‘तन’ ढकने को देना पड़ता था टैक्स:महिलाओं की छाती ढकी दिखी तो फाड़ देते थे कपड़े, ‘ब्रेस्ट टैक्स’ से मुक्ति को काट दिए स्तन

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5 घंटे पहलेलेखक: राजेश साहू

हिजाब विवाद पर देशभर में हंगामा बरपा हुआ है। कर्नाटक से निकलकर इस विवाद की लपटें दूसरे राज्‍यों में भी फैल रही हैं। कई राज्‍यों में इसके पक्ष में जोरदार प्रदर्शन हुए हैं। इसने राज्‍यों में अलग तरह की चुनौतियां पैदा कर दी हैं। लेकिन सिर ढकने की इस लड़ाई के बीच भारत के इतिहास पर नजर डालें तो एक दौर ऐसा भी था जब महिलाओं को अपने स्तन ढकने की भी मनाही थी। 19वीं सदी में दलित महिलाओं की छाती पर कपड़ा या ब्लाउज दिखते ही चाकू से खींचकर फाड़ दिया जाता था। महिलाओं के साथ इस तरह की ऊंच नीच और भेदभाव की दास्तां कब और कैसे शुरू हुई, जानिए विस्तार से….

दलित महिलाएं चुकाती थीं ‘ब्रेस्ट टैक्स’
1729, मद्रास प्रेसीडेंसी में त्रावणकोर साम्राज्य की स्थापना हुई। राजा थे मार्थंड वर्मा। साम्राज्य बना तो नियम-कानून बने। टैक्स लेने का सिस्टम बनाया गया। जैसे आज हाउस टैक्स, सेल टैक्स और जीएसटी, लेकिन एक टैक्स और बनाया गया…ब्रेस्ट टैक्स मतलब स्तन कर। ये कर दलित और ओबीसी वर्ग की महिलाओं पर लगाया गया।

ब्रेस्ट साइज के हिसाब से टैक्स
त्रावणकोर में निचली जाति की महिलाएं सिर्फ कमर तक कपड़ा पहन सकती थी। अफसरों और ऊंची जाति के लोगों के सामने वे जब भी गुजरती उन्हें अपनी छाती खुली रखनी पड़ती थी। अगर महिलाएं छाती ढकना चाहें तो उन्हें इसके बदले ब्रेस्ट टैक्स देना होगा। इसमें भी दो नियम थे। जिसका ब्रेस्ट छोटा उसे कम टैक्स और जिसका बड़ा उसे ज्यादा टैक्स। टैक्स का नाम रखा था मूलाक्रम।

जमींदारों के घर काम करते वक्त दलित महिलाएं न स्तन ढक सकती थीं और न ही छाता लेकर बैठ सकती थीं। ये तस्वीर हमें सोशल मीडिया से मिली।

जमींदारों के घर काम करते वक्त दलित महिलाएं न स्तन ढक सकती थीं और न ही छाता लेकर बैठ सकती थीं। ये तस्वीर हमें सोशल मीडिया से मिली।

पुरुषों को भी नहीं थी सिर ढकने की परमिशन
यह फूहड़ रिवाज सिर्फ महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों पर भी लागू था। उन्हें सिर ढकने की परमिशन नहीं थी। अगर वे कमर के ऊपर कपड़ा पहनना चाहें और सिर उठाकर चलना चाहें तो इसके लिए उसे अलग से टैक्स देना पड़ेगा। यह व्यवस्था ऊंची जाति को छोड़कर सभी पर लागू थी, लेकिन वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे होने के कारण निचली जाति की दलित महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

चाकू से फाड़ देते थे महिलाओं के कपड़े
नादर वर्ग की महिलाओं ने कपड़े से सीना ढका तो सूचना राजपुरोहित तक पहुंच जाती थी। पुरोहित एक लंबी लाठी लेकर चलता था जिसके सिरे पर एक चाकू बंधी होती थी। वह उसी से ब्लाउज खींचकर फाड़ देता था। उस कपड़े को वह पेड़ों पर टांग देता था। यह संदेश देने का एक तरीका था कि आगे कोई ऐसी हिम्मत न कर सके।

केरल जैसे शिक्षित राज्य में महिलाओं को ब्लाउज पहनने का अधिकार 150 सालों के संघर्ष के बाद मिला। नांगेली का त्याग निर्णायक साबित हुआ।

केरल जैसे शिक्षित राज्य में महिलाओं को ब्लाउज पहनने का अधिकार 150 सालों के संघर्ष के बाद मिला। नांगेली का त्याग निर्णायक साबित हुआ।

नंगेली ने कुरीतियों की खटिया खड़ी कर डाली
19वीं शताब्दी की शुरुआत में चेरथला में नांगेली नाम की एक महिला थी। स्वाभिमानी और क्रांतिकारी। उसने तय किया कि ब्रेस्ट भी ढकूंगी और टैक्स भी नहीं दूंगी। नांगेली का यह कदम सामंतवादी लोगों के मुंह पर तमाचा था। अधिकारी घर पहुंचे तो नांगेली के पति चिरकंडुन ने टैक्स देने से मना कर दिया। बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने एक बड़े दल को नांगेली भेज दिया।

अफसरों को पत्ते पर सजाकर सौंप दिया अपना कटा स्तन
राजा के आदेश पर टैक्स लेने अफसर नांगेली के घर पहुंच गए। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। अफसर बोले, “ब्रेस्ट टैक्स दो, किसी तरह की माफी नहीं मिलेगी।” नांगेली बोली, ‘रुकिए मैं लाती हूं टैक्स।’ नांगेली अपनी झोपड़ी में गई। बाहर आई तो लोग दंग रह गए। अफसरों की आंखे फटी की फटी रह गई। नांगेली केले के पत्ते पर अपना कटा स्तन लेकर खड़ी थी। अफसर भाग गए। लगातार ब्लीडिंग से नांगेली जमीन पर गिर पड़ी और फिर कभी न उठ सकी।

नांगेली की चिता में कूदकर पति ने दी जान
नांगेली की मौत के बाद उसके पति चिरकंडुन ने भी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। भारतीय इतिहास में किसी पुरुष के ‘सती’ होने की यह एकमात्र घटना है। इस घटना के बाद विद्रोह हो गया। हिंसा शुरू हो गई। महिलाओं ने फुल कपड़े पहनना शुरू कर दिए। मद्रास के कमिश्नर त्रावणकोर राजा के महल में पहुंच गए। कहा, “हम हिंसा रोकने में असफल साबित हो रहे हैं कुछ करिए।” राजा बैकफुट पर चले गए। उन्हें घोषणा करनी पड़ी कि अब नादर जाति की महिलाएं बिना टैक्स के ऊपर कपड़े पहन सकती हैं।

यह तस्वीर GEORGE J THALIATH फाउंडेशन से मिली है। त्रावणकोर साम्राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति थी इसे देखकर समझा जा सकता है।

यह तस्वीर GEORGE J THALIATH फाउंडेशन से मिली है। त्रावणकोर साम्राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति थी इसे देखकर समझा जा सकता है।

जब स्त्री ही बन गई स्त्री की दुश्मन
नादर जाति कि महिलाओं को स्तन ढकने की इजाजत मिली तो एजवा, शेनार या शनारस और नादर वर्ग की महिलाओं ने भी विद्रोह किया। उनके विद्रोह को दबाने के लिए उच्च परिवार की स्त्रियां भी आगे आ गई। ऐसे ही एक कहानी सामने आती है जिसमें रानी ‘अन्तिंगल’ ने एक दलित महिला का स्तन कटवा दिया था।

पकड़े जाने के डर से श्रीलंका चले गए
इस कुप्रथा के खिलाफ विद्रोह करने वाले लोग पकड़े जाने के डर से श्रीलंका चले गए। वहां की चाय बगानों में काम करने लगे। इसी दौरान त्रावणकोर में अंग्रेजों का दखल बढ़ा। 1829 में त्रावणकोर के दीवान मुनरो ने कहा, “अगर महिलाएं ईसाई बन जाएं तो उन पर हिन्दुओं का ये नियम नहीं लागू होगा। वे स्तन ढक सकेंगी।”

महिलाओं को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया गया
मुनरो के इस आदेश से ऊंची जाति के लोगों में गुस्सा भर गया, लेकिन अंग्रेज फैसले पर टिके रहे। 1859 में अंग्रेजी गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने त्रावणकोर में इस नियम को रद्द कर दिया। अब हिंसा करने वाले बदल गए। ऊंची जाति के लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी। नादर महिलाओं को निशाना बनाया और उनके अनाज जला दिए। इस दौरान नादर जाति कि दो महिलाओं को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया गया।

अंग्रेजों के बढ़ते दबदबे से महिलाओं को मिली राहत
अंग्रेजी दीवान जर्मनी दास ने अपनी किताब ‘महारानी’ में इस कुप्रथा का जिक्र करते हुए लिखा, “संघर्ष लंबा चला। 1965 में प्रजा जीत गई और सभी को पूरे कपड़े पहनने का अधिकार मिल गया। इस अधिकार के बावजूद कई हिस्सों में दलितों को कपड़े न पहनने देने की कुप्रथा चलती रही। 1924 में यह कलंक पूरी तरफ से खत्म हो गया, क्योंकि उस वक्त पूरा देश आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था।”

ये फोटो नांगेली के पड़पोते मणियम वेलू की है। वे कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। यह फोटो बीबीसी ने 12 मई 2016 को छापी थी।

ये फोटो नांगेली के पड़पोते मणियम वेलू की है। वे कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। यह फोटो बीबीसी ने 12 मई 2016 को छापी थी।

अपमानजनक इतिहास को मिटाने की कोशिश
NCRT ने 2019 में क्लास 9 के इतिहास की बुक से तीन अध्याय हटा दिए। इसमें एक अध्याय त्रावणकोर में निचली जातियों के संघर्ष से जुड़ा था। हंगामा हुआ। केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने कहा, “यह विषय हटाना संघ परिवार के एजेंडे को दिखाता है।” इसके पहले CBSE ने भी 2017 में 9वीं के सोशल साइंस से ये वाला चैप्टर हटा दिया था। मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया। कोर्ट ने कहा, “2017 की परीक्षाओं में चैप्टर, कास्ट, कन्फ्लिक्ट एंड ड्रेस चेंज से कुछ भी नहीं पूछा जाएगा।”

नांगेली को बहादुरी की मूर्ति मानता है इतिहास
केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में जेंडर इकोलॉजी और दलित स्टडीज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ शीबा केएम कहती हैं, “ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था।” नंगेली के पड़पोते मणियन वेलू कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। उन्होंने ये फैसला अपने लिए नहीं, बल्कि सारी औरतों के लिए किया था। उनके त्याग से ही राजा को ये कर वापस लेना पड़ा था।

डॉ. शिबा कहती हैं कि नांगेली के बारे में जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी हुई नहीं। उन्होंने कारण बताते हुए कहा, “इतिहास हमेशा पुरुषों की नजर से लिखा गया है। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने का क्रम शुरु हुआ है। उम्मीद है कि नांगेली की वीरता और उनका त्याग लोगों के बीच पहुंचे।”

नांगेली ने अपने त्याग से क्रांति रची। उन्होंने एक शर्मनाक टैक्स को खत्म करने के लिए अपनी जान दे दी। केरल के मुलच्छीपुरम में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है। जहां लोग जाते हैं सिर झुकाते हैं। लोग लाख भूलने या भुलवाने की कोशिश करेंगे, लेकिन नांगेली को भुलाया नहीं जा सकेगा।

Hindi NewsNationalWhen Women’s Chest Was Seen Covered, They Used To Tear The Cloth, Cut Off Their Breasts To Get Rid Of ‘best Tax’5 घंटे पहलेलेखक: राजेश साहूकॉपी लिंकवीडियोहिजाब विवाद पर देशभर में हंगामा बरपा हुआ है। कर्नाटक से निकलकर इस विवाद की लपटें दूसरे राज्‍यों में भी फैल रही हैं। कई राज्‍यों में इसके पक्ष में जोरदार प्रदर्शन हुए हैं। इसने राज्‍यों में अलग तरह की चुनौतियां पैदा कर दी हैं। लेकिन सिर ढकने की इस लड़ाई के बीच भारत के इतिहास पर नजर डालें तो एक दौर ऐसा भी था जब महिलाओं को अपने स्तन ढकने की भी मनाही थी। 19वीं सदी में दलित महिलाओं की छाती पर कपड़ा या ब्लाउज दिखते ही चाकू से खींचकर फाड़ दिया जाता था। महिलाओं के साथ इस तरह की ऊंच नीच और भेदभाव की दास्तां कब और कैसे शुरू हुई, जानिए विस्तार से….दलित महिलाएं चुकाती थीं ‘ब्रेस्ट टैक्स’1729, मद्रास प्रेसीडेंसी में त्रावणकोर साम्राज्य की स्थापना हुई। राजा थे मार्थंड वर्मा। साम्राज्य बना तो नियम-कानून बने। टैक्स लेने का सिस्टम बनाया गया। जैसे आज हाउस टैक्स, सेल टैक्स और जीएसटी, लेकिन एक टैक्स और बनाया गया…ब्रेस्ट टैक्स मतलब स्तन कर। ये कर दलित और ओबीसी वर्ग की महिलाओं पर लगाया गया।ब्रेस्ट साइज के हिसाब से टैक्सत्रावणकोर में निचली जाति की महिलाएं सिर्फ कमर तक कपड़ा पहन सकती थी। अफसरों और ऊंची जाति के लोगों के सामने वे जब भी गुजरती उन्हें अपनी छाती खुली रखनी पड़ती थी। अगर महिलाएं छाती ढकना चाहें तो उन्हें इसके बदले ब्रेस्ट टैक्स देना होगा। इसमें भी दो नियम थे। जिसका ब्रेस्ट छोटा उसे कम टैक्स और जिसका बड़ा उसे ज्यादा टैक्स। टैक्स का नाम रखा था मूलाक्रम।जमींदारों के घर काम करते वक्त दलित महिलाएं न स्तन ढक सकती थीं और न ही छाता लेकर बैठ सकती थीं। ये तस्वीर हमें सोशल मीडिया से मिली।पुरुषों को भी नहीं थी सिर ढकने की परमिशनयह फूहड़ रिवाज सिर्फ महिलाओं पर नहीं, बल्कि पुरुषों पर भी लागू था। उन्हें सिर ढकने की परमिशन नहीं थी। अगर वे कमर के ऊपर कपड़ा पहनना चाहें और सिर उठाकर चलना चाहें तो इसके लिए उसे अलग से टैक्स देना पड़ेगा। यह व्यवस्था ऊंची जाति को छोड़कर सभी पर लागू थी, लेकिन वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे होने के कारण निचली जाति की दलित महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रताड़ना झेलनी पड़ी।चाकू से फाड़ देते थे महिलाओं के कपड़ेनादर वर्ग की महिलाओं ने कपड़े से सीना ढका तो सूचना राजपुरोहित तक पहुंच जाती थी। पुरोहित एक लंबी लाठी लेकर चलता था जिसके सिरे पर एक चाकू बंधी होती थी। वह उसी से ब्लाउज खींचकर फाड़ देता था। उस कपड़े को वह पेड़ों पर टांग देता था। यह संदेश देने का एक तरीका था कि आगे कोई ऐसी हिम्मत न कर सके।केरल जैसे शिक्षित राज्य में महिलाओं को ब्लाउज पहनने का अधिकार 150 सालों के संघर्ष के बाद मिला। नांगेली का त्याग निर्णायक साबित हुआ।नंगेली ने कुरीतियों की खटिया खड़ी कर डाली19वीं शताब्दी की शुरुआत में चेरथला में नांगेली नाम की एक महिला थी। स्वाभिमानी और क्रांतिकारी। उसने तय किया कि ब्रेस्ट भी ढकूंगी और टैक्स भी नहीं दूंगी। नांगेली का यह कदम सामंतवादी लोगों के मुंह पर तमाचा था। अधिकारी घर पहुंचे तो नांगेली के पति चिरकंडुन ने टैक्स देने से मना कर दिया। बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने एक बड़े दल को नांगेली भेज दिया।अफसरों को पत्ते पर सजाकर सौंप दिया अपना कटा स्तनराजा के आदेश पर टैक्स लेने अफसर नांगेली के घर पहुंच गए। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। अफसर बोले, “ब्रेस्ट टैक्स दो, किसी तरह की माफी नहीं मिलेगी।” नांगेली बोली, ‘रुकिए मैं लाती हूं टैक्स।’ नांगेली अपनी झोपड़ी में गई। बाहर आई तो लोग दंग रह गए। अफसरों की आंखे फटी की फटी रह गई। नांगेली केले के पत्ते पर अपना कटा स्तन लेकर खड़ी थी। अफसर भाग गए। लगातार ब्लीडिंग से नांगेली जमीन पर गिर पड़ी और फिर कभी न उठ सकी।नांगेली की चिता में कूदकर पति ने दी जाननांगेली की मौत के बाद उसके पति चिरकंडुन ने भी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। भारतीय इतिहास में किसी पुरुष के ‘सती’ होने की यह एकमात्र घटना है। इस घटना के बाद विद्रोह हो गया। हिंसा शुरू हो गई। महिलाओं ने फुल कपड़े पहनना शुरू कर दिए। मद्रास के कमिश्नर त्रावणकोर राजा के महल में पहुंच गए। कहा, “हम हिंसा रोकने में असफल साबित हो रहे हैं कुछ करिए।” राजा बैकफुट पर चले गए। उन्हें घोषणा करनी पड़ी कि अब नादर जाति की महिलाएं बिना टैक्स के ऊपर कपड़े पहन सकती हैं।यह तस्वीर GEORGE J THALIATH फाउंडेशन से मिली है। त्रावणकोर साम्राज्य में महिलाओं की क्या स्थिति थी इसे देखकर समझा जा सकता है।जब स्त्री ही बन गई स्त्री की दुश्मननादर जाति कि महिलाओं को स्तन ढकने की इजाजत मिली तो एजवा, शेनार या शनारस और नादर वर्ग की महिलाओं ने भी विद्रोह किया। उनके विद्रोह को दबाने के लिए उच्च परिवार की स्त्रियां भी आगे आ गई। ऐसे ही एक कहानी सामने आती है जिसमें रानी ‘अन्तिंगल’ ने एक दलित महिला का स्तन कटवा दिया था।पकड़े जाने के डर से श्रीलंका चले गएइस कुप्रथा के खिलाफ विद्रोह करने वाले लोग पकड़े जाने के डर से श्रीलंका चले गए। वहां की चाय बगानों में काम करने लगे। इसी दौरान त्रावणकोर में अंग्रेजों का दखल बढ़ा। 1829 में त्रावणकोर के दीवान मुनरो ने कहा, “अगर महिलाएं ईसाई बन जाएं तो उन पर हिन्दुओं का ये नियम नहीं लागू होगा। वे स्तन ढक सकेंगी।”महिलाओं को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया गयामुनरो के इस आदेश से ऊंची जाति के लोगों में गुस्सा भर गया, लेकिन अंग्रेज फैसले पर टिके रहे। 1859 में अंग्रेजी गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने त्रावणकोर में इस नियम को रद्द कर दिया। अब हिंसा करने वाले बदल गए। ऊंची जाति के लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी। नादर महिलाओं को निशाना बनाया और उनके अनाज जला दिए। इस दौरान नादर जाति कि दो महिलाओं को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया गया।अंग्रेजों के बढ़ते दबदबे से महिलाओं को मिली राहतअंग्रेजी दीवान जर्मनी दास ने अपनी किताब ‘महारानी’ में इस कुप्रथा का जिक्र करते हुए लिखा, “संघर्ष लंबा चला। 1965 में प्रजा जीत गई और सभी को पूरे कपड़े पहनने का अधिकार मिल गया। इस अधिकार के बावजूद कई हिस्सों में दलितों को कपड़े न पहनने देने की कुप्रथा चलती रही। 1924 में यह कलंक पूरी तरफ से खत्म हो गया, क्योंकि उस वक्त पूरा देश आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा था।”ये फोटो नांगेली के पड़पोते मणियम वेलू की है। वे कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। यह फोटो बीबीसी ने 12 मई 2016 को छापी थी।अपमानजनक इतिहास को मिटाने की कोशिशNCRT ने 2019 में क्लास 9 के इतिहास की बुक से तीन अध्याय हटा दिए। इसमें एक अध्याय त्रावणकोर में निचली जातियों के संघर्ष से जुड़ा था। हंगामा हुआ। केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने कहा, “यह विषय हटाना संघ परिवार के एजेंडे को दिखाता है।” इसके पहले CBSE ने भी 2017 में 9वीं के सोशल साइंस से ये वाला चैप्टर हटा दिया था। मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंच गया। कोर्ट ने कहा, “2017 की परीक्षाओं में चैप्टर, कास्ट, कन्फ्लिक्ट एंड ड्रेस चेंज से कुछ भी नहीं पूछा जाएगा।”नांगेली को बहादुरी की मूर्ति मानता है इतिहासकेरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय में जेंडर इकोलॉजी और दलित स्टडीज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ शीबा केएम कहती हैं, “ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था।” नंगेली के पड़पोते मणियन वेलू कहते हैं कि मुझे नांगेली के परिवार की संतान होने पर गर्व है। उन्होंने ये फैसला अपने लिए नहीं, बल्कि सारी औरतों के लिए किया था। उनके त्याग से ही राजा को ये कर वापस लेना पड़ा था।डॉ. शिबा कहती हैं कि नांगेली के बारे में जितनी चर्चा होनी चाहिए थी उतनी हुई नहीं। उन्होंने कारण बताते हुए कहा, “इतिहास हमेशा पुरुषों की नजर से लिखा गया है। पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने का क्रम शुरु हुआ है। उम्मीद है कि नांगेली की वीरता और उनका त्याग लोगों के बीच पहुंचे।”नांगेली ने अपने त्याग से क्रांति रची। उन्होंने एक शर्मनाक टैक्स को खत्म करने के लिए अपनी जान दे दी। केरल के मुलच्छीपुरम में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है। जहां लोग जाते हैं सिर झुकाते हैं। लोग लाख भूलने या भुलवाने की कोशिश करेंगे, लेकिन नांगेली को भुलाया नहीं जा सकेगा।

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