Newborn jaundice: नवजात बच्चों को रहता है पीलिया का खतरा, जानिये इसकी वजह और बचाव का तरीका

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बच्चे को पीलिया है उसकी जांच बाल रोग विशेषज्ञों से कराएं। इससे शरीर में बिलीरूबिन की सही मात्रा का पता लगाया जा सकता है। photo-freepik

नवजात बच्चों में पीलिया की परेशानी होना आम बात है। न्यू बॉर्न बेबी को पीलिया होना एक ऐसी स्थिति है जिसमें त्वचा और आंखों का सफेद भाग पीला हो जाता है। न्यू बॉर्न बेबी को होने वाला पीलिया वयस्कों को होने वाले पीलिया से काफी अलग होता है। डॉ शशिधर विश्वनाथ, नियोनेटोलॉजी और बाल रोग के प्रमुख सलाहकार, स्पर्श अस्पताल फॉर विमेन एंड चिल्ड्रेन ने बताया है कि बच्चों और बड़ों को होने वाले पीलिये के कारण और उपचार बहुत अलग होते हैं।

एक्सपर्ट के मुताबिक लगभग 80 प्रतिशत बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं, और 60 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पीलिया होता है। इनमें से 10 प्रतिशत को ‘फोटोथेरेपी’ की आवश्यकता होती है। फोटोथेरेपी’ एक ऐसी तकनीक है जिसमें विशेष रोशनी के साथ बच्चे का उपचार किया जाता है।

नवजात शिशुओं में पीलिया का कारण क्या है? बच्चों में पीलिया की परेशानी बिलीरुबीन के अधिक होने के कारण होती है। डॉ विश्वनाथ ने के मुताबिक सभी बच्चे वयस्कों की तुलना में अधिक लाल रक्त कोशिकाओं के साथ पैदा होते हैं। ये लाल रक्त कोशिकाएं जन्म के बाद टूट जाती हैं, जिससे रक्त में बिलीरुबिन जमा हो जाता है। लीवर रक्त से बिलीरूबिन को बाहर निकालने लगता है। शिशुओं का इमैच्योर लीवर रक्त प्रवाह से बिलीरूबिन को निकालने में नाकामयाब होता है जिसके कारण बच्चों में पीलिया होता है।

पीलिया का शिशु पर असर: पीलिया के कारण बच्चा थका हुआ, नींद में और सुस्त हो सकता है। उसे मां का दूध पीना अच्छा नहीं लगता जिससे उसकी बॉडी में डिहाइड्रेशन की परेशानी हो सकती है। गंभीर मामलों में बच्चे को दौरे पड़ सकते हैं और उसकी मौत भी हो सकती है।

पीलिया का जोखिम किन बच्चों को होता है: समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में, गंभीर संक्रमण, डायबिटिक मदर से पैदा होने वाले बच्चे को पीलिया का खतरा बढ़ जाता है।

रोकथाम और देखभाल
अस्पताल में डिस्चार्ज से पहले करें बच्चे का मूल्यांकन: बच्चे को पीलिया है उसकी जांच बाल रोग विशेषज्ञों से कराएं। इससे शरीर में बिलीरूबिन की सही मात्रा का पता लगाया जा सकता है। कुछ चिकित्सक उपकरणों के जरिए बिलीरुबिन को मापा जा सकता है। डॉक्टर पीलिया की गंभीर स्थिति को समझ कर आपको जरूरी सलाह देंगे कि कैसे बच्चे को इस परेशानी से बचाया जा सकता है।

बच्चे की बारीकी से जांच करें: पहले दो हफ्तों में बच्चों की बीरीकी से जांच करना जरूरी है। पीलिया की वजह से बच्चे का वजन घटने-बढ़ने और सामान्य गतिविधि के संकेतों का बारीकी से आकलन करने की आवश्यकता होती है।

लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल ले जाएं: बच्चे की बॉडी में पीलिये के संकेत दिखने पर तुरंत पैरेंट्स एक्शन लें। बच्चे को अस्पताल ले जाएं। बच्चे को फीडिंग सपोर्ट और फोटोथेरेपी कराएं।

बच्चे का टेस्ट कराएं: बच्चे में पीलिये की स्थिति की जांच करने के लिए कॉम्ब्स टेस्ट करवाया जा सकता है जो शरीर में एंटीबॉडी की जांच करता है। इससे डेड रेड सेल्स का पता लगाया जा सकता है।

बच्चे को पीलिया है उसकी जांच बाल रोग विशेषज्ञों से कराएं। इससे शरीर में बिलीरूबिन की सही मात्रा का पता लगाया जा सकता है। photo-freepik नवजात बच्चों में पीलिया की परेशानी होना आम बात है। न्यू बॉर्न बेबी को पीलिया होना एक ऐसी स्थिति है जिसमें त्वचा और आंखों का सफेद भाग पीला हो जाता है। न्यू बॉर्न बेबी को होने वाला पीलिया वयस्कों को होने वाले पीलिया से काफी अलग होता है। डॉ शशिधर विश्वनाथ, नियोनेटोलॉजी और बाल रोग के प्रमुख सलाहकार, स्पर्श अस्पताल फॉर विमेन एंड चिल्ड्रेन ने बताया है कि बच्चों और बड़ों को होने वाले पीलिये के कारण और उपचार बहुत अलग होते हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक लगभग 80 प्रतिशत बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं, और 60 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पीलिया होता है। इनमें से 10 प्रतिशत को ‘फोटोथेरेपी’ की आवश्यकता होती है। फोटोथेरेपी’ एक ऐसी तकनीक है जिसमें विशेष रोशनी के साथ बच्चे का उपचार किया जाता है। नवजात शिशुओं में पीलिया का कारण क्या है? बच्चों में पीलिया की परेशानी बिलीरुबीन के अधिक होने के कारण होती है। डॉ विश्वनाथ ने के मुताबिक सभी बच्चे वयस्कों की तुलना में अधिक लाल रक्त कोशिकाओं के साथ पैदा होते हैं। ये लाल रक्त कोशिकाएं जन्म के बाद टूट जाती हैं, जिससे रक्त में बिलीरुबिन जमा हो जाता है। लीवर रक्त से बिलीरूबिन को बाहर निकालने लगता है। शिशुओं का इमैच्योर लीवर रक्त प्रवाह से बिलीरूबिन को निकालने में नाकामयाब होता है जिसके कारण बच्चों में पीलिया होता है। पीलिया का शिशु पर असर: पीलिया के कारण बच्चा थका हुआ, नींद में और सुस्त हो सकता है। उसे मां का दूध पीना अच्छा नहीं लगता जिससे उसकी बॉडी में डिहाइड्रेशन की परेशानी हो सकती है। गंभीर मामलों में बच्चे को दौरे पड़ सकते हैं और उसकी मौत भी हो सकती है। पीलिया का जोखिम किन बच्चों को होता है: समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में, गंभीर संक्रमण, डायबिटिक मदर से पैदा होने वाले बच्चे को पीलिया का खतरा बढ़ जाता है। रोकथाम और देखभालअस्पताल में डिस्चार्ज से पहले करें बच्चे का मूल्यांकन: बच्चे को पीलिया है उसकी जांच बाल रोग विशेषज्ञों से कराएं। इससे शरीर में बिलीरूबिन की सही मात्रा का पता लगाया जा सकता है। कुछ चिकित्सक उपकरणों के जरिए बिलीरुबिन को मापा जा सकता है। डॉक्टर पीलिया की गंभीर स्थिति को समझ कर आपको जरूरी सलाह देंगे कि कैसे बच्चे को इस परेशानी से बचाया जा सकता है। बच्चे की बारीकी से जांच करें: पहले दो हफ्तों में बच्चों की बीरीकी से जांच करना जरूरी है। पीलिया की वजह से बच्चे का वजन घटने-बढ़ने और सामान्य गतिविधि के संकेतों का बारीकी से आकलन करने की आवश्यकता होती है। लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल ले जाएं: बच्चे की बॉडी में पीलिये के संकेत दिखने पर तुरंत पैरेंट्स एक्शन लें। बच्चे को अस्पताल ले जाएं। बच्चे को फीडिंग सपोर्ट और फोटोथेरेपी कराएं। बच्चे का टेस्ट कराएं: बच्चे में पीलिये की स्थिति की जांच करने के लिए कॉम्ब्स टेस्ट करवाया जा सकता है जो शरीर में एंटीबॉडी की जांच करता है। इससे डेड रेड सेल्स का पता लगाया जा सकता है।

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