
विजय हजारे ट्रॉफी के फाइनल में तमिलनाडु को हराकर हिमाचल प्रदेश ने पहला बड़ा खिताब अपने नाम किया। कप्तान ऋषि धवन के ऑलराउंड खेल और मैन ऑफ द मैच ओपनर शुभम अरोड़ा (नाबाद 136) के अलावा ‘तीसरी शक्ति’ ने भी हिमाचल का साथ दिया। यह अदृश्य शक्ति थी मौसम, जिसने मैच पूरा होने से पहले ही हिमाचल को चैंपियन बना दिया। खराब रोशनी के चलते मैच का नतीजा वीजेडी प्रणाली (VJD method) से निकाला गया। ऐसे में आइए आज आपको समझाते हैं, क्या है ये वीजेडी प्रणाली, कैसे की जाती है इसकी गणना और किस तरह यह डकवर्थ लुईस मैथड से अलग है।
क्या है VJD मैथड?
वीजेडी प्रणाली बारिश से बाधित सीमित ओवरों के क्रिकेट मैचों में लक्ष्य स्कोर की गणना करने की एक विधि है, जिसे केरल के एक सिविल इंजीनियर वी. जयदेवन ने तैयार किया था। इसे डीएलएस (डकवर्थ, लुईस और स्टर्न) पद्धति के विकल्प के रूप में देखा जाता है। वीजेडी पद्धति का इस्तेमाल पहले इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) में किया जाता था। तमिलनाडु प्रीमियर लीग (TNPL) में आज भी इसी तकनीक से रन चेज काउंट किया जाता है। आईपीएल के चौथे और पांचवें सीजन में इसके इस्तेमाल पर बातचीत भी हुई थी।
2012 में ICC ने ठुकराया था ऑफर
इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी ICC के सामने जयदेवन ने नौ साल पहले अपने वीजेडी मैथड का प्रस्ताव रखा था। तब आईसीसी ने यह कहकर इस प्रणाली को खारिज कर दिया था कि डकवर्थ लुईस मैथड में कोई खामी नहीं है। यह फैसला एक कमेटी ने सर्वसम्मति से लिया था। साथ ही कमेटी को ये भी भरोसा था कि वीजेडी पद्धति से शायद ही डकवर्थ लुईस सिस्टम में कोई सुधार किया जा सके। तब जयदेवन ने इसका विरोध किया था कि उनकी निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई।
वीजेडी मैथड की खासियत
इस प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा है कि यह पिछले खेलों के आंकड़े लेती है और टीम के हालिया फॉर्म को ध्यान में नहीं रखती है। इसमें पारी को अलग-अलग हिस्सों में बांटते हैं। शुरुआती ओवर्स- जिसमें फिल्ड रिस्ट्रिक्शन के चलते तेजी से रन बनते हैं। बीच के ओवरों में रनरेट धीमा होता है और अंतिम ओवरों में फिर बढ़ जाता है। इस नियम इस वजह से भी और व्यव्हारिक हो जाता है क्योंकि पूरे मैच के दौरान खिलाड़ी एक सरीखा खेल ही नहीं सकता। हर स्टेज पर अपनी अलग अप्रोच रखता है।
सूर्यकुमार यादव का एक और धमाका, 152 गेंदों में 249 रन ठोकने के बाद किसे दिया अपना इनाम
DLS से कितना अलग है VJD नियम
DLS मैथड में ये मान लिया जाता है कि पारी के दौरान स्कोरिंग रेट लगातार बढ़ता ही जाएगा। इसी के तहत मौसम खराब होने पर लक्ष्य निर्धारित किया जाता है।
दोनों सिस्टम में लक्ष्य कैसे अलग हो सकता है
- टीम 1 स्कोर- 150: DLS टारगेट 93, VJD टारगेट 91
- टीम 1 स्कोर- 200: DLS टारगेट 124, VJD टारगेट 118
- टीम 1 स्कोर- 250: DLS टारगेट 154, VJD टारगेट 142
- टीम 1 स्कोर- 300: DLS टारगेट 163, VJD टारगेट 163
- टीम 1 स्कोर- 350: DLS टारगेट 174, VJD टारगेट 182
जयपुरविजय हजारे ट्रॉफी के फाइनल में तमिलनाडु को हराकर हिमाचल प्रदेश ने पहला बड़ा खिताब अपने नाम किया। कप्तान ऋषि धवन के ऑलराउंड खेल और मैन ऑफ द मैच ओपनर शुभम अरोड़ा (नाबाद 136) के अलावा ‘तीसरी शक्ति’ ने भी हिमाचल का साथ दिया। यह अदृश्य शक्ति थी मौसम, जिसने मैच पूरा होने से पहले ही हिमाचल को चैंपियन बना दिया। खराब रोशनी के चलते मैच का नतीजा वीजेडी प्रणाली (VJD method) से निकाला गया। ऐसे में आइए आज आपको समझाते हैं, क्या है ये वीजेडी प्रणाली, कैसे की जाती है इसकी गणना और किस तरह यह डकवर्थ लुईस मैथड से अलग है।क्या है VJD मैथड?वीजेडी प्रणाली बारिश से बाधित सीमित ओवरों के क्रिकेट मैचों में लक्ष्य स्कोर की गणना करने की एक विधि है, जिसे केरल के एक सिविल इंजीनियर वी. जयदेवन ने तैयार किया था। इसे डीएलएस (डकवर्थ, लुईस और स्टर्न) पद्धति के विकल्प के रूप में देखा जाता है। वीजेडी पद्धति का इस्तेमाल पहले इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) में किया जाता था। तमिलनाडु प्रीमियर लीग (TNPL) में आज भी इसी तकनीक से रन चेज काउंट किया जाता है। आईपीएल के चौथे और पांचवें सीजन में इसके इस्तेमाल पर बातचीत भी हुई थी।Himachal Pradesh win Vijay Hazare Trophy: दिनेश कार्तिक के शतक पर शुभम ने फेरा पानी, हिमाचल ने पहला खिताब2012 में ICC ने ठुकराया था ऑफरइंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी ICC के सामने जयदेवन ने नौ साल पहले अपने वीजेडी मैथड का प्रस्ताव रखा था। तब आईसीसी ने यह कहकर इस प्रणाली को खारिज कर दिया था कि डकवर्थ लुईस मैथड में कोई खामी नहीं है। यह फैसला एक कमेटी ने सर्वसम्मति से लिया था। साथ ही कमेटी को ये भी भरोसा था कि वीजेडी पद्धति से शायद ही डकवर्थ लुईस सिस्टम में कोई सुधार किया जा सके। तब जयदेवन ने इसका विरोध किया था कि उनकी निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई।IPL चैंपियन ने छोड़ा देश, टीम इंडिया में नहीं मिला मौका तो अमेरिका जा बसावीजेडी मैथड की खासियतइस प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा है कि यह पिछले खेलों के आंकड़े लेती है और टीम के हालिया फॉर्म को ध्यान में नहीं रखती है। इसमें पारी को अलग-अलग हिस्सों में बांटते हैं। शुरुआती ओवर्स- जिसमें फिल्ड रिस्ट्रिक्शन के चलते तेजी से रन बनते हैं। बीच के ओवरों में रनरेट धीमा होता है और अंतिम ओवरों में फिर बढ़ जाता है। इस नियम इस वजह से भी और व्यव्हारिक हो जाता है क्योंकि पूरे मैच के दौरान खिलाड़ी एक सरीखा खेल ही नहीं सकता। हर स्टेज पर अपनी अलग अप्रोच रखता है।सूर्यकुमार यादव का एक और धमाका, 152 गेंदों में 249 रन ठोकने के बाद किसे दिया अपना इनामDLS से कितना अलग है VJD नियमDLS मैथड में ये मान लिया जाता है कि पारी के दौरान स्कोरिंग रेट लगातार बढ़ता ही जाएगा। इसी के तहत मौसम खराब होने पर लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। दोनों सिस्टम में लक्ष्य कैसे अलग हो सकता हैटीम 1 स्कोर- 150: DLS टारगेट 93, VJD टारगेट 91टीम 1 स्कोर- 200: DLS टारगेट 124, VJD टारगेट 118टीम 1 स्कोर- 250: DLS टारगेट 154, VJD टारगेट 142टीम 1 स्कोर- 300: DLS टारगेट 163, VJD टारगेट 163टीम 1 स्कोर- 350: DLS टारगेट 174, VJD टारगेट 182
