कांग्रेस के दिवंगत नेता के खिलाफ कोर्ट ने जारी कर दिया गैर जमानती वारंट

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2009 में आदर्श चुनाव आचार संहिता के उलंघन से जुड़े एक मामले में ईशीपुर बाराहाट थाने में सदानंद सिंह, पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, सैयद शाहनवाज हुसैन, दीपनारायण पासवान, दीप्तेंद्र वर्णवाल आदि को नामजद आरोपित बनाया गया था।

बिहार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दिवंगत सदानंद सिंह के खिलाफ एक अदालत ने गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। मामले का खुलासा होने पर भी स्थानीय पुलिस ने इसके बारे में कोर्ट को सूचित नहीं किया है। ईशीपुर बाराहाट पुलिस की इस लापरवाही की चर्चा हर तरफ हो रही है। दिवंगत सदानंद सिंह भागलपुर की कहलगांव विधानसभा सीट से 12 बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें से 9 बार जीत दर्ज की है। उनके नाम सबसे ज्यादा बार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है। साल 2015 में वह कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बावजूद अपनी सीट बचाने में सफल रहे थे। अपने समय में उनकी गिनती कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं में की जाती थी। 8 सितंबर 2021 को उनका निधन हो गया था।

2009 में आदर्श चुनाव आचार संहिता के उलंघन से जुड़े एक मामले में ईशीपुर बाराहाट थाने में सदानंद सिंह, पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, सैयद शाहनवाज हुसैन, दीपनारायण पासवान, दीप्तेंद्र वर्णवाल आदि को नामजद आरोपित बनाया गया था। मामले में 14 अप्रैल 2010 में न्यायालय में ईशीपुर-बाराहाट थाने में तैनात जांचकर्ता सहायक अवर निरीक्षक महेंद्र प्रसाद सिंह ने आरोप पत्र दाखिल किया था।

गैर जमानती वारंट एमपी-एमएलए कोर्ट एसीजेएम-प्रथम प्रबल दत्ता की अदालत ने जारी किया है। इस मामले में सदानंद सिंह के अलावा दीपनारायण पासवान और दीप्तेंद्र वर्णवाल भी आरोपी हैं। मामले में गवाह पहले ही अपनी गवाही दे चुके थे। नेताओं की उपस्थिति नहीं होने पर कोर्ट ने बांड रद कर उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया।

सदानंद सिंह 2000 से 2005 तक बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। साथ ही 1990 से 1993 तक जिला कांग्रेस कमेटी, भागलपुर के अध्यक्ष रहे। वह बिहार प्रदेश कमेटी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष भी रहे हैं। करीब 10 साल से वह कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। सदानंद सिंह बिहार सरकार में सिंचाई और ऊर्जा राज्यमंत्री चुके हैं।

साल 1969 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। 1985 में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया, जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। सदानंद को 1990 और 1995 के चुनाव में जनता दल और 2005 में जेडीयू प्रत्याशी के सामने हार का सामना करना पड़ा था।

2009 में आदर्श चुनाव आचार संहिता के उलंघन से जुड़े एक मामले में ईशीपुर बाराहाट थाने में सदानंद सिंह, पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, सैयद शाहनवाज हुसैन, दीपनारायण पासवान, दीप्तेंद्र वर्णवाल आदि को नामजद आरोपित बनाया गया था। बिहार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दिवंगत सदानंद सिंह के खिलाफ एक अदालत ने गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। मामले का खुलासा होने पर भी स्थानीय पुलिस ने इसके बारे में कोर्ट को सूचित नहीं किया है। ईशीपुर बाराहाट पुलिस की इस लापरवाही की चर्चा हर तरफ हो रही है। दिवंगत सदानंद सिंह भागलपुर की कहलगांव विधानसभा सीट से 12 बार चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें से 9 बार जीत दर्ज की है। उनके नाम सबसे ज्यादा बार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है। साल 2015 में वह कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बावजूद अपनी सीट बचाने में सफल रहे थे। अपने समय में उनकी गिनती कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं में की जाती थी। 8 सितंबर 2021 को उनका निधन हो गया था। 2009 में आदर्श चुनाव आचार संहिता के उलंघन से जुड़े एक मामले में ईशीपुर बाराहाट थाने में सदानंद सिंह, पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, सैयद शाहनवाज हुसैन, दीपनारायण पासवान, दीप्तेंद्र वर्णवाल आदि को नामजद आरोपित बनाया गया था। मामले में 14 अप्रैल 2010 में न्यायालय में ईशीपुर-बाराहाट थाने में तैनात जांचकर्ता सहायक अवर निरीक्षक महेंद्र प्रसाद सिंह ने आरोप पत्र दाखिल किया था। गैर जमानती वारंट एमपी-एमएलए कोर्ट एसीजेएम-प्रथम प्रबल दत्ता की अदालत ने जारी किया है। इस मामले में सदानंद सिंह के अलावा दीपनारायण पासवान और दीप्तेंद्र वर्णवाल भी आरोपी हैं। मामले में गवाह पहले ही अपनी गवाही दे चुके थे। नेताओं की उपस्थिति नहीं होने पर कोर्ट ने बांड रद कर उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। सदानंद सिंह 2000 से 2005 तक बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। साथ ही 1990 से 1993 तक जिला कांग्रेस कमेटी, भागलपुर के अध्यक्ष रहे। वह बिहार प्रदेश कमेटी के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष भी रहे हैं। करीब 10 साल से वह कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं। सदानंद सिंह बिहार सरकार में सिंचाई और ऊर्जा राज्यमंत्री चुके हैं। साल 1969 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। 1985 में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया, जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। सदानंद को 1990 और 1995 के चुनाव में जनता दल और 2005 में जेडीयू प्रत्याशी के सामने हार का सामना करना पड़ा था।

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