रहने वाले नीरज ने हमें यही बताया। गांव में घुसते ही सबसे पहला मकान उन्हीं का है। नीरज के भाई राहुल कुमार वर्मा इंडियन नेवी में है।

नीरज कहते हैं,” गांव के 2000 से ज्यादा लोग सेना के अलग-अलग अंगों में सैनिक से लेकर कर्नल तक की पोस्ट पर काम रहे हैं। इस गांव ने भारतीय सेना को 15 हजार से ज्यादा जवान दिए हैं। यहां किसी भी घर का बेटा फौज से छुट्टी पर आता है तो गांव का हर एक व्यक्ति उससे मिलने जाता है।”

गहमर में रिटायर्ड फौजियों की मदद के लिए पूर्व सैनिक सेवा समिति का दफ्तर बनाया गया है। यहीं पर शाम होते ही पूर्व सैनिकों की मंडली जुटती है।

गहमर में रिटायर्ड फौजियों की मदद के लिए पूर्व सैनिक सेवा समिति का दफ्तर बनाया गया है। यहीं पर शाम होते ही पूर्व सैनिकों की मंडली जुटती है।

16 मार्च 2021 को लोकसभा में बताया गया था कि देश में कुल 11 लाख 51 हजार 726 जवान सीमा पर तैनात थे। इसमें से 14.5%, यानी 1 लाख 67 हजार 557 सैनिक अकेले यूपी के हैं। दूसरे नंबर पर 7.7%, यानी 89 हजार 88 जवानों के साथ पंजाब है। UP का आधा। तीसरे पर 87 हजार 835 जवानों के साथ महाराष्ट्र है। यूपी के गाजीपुर जिले से मौजूदा समय में सबसे ज्यादा 10,320 सैनिक सेना के अलग-अलग हिस्सों में तैनात हैं।

नीरज के घर से हम 50 कदम आगे बढ़े तो एक बड़ा सा मैदान मिला। यहां बीचोबीच एक गोल चबूतरा है। इसपर गांव के सैनिकों का नाम लिखा है। इसी मैदान के कोने पर पूर्व सैनिक सेवा समिति का दफ्तर है। इस जगह पर गांव के रहने वाले पूर्व सैनिकों की बैठक होती है। बच्चों को सेना से जुड़ी परीक्षा, सैनिकों की पेंशन और रोजमर्रा की जरूर वाले सामान भी यहीं से सस्ते रेट पर मिलते हैं।

चलिए अब आपको ले चलते हैं गांव के सबसे रोचक हिस्से में। लेकिन पहले हमें इन सवालों का जवाब दीजिए…

शहीद अब्दुल हमीद हैं गांव के हीरो
मैदान के ठीक सामने 1965 भारत-पाक युद्ध में लेफ्टिनेंट कर्नल रहे रामबचन सिंह का घर है। यहां हमें उनके बेटे अशोक सिंह मिले। अशोक बताते हैं,” पापा 1965 की वॉर में शहीद अब्दुल हमीद जी के साथ पाकिस्तानियों से लड़े। फिर 1971 में भी रहे। आज वो 86 साल के हो गए हैं, लेकिन आज भी उनकी वही फिटनेस है। किसी को हाथ पकड़ चलने नहीं देते हैं। हमारे घर की तीन पीढ़ियां सेना में रही हैं। हमारे ग्रेट ग्रैंडफादर और दादा जी भी फौज में रहे हैं। पापा को सेना मेडल मिल चुका है।”

गहमर गांव के रहने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल रामबचन सिंह के बेटे अशोक कुमार कहते हैं,

गहमर गांव के रहने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल रामबचन सिंह के बेटे अशोक कुमार कहते हैं, “गांव में पहले हर साल सेना की टीम बच्चों से मिलने आती थी, लेकिन ये सिलसिला बीते 3 साल से बंद है।” गांव के नीरज बताते हैं कि पहले यहां पर कैन्टीन की सुविधा थी, लेकिन अब इसे बंद करवा दिया गया है। सरकार को इसे फिर से चालू कराना चाहिए।

अशोक कहते हैं,” देश सेवा को लेकर गहमर की ये परंपरा आजादी के पहले से शुरू हो गई थी। दूसरे विश्व युद्ध में गहमर के 200 से ज्यादा लोग अंग्रेजी सेना में शामिल रहे, जिसमें से 21 सैनिक शहीद हो गए थे। गांव के बड़े बताते हैं कि यहां सैनिक बनने का जोश इसी समय से शुरू हो गया था। आज सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे गांव के लड़के शहीद अब्दुल हमीद को हीरो मानते हैं।”

सेना से लौटे जवानों ने गांव में ही बना डाली आर्मी ट्रेनिंग यूनिट
22 साल के सुरेंद्र कुमार पांडे के पापा एयरफोर्स में हैं और बाबा पुलिस में रह चुके हैं। सुरेंद्र 4 साल से सेना भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए वो हर दिन अपने 3 से 4 घंटे गांव के किनारे गंगा घाट पर बने वर्क-आउट एरिया को देते है। इस जगह को यहां मठिया कहा जाता है। यहां पहुंचने पर लगेगा कि आप किसी आर्मी की ट्रेनिंग यूनिट में आ गए हों। सेना में नौकरी कर रहे लोगों ने ही इसे डिजाइन किया है।यहां सेना के नियमों के मुताबिक रनिंग ट्रैक है। आर्मी की हार्डकोर प्रैक्टिस में शामिल होने वाली सभी तरह की सुविधाएं यहां मौजूद हैं।

रिटायर्ड सूबेदार मेजर मारकंडेय सिंह 1970 की जंग से लेकर कारगिल युद्ध तक सेना में शामिल रहे हैं। सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे गांव के युवा इनसे टिप्स लेने आते रहते हैं।

रिटायर्ड सूबेदार मेजर मारकंडेय सिंह 1970 की जंग से लेकर कारगिल युद्ध तक सेना में शामिल रहे हैं। सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे गांव के युवा इनसे टिप्स लेने आते रहते हैं।

कारगिल की जंग का हिस्सा रहे रिटायर्ड सूबेदार मेजर मारकंडेय सिंह से यहां के लड़के सेना में जाने की बारिकियां सीखने आते हैं। मारकंडेय कहते हैं,”मठिया की मिट्टी ने सेना को 10 हजार से ज्यादा सैनिक दिए हैं। यहां प्रैक्टिस करने वाला हर बच्चा सेना के फिजिकल टेस्ट को आसानी से क्लियर कर सकता है। हम गांव में ही बच्चों को इतना तैयार कर देते हैं कि जरूरत पड़ने पर वो यहीं से सीधे युद्ध में भेजा जा सकता है।”

बच्चों को हंसते-हंसते फौज में भेजती हैं महिलाएं
गांव की मनोरमा देवी का बेटा राहुल नौसेना में क्लर्क है। हम उनके घर पहुंचे तो उन्हें वो बहुत खुश हो गईं। हमें गाजर का हलुआ भी खिलाया। मुस्कुराते हुए मनोरमा बोलीं,”आपकी की ही उम्र का हमारा बेटा फौज में है। उसे मीठा पसंद है। जब भी छुट्टी पर घर आता है उसे गाजर का हलुआ खिलाते हैं।”

गहमर गांव की संगीता के पति झब्बूराम सीमा सड़क सुरक्षा विभाग में अफ्सर थे। 15 अगस्त 2017 में उनका निधन हो गया। उन्हें अब हर महीने 12 हजार पेंशन मिल रही है। वो चाहती हैं कि उनके दोनों बच्चे पढ़-लिखकर सेना में जाएं।

गहमर गांव की संगीता के पति झब्बूराम सीमा सड़क सुरक्षा विभाग में अफ्सर थे। 15 अगस्त 2017 में उनका निधन हो गया। उन्हें अब हर महीने 12 हजार पेंशन मिल रही है। वो चाहती हैं कि उनके दोनों बच्चे पढ़-लिखकर सेना में जाएं।

हमने उनसे सवाल किया कि क्या यहां की महिलाओं को अपने बच्चों को सेना में भेजने में डर नहीं लगता ? उन्होंने जवाब दिया,”गांव की मन्यता है कि यहां की कुलदेवी मां कामख्या सेना में गए हर बच्चे की रक्षा करती हैं। जब माता हमारे बच्चों की रक्षा कर रही हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है। यहां बच्चों का नाम सेना में आने पर महिलाएं मिठाईयां बांटती हैं।”

गहमर गांव में प्राथमिक विद्यालय से लेकर डिग्री कॉलेज बना है…24 घंटे अस्पताल की सुविधा

गहमर गांव के पंचायत भवन में बड़ी पानी की टंकी है। इससे गांव के सभी घरों में पानी की 24 घंटे सप्लाई रहती है। यहां के स्वास्थ्य केंद्र पर महिलाओं और बच्चों को सभी तरह की सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी मिलती रहती है।

गहमर गांव के पंचायत भवन में बड़ी पानी की टंकी है। इससे गांव के सभी घरों में पानी की 24 घंटे सप्लाई रहती है। यहां के स्वास्थ्य केंद्र पर महिलाओं और बच्चों को सभी तरह की सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी मिलती रहती है।

गहमर गांव गाजीपुर की जमानिया विधानसभा में आता है। इस गांव को 1530 में राजा धामदेव राव ने बसाया था। गांव में घुसते ही आपको घरों के बाहर लगी नेम प्लेट पर भूतपूर्व सैनिक, भारतीय सेना और फौजी जैसे शब्द दिखाई देंगे।

गहमर में 1 लाख 30 हजार लोगों की आबादी है। लगभग 60% लोग राजपूत बिरादरी के हैं। यहां यादव, वर्मा और ब्राम्हण वर्ग के लोग भी हैं। गांव का खुद का रेलवे स्टेशन भी है। यहां से 20 से ज्यादा ट्रेनें गुजरती हैं। पढ़ाई-लिखाई के लिए डिग्री कॉलेज,इंटर कॉलेज,प्राथमिक विद्यालय हैं। क्योंकि यहां के बच्चे खूब पसीना बहाते हैं। इसलिए उन्हें फिट रखने के लिए यहां स्वास्थ केंद्र भी है, जहां 24 घंटे ट्रीटमेंट की सुविधा है।

34 मिनट पहलेलेखक: देवांशु तिवारीकॉपी लिंकवीडियोगाजीपुर से किमी 40 किमी दूर पड़ता है गहमर गांव। आबादी के लिहाज से ये एशिया का सबसे बड़ा गांव है। लेकिन ये इसकी पहचान नहीं है। इसकी पहचान है देशभक्ति का जुनून, जिसके चलते इस गांव के हर परिवार का कोई न कोई व्यक्ति सेना में है या रह चुका है।गहमर के हर घर में फौजियों की तस्वीरें,वर्दियां और सेना के मेडल अलमारियों में सजे दिखते हैं। यहां के 12 लोगों ने साल 1965 और 1971 की जंग से लेकर कारगिल की लड़ाई तक भारतीय सेना का मान बढ़ाया है। यहां के लोग कहते हैं कि गहमर में जब तक लड़कों की सेना में भर्ती नहीं होती उनकी शादी भी नहीं की जाती है। चलिए इस गांव का एक चक्कर लगा आते हैं।गहमर गांव लगभग 8 वर्ग मील यानी 20 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। ये गांव 22 पट्टियों यानी टोलों में बंटा हुआ है। गहमर से बनारस जाने में 2 घंटे का समय लगता है।सरहद पर लड़ने वाले गांव के 15000 लोग’हमारा गांव फैजियों का गांव है। यहां मां की कोख से ही बच्चा फौजी बनकर पैदा होता है।” गहमर में रहने वाले नीरज ने हमें यही बताया। गांव में घुसते ही सबसे पहला मकान उन्हीं का है। नीरज के भाई राहुल कुमार वर्मा इंडियन नेवी में है।नीरज कहते हैं,” गांव के 2000 से ज्यादा लोग सेना के अलग-अलग अंगों में सैनिक से लेकर कर्नल तक की पोस्ट पर काम रहे हैं। इस गांव ने भारतीय सेना को 15 हजार से ज्यादा जवान दिए हैं। यहां किसी भी घर का बेटा फौज से छुट्टी पर आता है तो गांव का हर एक व्यक्ति उससे मिलने जाता है।”गहमर में रिटायर्ड फौजियों की मदद के लिए पूर्व सैनिक सेवा समिति का दफ्तर बनाया गया है। यहीं पर शाम होते ही पूर्व सैनिकों की मंडली जुटती है।16 मार्च 2021 को लोकसभा में बताया गया था कि देश में कुल 11 लाख 51 हजार 726 जवान सीमा पर तैनात थे। इसमें से 14.5%, यानी 1 लाख 67 हजार 557 सैनिक अकेले यूपी के हैं। दूसरे नंबर पर 7.7%, यानी 89 हजार 88 जवानों के साथ पंजाब है। UP का आधा। तीसरे पर 87 हजार 835 जवानों के साथ महाराष्ट्र है। यूपी के गाजीपुर जिले से मौजूदा समय में सबसे ज्यादा 10,320 सैनिक सेना के अलग-अलग हिस्सों में तैनात हैं।नीरज के घर से हम 50 कदम आगे बढ़े तो एक बड़ा सा मैदान मिला। यहां बीचोबीच एक गोल चबूतरा है। इसपर गांव के सैनिकों का नाम लिखा है। इसी मैदान के कोने पर पूर्व सैनिक सेवा समिति का दफ्तर है। इस जगह पर गांव के रहने वाले पूर्व सैनिकों की बैठक होती है। बच्चों को सेना से जुड़ी परीक्षा, सैनिकों की पेंशन और रोजमर्रा की जरूर वाले सामान भी यहीं से सस्ते रेट पर मिलते हैं।चलिए अब आपको ले चलते हैं गांव के सबसे रोचक हिस्से में। लेकिन पहले हमें इन सवालों का जवाब दीजिए…शहीद अब्दुल हमीद हैं गांव के हीरोमैदान के ठीक सामने 1965 भारत-पाक युद्ध में लेफ्टिनेंट कर्नल रहे रामबचन सिंह का घर है। यहां हमें उनके बेटे अशोक सिंह मिले। अशोक बताते हैं,” पापा 1965 की वॉर में शहीद अब्दुल हमीद जी के साथ पाकिस्तानियों से लड़े। फिर 1971 में भी रहे। आज वो 86 साल के हो गए हैं, लेकिन आज भी उनकी वही फिटनेस है। किसी को हाथ पकड़ चलने नहीं देते हैं। हमारे घर की तीन पीढ़ियां सेना में रही हैं। हमारे ग्रेट ग्रैंडफादर और दादा जी भी फौज में रहे हैं। पापा को सेना मेडल मिल चुका है।”गहमर गांव के रहने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल रामबचन सिंह के बेटे अशोक कुमार कहते हैं, “गांव में पहले हर साल सेना की टीम बच्चों से मिलने आती थी, लेकिन ये सिलसिला बीते 3 साल से बंद है।” गांव के नीरज बताते हैं कि पहले यहां पर कैन्टीन की सुविधा थी, लेकिन अब इसे बंद करवा दिया गया है। सरकार को इसे फिर से चालू कराना चाहिए।अशोक कहते हैं,” देश सेवा को लेकर गहमर की ये परंपरा आजादी के पहले से शुरू हो गई थी। दूसरे विश्व युद्ध में गहमर के 200 से ज्यादा लोग अंग्रेजी सेना में शामिल रहे, जिसमें से 21 सैनिक शहीद हो गए थे। गांव के बड़े बताते हैं कि यहां सैनिक बनने का जोश इसी समय से शुरू हो गया था। आज सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे गांव के लड़के शहीद अब्दुल हमीद को हीरो मानते हैं।”सेना से लौटे जवानों ने गांव में ही बना डाली आर्मी ट्रेनिंग यूनिट22 साल के सुरेंद्र कुमार पांडे के पापा एयरफोर्स में हैं और बाबा पुलिस में रह चुके हैं। सुरेंद्र 4 साल से सेना भर्ती की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए वो हर दिन अपने 3 से 4 घंटे गांव के किनारे गंगा घाट पर बने वर्क-आउट एरिया को देते है। इस जगह को यहां मठिया कहा जाता है। यहां पहुंचने पर लगेगा कि आप किसी आर्मी की ट्रेनिंग यूनिट में आ गए हों। सेना में नौकरी कर रहे लोगों ने ही इसे डिजाइन किया है।यहां सेना के नियमों के मुताबिक रनिंग ट्रैक है। आर्मी की हार्डकोर प्रैक्टिस में शामिल होने वाली सभी तरह की सुविधाएं यहां मौजूद हैं।रिटायर्ड सूबेदार मेजर मारकंडेय सिंह 1970 की जंग से लेकर कारगिल युद्ध तक सेना में शामिल रहे हैं। सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे गांव के युवा इनसे टिप्स लेने आते रहते हैं।कारगिल की जंग का हिस्सा रहे रिटायर्ड सूबेदार मेजर मारकंडेय सिंह से यहां के लड़के सेना में जाने की बारिकियां सीखने आते हैं। मारकंडेय कहते हैं,”मठिया की मिट्टी ने सेना को 10 हजार से ज्यादा सैनिक दिए हैं। यहां प्रैक्टिस करने वाला हर बच्चा सेना के फिजिकल टेस्ट को आसानी से क्लियर कर सकता है। हम गांव में ही बच्चों को इतना तैयार कर देते हैं कि जरूरत पड़ने पर वो यहीं से सीधे युद्ध में भेजा जा सकता है।”बच्चों को हंसते-हंसते फौज में भेजती हैं महिलाएंगांव की मनोरमा देवी का बेटा राहुल नौसेना में क्लर्क है। हम उनके घर पहुंचे तो उन्हें वो बहुत खुश हो गईं। हमें गाजर का हलुआ भी खिलाया। मुस्कुराते हुए मनोरमा बोलीं,”आपकी की ही उम्र का हमारा बेटा फौज में है। उसे मीठा पसंद है। जब भी छुट्टी पर घर आता है उसे गाजर का हलुआ खिलाते हैं।”गहमर गांव की संगीता के पति झब्बूराम सीमा सड़क सुरक्षा विभाग में अफ्सर थे। 15 अगस्त 2017 में उनका निधन हो गया। उन्हें अब हर महीने 12 हजार पेंशन मिल रही है। वो चाहती हैं कि उनके दोनों बच्चे पढ़-लिखकर सेना में जाएं।हमने उनसे सवाल किया कि क्या यहां की महिलाओं को अपने बच्चों को सेना में भेजने में डर नहीं लगता ? उन्होंने जवाब दिया,”गांव की मन्यता है कि यहां की कुलदेवी मां कामख्या सेना में गए हर बच्चे की रक्षा करती हैं। जब माता हमारे बच्चों की रक्षा कर रही हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है। यहां बच्चों का नाम सेना में आने पर महिलाएं मिठाईयां बांटती हैं।”गहमर गांव में प्राथमिक विद्यालय से लेकर डिग्री कॉलेज बना है…24 घंटे अस्पताल की सुविधागहमर गांव के पंचायत भवन में बड़ी पानी की टंकी है। इससे गांव के सभी घरों में पानी की 24 घंटे सप्लाई रहती है। यहां के स्वास्थ्य केंद्र पर महिलाओं और बच्चों को सभी तरह की सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी मिलती रहती है।गहमर गांव गाजीपुर की जमानिया विधानसभा में आता है। इस गांव को 1530 में राजा धामदेव राव ने बसाया था। गांव में घुसते ही आपको घरों के बाहर लगी नेम प्लेट पर भूतपूर्व सैनिक, भारतीय सेना और फौजी जैसे शब्द दिखाई देंगे।गहमर में 1 लाख 30 हजार लोगों की आबादी है। लगभग 60% लोग राजपूत बिरादरी के हैं। यहां यादव, वर्मा और ब्राम्हण वर्ग के लोग भी हैं। गांव का खुद का रेलवे स्टेशन भी है। यहां से 20 से ज्यादा ट्रेनें गुजरती हैं। पढ़ाई-लिखाई के लिए डिग्री कॉलेज,इंटर कॉलेज,प्राथमिक विद्यालय हैं। क्योंकि यहां के बच्चे खूब पसीना बहाते हैं। इसलिए उन्हें फिट रखने के लिए यहां स्वास्थ केंद्र भी है, जहां 24 घंटे ट्रीटमेंट की सुविधा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *