कोरोना का मेंटल हेल्थ पर अटैक:रिसर्च में दावा

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कोरोना वायरस का संक्रमण शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। लैंसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया रिसर्च के अनुसार, कोरोना के गंभीर मरीजों में लॉन्ग टर्म मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा ज्यादा होता है।

2 लाख 47 हजार लोगों पर हुई स्टडी

रिसर्च में कोरोना से जुड़ी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स पर गौर किया गया।

रिसर्च में कोरोना से जुड़ी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स पर गौर किया गया।

रिसर्च में कोरोना से जुड़ी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स जैसे डिप्रेशन, नींद में गड़बड़ी और एंग्जाइटी पर गौर किया गया। इसके लिए ब्रिटेन, स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड, एस्टोनिया और नॉर्वे के लोगों पर 16 महीनों तक स्टडी की गई।

रिसर्च में कोरोना मरीज भी शामिल थे और जिन्हें कभी संक्रमण नहीं हुआ वो भी। 2,47,249 लोगों में से 9,979 यानी 4% को फरवरी 2020 से अगस्त 2021 के बीच कोरोना हुआ।

कोरोना मरीजों में डिप्रेशन का खतरा ज्यादा

रिसर्च कहती है कि अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा खराब होता है।

रिसर्च कहती है कि अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा खराब होता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोना की चपेट में आए लोगों को मानसिक समस्याएं विकसित करने का खतरा ज्यादा होता है। जहां संक्रमण रहित लोगों में से 11.3% ने डिप्रेशन के लक्षण अनुभव किए, वहीं कोरोना से पीड़ित लोगों में से 20.2% को ये लक्षण आए। इस दौरान 29.4% संक्रमण रहित लोगों और 23.8% कोरोना मरीजों की स्लीप क्वालिटी खराब हुई।

रिसर्च कहती है कि घर पर रिकवर हुए मरीजों के मुकाबले अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा खराब होता है। इसके साथ ही, जिन लोगों ने कोरोना संक्रमण की वजह से एक हफ्ते या उससे ज्यादा का समय बिस्तर पर बिताया, उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी का खतरा 50-60% बढ़ गया।

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि ऐसे संक्रमित मरीज जिन्हें हॉस्पिटलाइज नहीं होना पड़ा, उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी के लक्षण अधिकतर दो महीने के अंदर ही कम हो गए।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोना के बाद होने वाली बीमारियों पर भी नजर रखना जरूरी है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोना के बाद होने वाली बीमारियों पर भी नजर रखना जरूरी है।

रिसर्च में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ आइसलैंड के प्रोफेसर उन्नूर अन्ना वाल्डिमार्सडॉटिर कहते हैं कि गंभीर कोरोना मरीजों में लॉन्ग टर्म मानसिक समस्याओं को देखने वाली यह पहली रिसर्च है। यह स्टडी बताती है कि कोरोना संक्रमण के लेवल के आधार पर आपकी मेंटल हेल्थ प्रभावित होती है।

प्रोफेसर उन्नूर कहते हैं कि अब हम कोरोना महामारी के तीसरे साल में है। ऐसे में कोरोना के बाद होने वाली दूसरी गंभीर बीमारियों पर भी नजर रखना जरूरी है। इससे लोगों को वक्त पर इलाज मिल सकेगा।

Hindi NewsHappylifeResearch Claims Up To 60% Higher Risk Of Depression, Anxiety In Patients Who Stay In Bed For 7 Daysकोरोना वायरस का संक्रमण शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। लैंसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया रिसर्च के अनुसार, कोरोना के गंभीर मरीजों में लॉन्ग टर्म मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा ज्यादा होता है।2 लाख 47 हजार लोगों पर हुई स्टडीरिसर्च में कोरोना से जुड़ी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स पर गौर किया गया।रिसर्च में कोरोना से जुड़ी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स जैसे डिप्रेशन, नींद में गड़बड़ी और एंग्जाइटी पर गौर किया गया। इसके लिए ब्रिटेन, स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड, एस्टोनिया और नॉर्वे के लोगों पर 16 महीनों तक स्टडी की गई।रिसर्च में कोरोना मरीज भी शामिल थे और जिन्हें कभी संक्रमण नहीं हुआ वो भी। 2,47,249 लोगों में से 9,979 यानी 4% को फरवरी 2020 से अगस्त 2021 के बीच कोरोना हुआ।कोरोना मरीजों में डिप्रेशन का खतरा ज्यादारिसर्च कहती है कि अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा खराब होता है।वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोना की चपेट में आए लोगों को मानसिक समस्याएं विकसित करने का खतरा ज्यादा होता है। जहां संक्रमण रहित लोगों में से 11.3% ने डिप्रेशन के लक्षण अनुभव किए, वहीं कोरोना से पीड़ित लोगों में से 20.2% को ये लक्षण आए। इस दौरान 29.4% संक्रमण रहित लोगों और 23.8% कोरोना मरीजों की स्लीप क्वालिटी खराब हुई।रिसर्च कहती है कि घर पर रिकवर हुए मरीजों के मुकाबले अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा खराब होता है। इसके साथ ही, जिन लोगों ने कोरोना संक्रमण की वजह से एक हफ्ते या उससे ज्यादा का समय बिस्तर पर बिताया, उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी का खतरा 50-60% बढ़ गया।वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि ऐसे संक्रमित मरीज जिन्हें हॉस्पिटलाइज नहीं होना पड़ा, उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी के लक्षण अधिकतर दो महीने के अंदर ही कम हो गए।क्या कहते हैं विशेषज्ञ?वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोना के बाद होने वाली बीमारियों पर भी नजर रखना जरूरी है।रिसर्च में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ आइसलैंड के प्रोफेसर उन्नूर अन्ना वाल्डिमार्सडॉटिर कहते हैं कि गंभीर कोरोना मरीजों में लॉन्ग टर्म मानसिक समस्याओं को देखने वाली यह पहली रिसर्च है। यह स्टडी बताती है कि कोरोना संक्रमण के लेवल के आधार पर आपकी मेंटल हेल्थ प्रभावित होती है।प्रोफेसर उन्नूर कहते हैं कि अब हम कोरोना महामारी के तीसरे साल में है। ऐसे में कोरोना के बाद होने वाली दूसरी गंभीर बीमारियों पर भी नजर रखना जरूरी है। इससे लोगों को वक्त पर इलाज मिल सकेगा।

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