
आलोक कुमार- आपको घोटाले का कब से शक हुआ?
विजय शंकर दुबे- साल 1995-96 में बिहार सरकार की माली हालत इतनी खराब थी कि सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह भी नहीं मिल रही थी। मेरी नियुक्ति वित्त विभाग के प्रमुख सचिव के तौर पर हुई थी। मैंने जुलाई 1995 में पद संभाला।चूंकि हमारी स्थिति कर्मचारियों को वेतन देने की भी नहीं थी, मेरे मन में सवाल आया कि आखिर पैसे जा कहां रहे हैं?
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आलोक कुमार- फिर आपने क्या किया?
विजय शंकर दुबे- इसके बाद सितंबर-अक्टूबर में हमें पता चला कि पशुपालन विभाग तय बजट से पांच गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। मुझे गड़बड़ी की आशंका हो गई। अगले साल 19 जनवरी तक हम इस नतीजे पर पहुंचे कि पशुपालन विभाग लगातार बजट से ज्यादा खर्च कर रहा है। यह मेरे लिए चौंकाने वाला था। मैंने अपने सहकर्मियों से बात की और सभी जिलाधीशों को एक लाइन का एक फैक्स भेजा, जिसमें लिखा था ‘पशुपालन विभाग के पिछले तीन सालों के खर्च का ब्यौरा पेश करें।’
आपको बता दें कि विजय शंकर दुबे का यही एक लाइन का फैक्स था जिसने चारा घोटाले का खुलासा करने की ओर पहला कदम बढ़ाया।
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आलोक कुमार- आपको अपने फैक्स के जवाब में क्या मिला?
विजय शंकर दुबे- इस एक मैसेज ने जैसे ‘भानुमती का पिटारा’ खोल दिया। 20 जनवरी को मैंने अपने एक एडिशनल सेक्रेटरी को रांची भेजा ताकि वह पता लगा सकें कि तीन सालों में ये पैसे कहां खर्च हुए। 21 जनवरी को उन्होंने जानकारी दी कि बजट से ज्यादा खर्च करने के साथ-साथ पैसे निकालने के लिए जो बिल और वाउचर जमा किए गए हैं वे सभी फर्जी हैं।
आलोक कुमार- फर्जी बिलों की जानकारी मिलने के बाद आपने क्या किया?
विजय शंकर दुबे- मैंने उनसे कहा कि सभी बिलों को सीज कर वापस आ जाएं. वह 22 जनवरी को पटना लौट आए सभी दस्तावेजों की छानबीन के बाद मैंने अगले दिन राज्य सरकार को एक फाइल भेजी जिसमें इस बात का पूरा विवरण था कि रांची में कैसे एक बड़ा घोटाला हुआ है। मैंने संदिग्धों के खिलाफ FIR दर्ज करने का सुझाव दिया था।
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आलोक कुमार- सरकार ने इस पर ऐक्शन कब लिया?
विजय शंकर दुबे- सरकार ने इसे छिपाकर रखा हालांकि सभी जिला कलेक्टरों ने मेरे निर्देश के बाद एक्शन लेना शुरू कर दिया था। 27 जनवरी 1996 को मैंने चाईबासा जिले के कलेक्टर को निर्देशित किया कि वह चाईबासा ट्रेजरी में रेड मारें। इस रेड में जो सामने आया उसने पूरे देश में खलबली मचा दी। इस रेड के बाद चारा सप्लायर्स और कई कर्मचारी अंडरग्राउंड हो गए। तब भी राज्य सरकार ने मेरे सुझाव पर गौर नहीं किया।
आलोक कुमार- तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने तब क्या किया?
विजय शंकर दुबे- लालू यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। सरकार ने 30 जनवरी को मेरे सुझाव के आधार पर कदम उठाए. 23 से 30 जनवरी के बीच कई चीजें हुईं, आप समझ सकते हैं कि राजनेताओं ने क्या-क्या करने की कोशिश की होगी। लेकिन इस पूरे सप्ताह दुमका, रांची और अन्य जिलों में रेड से निकलने वाली जानकारी मीडिया में छाई रही। हालांकि किसी ने मुझ पर दबाव डालने की कोशिश नहीं की लेकिन सरकार के लोगों ने जांच में देरी करने की कोशिश जरूर की। लेकिन तब तक उनके लिए बहुत देर हो चुकी थी और घोटाला सामने आ चुका था। यह 300 करोड़ से अधिक का घोटाला था।
आलोक कुमार- इस मामले में सीबीआई की एंट्री कैसे हुई?
विजय शंकर दुबे- इस साल के अंत में विपक्ष के दबाव में राज्य सरकार ने सीबीआई जांच का सुझाव दिया और 50 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। साल 1997 में 23 जून को सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले का आरोपी बनाया जिसके चलते उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी।
नोट- विजय शंकर दुबे बिहार और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव रह चुके हैं. 1966 बैच के आईएएस अधिकारी दुबे साल 2002 में रिटायर हुए. इसके बाद उन्होंने साल 2003 से 2009 तक नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी में कुलसचिव के रूप में सेवाएं दीं।
पटना: बिहार और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे इस आलेख में बता रहे हैं कि कैसी सैकड़ों करोड़ का चारा घोटाला सामने आया और कैसे तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनसे इस मामले में बात की नवभारत टाइम्स के संपादक आलोक कुमार ने। तीन साल पहले ये बातचीत तब हुई थी जब नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के संपादक आलोक कुमार ने दुमका ट्रेजरी केस में फैसला आने पर विजय शंकर दुबे से बात की थी। विजय शंकर दुबे ने इस इंटरव्यू में न सिर्फ चारा घोटाले की पूरी कहानी बताई बल्कि ये भी बताया कि आखिर कैसे उनके फैक्स की एक लाइन ने बिहार के इस चर्चित और सबसे बड़े घोटाले की परतें छील डालीं। पढ़िए ये आलेख…आलोक कुमार- आपको घोटाले का कब से शक हुआ?विजय शंकर दुबे- साल 1995-96 में बिहार सरकार की माली हालत इतनी खराब थी कि सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह भी नहीं मिल रही थी। मेरी नियुक्ति वित्त विभाग के प्रमुख सचिव के तौर पर हुई थी। मैंने जुलाई 1995 में पद संभाला।चूंकि हमारी स्थिति कर्मचारियों को वेतन देने की भी नहीं थी, मेरे मन में सवाल आया कि आखिर पैसे जा कहां रहे हैं?Chara Ghotala Case : हरियाणा-दिल्ली से 400 सांड स्कूटर पर पहुंचा दिए गए थे रांची, सैकड़ों टन अनाज तो मोपेड पर आया… ये था चारा घोटालाआलोक कुमार- फिर आपने क्या किया?विजय शंकर दुबे- इसके बाद सितंबर-अक्टूबर में हमें पता चला कि पशुपालन विभाग तय बजट से पांच गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। मुझे गड़बड़ी की आशंका हो गई। अगले साल 19 जनवरी तक हम इस नतीजे पर पहुंचे कि पशुपालन विभाग लगातार बजट से ज्यादा खर्च कर रहा है। यह मेरे लिए चौंकाने वाला था। मैंने अपने सहकर्मियों से बात की और सभी जिलाधीशों को एक लाइन का एक फैक्स भेजा, जिसमें लिखा था ‘पशुपालन विभाग के पिछले तीन सालों के खर्च का ब्यौरा पेश करें।’आपको बता दें कि विजय शंकर दुबे का यही एक लाइन का फैक्स था जिसने चारा घोटाले का खुलासा करने की ओर पहला कदम बढ़ाया। Chara Ghotala Story : ऐसा घपला जिसमें सीबीआई को 16 ट्रकों में भरकर कोर्ट लाने पड़े दस्तावेजी सबूत, चाराखोर नेताओं-अफसरों-डॉक्टरों के त्रिकोण की साजिशआलोक कुमार- आपको अपने फैक्स के जवाब में क्या मिला?विजय शंकर दुबे- इस एक मैसेज ने जैसे ‘भानुमती का पिटारा’ खोल दिया। 20 जनवरी को मैंने अपने एक एडिशनल सेक्रेटरी को रांची भेजा ताकि वह पता लगा सकें कि तीन सालों में ये पैसे कहां खर्च हुए। 21 जनवरी को उन्होंने जानकारी दी कि बजट से ज्यादा खर्च करने के साथ-साथ पैसे निकालने के लिए जो बिल और वाउचर जमा किए गए हैं वे सभी फर्जी हैं।आलोक कुमार- फर्जी बिलों की जानकारी मिलने के बाद आपने क्या किया?विजय शंकर दुबे- मैंने उनसे कहा कि सभी बिलों को सीज कर वापस आ जाएं. वह 22 जनवरी को पटना लौट आए सभी दस्तावेजों की छानबीन के बाद मैंने अगले दिन राज्य सरकार को एक फाइल भेजी जिसमें इस बात का पूरा विवरण था कि रांची में कैसे एक बड़ा घोटाला हुआ है। मैंने संदिग्धों के खिलाफ FIR दर्ज करने का सुझाव दिया था।Chara Ghotala : चारा घोटाले में लालू समेत 75 दोषी और 24 बरी, जानिए सीबीआई कोर्ट के फैसले की बड़ी बातेंआलोक कुमार- सरकार ने इस पर ऐक्शन कब लिया?विजय शंकर दुबे- सरकार ने इसे छिपाकर रखा हालांकि सभी जिला कलेक्टरों ने मेरे निर्देश के बाद एक्शन लेना शुरू कर दिया था। 27 जनवरी 1996 को मैंने चाईबासा जिले के कलेक्टर को निर्देशित किया कि वह चाईबासा ट्रेजरी में रेड मारें। इस रेड में जो सामने आया उसने पूरे देश में खलबली मचा दी। इस रेड के बाद चारा सप्लायर्स और कई कर्मचारी अंडरग्राउंड हो गए। तब भी राज्य सरकार ने मेरे सुझाव पर गौर नहीं किया।आलोक कुमार- तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने तब क्या किया?विजय शंकर दुबे- लालू यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। सरकार ने 30 जनवरी को मेरे सुझाव के आधार पर कदम उठाए. 23 से 30 जनवरी के बीच कई चीजें हुईं, आप समझ सकते हैं कि राजनेताओं ने क्या-क्या करने की कोशिश की होगी। लेकिन इस पूरे सप्ताह दुमका, रांची और अन्य जिलों में रेड से निकलने वाली जानकारी मीडिया में छाई रही। हालांकि किसी ने मुझ पर दबाव डालने की कोशिश नहीं की लेकिन सरकार के लोगों ने जांच में देरी करने की कोशिश जरूर की। लेकिन तब तक उनके लिए बहुत देर हो चुकी थी और घोटाला सामने आ चुका था। यह 300 करोड़ से अधिक का घोटाला था।आलोक कुमार- इस मामले में सीबीआई की एंट्री कैसे हुई?विजय शंकर दुबे- इस साल के अंत में विपक्ष के दबाव में राज्य सरकार ने सीबीआई जांच का सुझाव दिया और 50 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। साल 1997 में 23 जून को सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले का आरोपी बनाया जिसके चलते उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। नोट- विजय शंकर दुबे बिहार और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव रह चुके हैं. 1966 बैच के आईएएस अधिकारी दुबे साल 2002 में रिटायर हुए. इसके बाद उन्होंने साल 2003 से 2009 तक नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी में कुलसचिव के रूप में सेवाएं दीं।