बाहुबलियों की कहानी 1:प्रयागराज के सुभाष चौराहे पर सबसे बड़े बाहुबली को दिनदहाड़े भूनकर नए बाहुबली बने थे करवरिया, अब दोनों की पत्नियां चुनाव लड़ रही हैं

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एक घंटा पहलेलेखक: राजेश साहू

प्रयागराज की प्रतापपुर से सपा ने विजमा यादव को उतारा, तो मेजा से BJP ने नीलम करवरिया को टिकट दे दिया। विधायकी लड़ रही ये दोनों महिलाएं शहर के पैलेस सिनेमा के सामने हुए एक कत्लेआम के चलते नेता बनी हैं। वरना ये घर पर बच्चे खिलाती थीं। क्या हुआ था, पैलेस सिनेमा पर आइए वहीं चलते हैं…

जवाहर पंडित हत्याकांड
13 अगस्त 1996, शाम का वक्त था। सपा के पूर्व विधायक जवाहर पंडित की सफेद रंग की मारुति कार सुभाष चौराहे से पत्थर गिरजाघर की तरफ बढ़ रही थी। गाड़ी गुलाब यादव चला रहे थे और कल्लन यादव जवाहर के साथ पीछे वाली सीट पर बैठे थे। पीछे एक टाटा सूमो लगी थी। पैलेस सिनेमा के ठीक सामने एक तेज रफ्तार टाटा सिएरा आई और जवाहर पंडित की गाड़ी को ओवरटेक करते हुए सामने खड़ी हो गई। पीछे वाली टाटा सूमो मारुति के एकदम बराबर खड़ी हो गई। सूमो से हथियार लेकर निकला रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू। टाटा सिएरा से चार लोग। श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज, कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और उदयभान करवरिया।

पहली तीन फोटो में कपिल मुनि, सूरजभान और उदयभान करवरिया हैं। चौथी फोटो में जवाहर पंडित के परिवार के भाई हैं।

पहली तीन फोटो में कपिल मुनि, सूरजभान और उदयभान करवरिया हैं। चौथी फोटो में जवाहर पंडित के परिवार के भाई हैं।

हाथ में AK-47 लेकर ललकारा, बाहर निकल जवाहर पंडित
मौला महाराज ने हाथ में AK-47 थाम रखी थी। जवाहर पंडित की गाड़ी के पास गए और ललकारते हुए कहा, “बाहर निकल जवाहर पंडित।” धड़-धड़ गोलियां चलने लगीं। तीन लोग सिर्फ जवाहर पंडित पर गोलियां बरसा रहे थे। शहर के सबसे पॉश एरिए में ये पहला मौका था जब AK-47 तड़तड़ाई। जवाहर पंडित के सिर से लेकर पांव तक गोलियां मारी गईं। सांसे थम गईं। अब गोलियां लगती तो बॉडी 2 इंच ऊपर जंप कर जाती। मौला महाराज को लग गया कि जवाहर का काम तमाम हो गया तब जाकर वहां से निकले। जवाहर के बगल ही बैठे कल्लन यादव के साथ चमत्कार हो गया। बुरी तरह से घायल होने के बाद भी वह बच गए। हालांकि, कुछ महीने बाद ही बीमारी के चलते मौत हो गई।

जवाहर पंडित की मौत की कहानी आपने पढ़ ली। अब इसकी वजह जानते हैं। वजह जानने से पहले हमें जवाहर का उदय जानना होगा।

जवाहर पंडित का उदय
जवाहर यादव की पैदाइश प्रयागराज के पड़ोसी जिले जौनपुर की है। खैरतारा गांव में जन्मे जवाहर का पूजा-पाठ में बहुत मन लगता था। देवी की पूजा में घंटों बिता देते थे। यही कारण है कि लोग जवाहर को जवाहर यादव न बुलाकर जवाहर पंडित बुलाने लगे। जवाहर को बचपन में ही ज्यादा पैसा कमाने का चस्का लगा था, लेकिन कोई मौका नहीं मिल रहा था। 1981 में गांव से चले आए प्रयागराज। शुरू में मंडियों में बोरी सिलने का काम करते थे। मजा नहीं आ रहा था। कुछ लोगों ने कहा, शराब के धंधे में पैसा है। जवाहर पंडित कूद पड़े।

जवाहर पंडित की यह एकमात्र फोटो लोगों के बीच है। इस तस्वीर में उनकी पत्नी विजमा यादव एवं दोनो बेटियां साथ हैं।

जवाहर पंडित की यह एकमात्र फोटो लोगों के बीच है। इस तस्वीर में उनकी पत्नी विजमा यादव एवं दोनो बेटियां साथ हैं।

जवाहर ने दारू के ठेकेदारों से मेलजोल बढ़ाया। धंधा सीखा और पैसा बनाना शुरू किया। चार साल में खूब पैसा बना लिया। जवाहर ने इसके बाद तमाम सरकारी ठेकों की तरफ भी हाथ बढ़ाया। मुकाम हासिल किया। पैसा बनाया। अब लगा राजनीति में जाना चाहिए। 1989 में बड़े जतन से मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की। मुलाकात इतनी बढ़िया रही कि जवाहर पंडित अब देवी के साथ-साथ मुलायम के भी भक्त बन गए।

1993 का चुनाव जीता और बालू पर नजर पड़ गई
1991 में सपा के टिकट पर झूंसी सीट से जवाहर पंडित ने चुनाव लड़ा और हार गए, लेकिन क्षेत्र में लगे रहे। नतीजा ये हुआ कि 1993 में 26,841 वोटों के बड़े मार्जिन से चुनाव जीत लिया। यहां से जवाहर पंडित की ताकत बेहिसाब बढ़ गई। जिसे चाहते उसे ठेका दिलवाते। इसी दौरान जवाहर पंडित की नजर यमुना के घाटों की बेशकीमती बालू पर पड़ी, लेकिन वहां तो पहले से ही बाहुबली करवरिया परिवार का कब्जा था। मतलब ये कि एक मगरमच्छ के रहते हुए दूसरा मगरमच्छ उसी तालाब में कूद पड़ा।

करवरिया खानदान से सीधी भिड़ंत
जवाहर पंडित अब मामूली इंसान नहीं थे। माननीय थे। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के खासमखास। पार्टी को मोटा फंड देने वाले। पहुंच गए। बालू के घाट पर। वहां पर सारा कब्जा श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज का था। दो लाइन में पहले इनके बारे में जान लीजिए।

मौला महाराज के पिता जगत नारायण करवरिया का कौशांबी में बड़ा मान सम्मान था। दबंग छवि मानी जाती थी। मौला महाराज अपने भाई विशिष्ट नारायण करवरिया उर्फ भुक्खल महाराज के साथ प्रयागराज आकर बस गए। रियल स्टेट के कारोबार में अपना सिक्का जमाया। जब यह कारोबार जम गया तब नजर पड़ी बालू के धंधे पर। सरकार में जुगाड़ लगाया और बालू निकालने का ठेका ले लिया। देखते ही देखते करवरिया परिवार बालू का सबसे बड़ा डीलर बन गया। अब फिर से विषय पर लौटते हैं।

1993 में जवाहर पंडित विधायक बने। जिसकी सत्ता उसका ठेका वाला वसूल लागू हुआ। जवाहर ने एक के बाद एक सारे ठेके खुद के नाम करवा लिया। करवरिया के पास घाट तो थे पर रास्ता खत्म हो गया। ट्रक जवाहर पंडित की जमीन से गुजरा तो रोक दिया गया। दोनों पक्ष समझौते के लिए साथ बैठे। इस दौरान समझौता छोड़िए विवाद और बढ़ गया। जवाहर पंडित ने मौला महाराज पर रायफल तान दी। कहा, “अपनी बालू चाहे तो हेलीकॉप्टर से उठवाओ, लेकिन मेरी जमीन से तुम्हारा एक भी ट्रक नहीं गुजरने दूंगा”

बस इसी के बाद जवाहर पंडित का बालू खदानों पर एकक्षत्र राज हो गया। करवरिया परिवार इस कारोबार से पूरी तरह से आउट हो गया, लेकिन उसके दिल में बदले की ज्वाला भड़क रही थी। बस सही समय का इंतजार था। 1995 में सपा-बसपा में विवाद हो गया। सरकार गिर गई। राष्ट्रपति शासन लग गया। जवाहर पंडित की सुरक्षा वापस हो गई। इसी को मौका माना और 13 अगस्त 1996 को जवाहर पंडित की गोली मारकर हत्या कर दी।

यह वही पैलेस सिनेमा है जिसके सामने जवाहर पंडित की हत्या कर दी गई थी।

यह वही पैलेस सिनेमा है जिसके सामने जवाहर पंडित की हत्या कर दी गई थी।

4. दोष साबित करने में लग गए 23 साल
जवाहर पंडित की हत्या दिनदहाड़े हुई थी। बड़ी संख्या में लोगों ने देखा, लेकिन जैसे फिल्मों में होता है कि लोग डरकर नहीं बोलते ठीक उसी तरह से यहां भी हुआ। जवाहर पंडित के भाई सुलाकी यादव ने मौला महाराज, करवरिया बंधुओं और कल्लू के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। हमले के कुछ दिन बाद मौला महाराज की मौत हो गई। अब बचे थे चार लोग। कपिल मुनि करवरिया ने कहा, जिस दिन जवाहर की हत्या हुई वह जिले में थे ही नहीं। इस बात को पुख्ता करवाने के लिए उन्होंने कलराज मिश्र को आगे किया।

कलराज मिश्र ने उस वक्त के राज्यपाल रोमेश भंडारी को पत्र लिख दिया कि कपिल पूरा दिन हमारे साथ थे। कलराज अदालत में गवाही देने भी आए लेकिन कोर्ट ने माना नहीं। इसी तरह से उदयभान और सूरजभान ने भी कहा, लेकिन जब कोर्ट ने सबूत पेश करने को कहा तो कोई भी सफल नहीं हो पाया। 4 नवंबर 2019 को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए चारों आरोपियों को दोषी करार दिया। इन सभी को उम्रकैद की सजा मिली।

इस वक्त क्या है स्थिति
जवाहर पंडित की मौत के बाद उनकी पत्नी को पार्टी ने आगे किया। 1996 में वह झूंसी सीट पर 12 हजार वोटों से जीतकर विधानसभा पहुंचीं। 2002 में 18 हजार वोट से जीत गईं। 2007 में हारीं और 2012 में जीत गईं। 2017 में हारी और 2022 में एक बार फिर से सपा के टिकट पर प्रत्याशी हैं। 2016 में बेटी ज्योति यादव फूलपुर से ब्लॉक प्रमुख बनी थीं, लेकिन सरकार बदलते ही अविश्वास प्रस्ताव आया और उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

विजमा यादव प्रतापपुर सीट से सपा प्रत्याशी हैं। वह इस वक्त चुनाव प्रचार में जुटी हैं।

विजमा यादव प्रतापपुर सीट से सपा प्रत्याशी हैं। वह इस वक्त चुनाव प्रचार में जुटी हैं।

दूसरी तरफ करवरिया खानदान के तीन मुख्य व्यक्ति पिछले चार साल से जेल में बंद हैं। किसी की मौत व किसी की शादी पर एक दिन के लिए जेल से बाहर आते हैं, भारी पुलिस के बीच लोगों से मिलते हैं और फिर से जेल में चले जाते हैं। ठहर कर देखेंगे तो पाएंगे कि बैलेट और बुलेट की इस लड़ाई में दोनों पक्षों को कुछ हासिल नहीं हुआ।

एक घंटा पहलेलेखक: राजेश साहूकॉपी लिंकवीडियोप्रयागराज की प्रतापपुर से सपा ने विजमा यादव को उतारा, तो मेजा से BJP ने नीलम करवरिया को टिकट दे दिया। विधायकी लड़ रही ये दोनों महिलाएं शहर के पैलेस सिनेमा के सामने हुए एक कत्लेआम के चलते नेता बनी हैं। वरना ये घर पर बच्चे खिलाती थीं। क्या हुआ था, पैलेस सिनेमा पर आइए वहीं चलते हैं…जवाहर पंडित हत्याकांड13 अगस्त 1996, शाम का वक्त था। सपा के पूर्व विधायक जवाहर पंडित की सफेद रंग की मारुति कार सुभाष चौराहे से पत्थर गिरजाघर की तरफ बढ़ रही थी। गाड़ी गुलाब यादव चला रहे थे और कल्लन यादव जवाहर के साथ पीछे वाली सीट पर बैठे थे। पीछे एक टाटा सूमो लगी थी। पैलेस सिनेमा के ठीक सामने एक तेज रफ्तार टाटा सिएरा आई और जवाहर पंडित की गाड़ी को ओवरटेक करते हुए सामने खड़ी हो गई। पीछे वाली टाटा सूमो मारुति के एकदम बराबर खड़ी हो गई। सूमो से हथियार लेकर निकला रामचंद्र त्रिपाठी उर्फ कल्लू। टाटा सिएरा से चार लोग। श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज, कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और उदयभान करवरिया।पहली तीन फोटो में कपिल मुनि, सूरजभान और उदयभान करवरिया हैं। चौथी फोटो में जवाहर पंडित के परिवार के भाई हैं।हाथ में AK-47 लेकर ललकारा, बाहर निकल जवाहर पंडितमौला महाराज ने हाथ में AK-47 थाम रखी थी। जवाहर पंडित की गाड़ी के पास गए और ललकारते हुए कहा, “बाहर निकल जवाहर पंडित।” धड़-धड़ गोलियां चलने लगीं। तीन लोग सिर्फ जवाहर पंडित पर गोलियां बरसा रहे थे। शहर के सबसे पॉश एरिए में ये पहला मौका था जब AK-47 तड़तड़ाई। जवाहर पंडित के सिर से लेकर पांव तक गोलियां मारी गईं। सांसे थम गईं। अब गोलियां लगती तो बॉडी 2 इंच ऊपर जंप कर जाती। मौला महाराज को लग गया कि जवाहर का काम तमाम हो गया तब जाकर वहां से निकले। जवाहर के बगल ही बैठे कल्लन यादव के साथ चमत्कार हो गया। बुरी तरह से घायल होने के बाद भी वह बच गए। हालांकि, कुछ महीने बाद ही बीमारी के चलते मौत हो गई।जवाहर पंडित की मौत की कहानी आपने पढ़ ली। अब इसकी वजह जानते हैं। वजह जानने से पहले हमें जवाहर का उदय जानना होगा।जवाहर पंडित का उदयजवाहर यादव की पैदाइश प्रयागराज के पड़ोसी जिले जौनपुर की है। खैरतारा गांव में जन्मे जवाहर का पूजा-पाठ में बहुत मन लगता था। देवी की पूजा में घंटों बिता देते थे। यही कारण है कि लोग जवाहर को जवाहर यादव न बुलाकर जवाहर पंडित बुलाने लगे। जवाहर को बचपन में ही ज्यादा पैसा कमाने का चस्का लगा था, लेकिन कोई मौका नहीं मिल रहा था। 1981 में गांव से चले आए प्रयागराज। शुरू में मंडियों में बोरी सिलने का काम करते थे। मजा नहीं आ रहा था। कुछ लोगों ने कहा, शराब के धंधे में पैसा है। जवाहर पंडित कूद पड़े।जवाहर पंडित की यह एकमात्र फोटो लोगों के बीच है। इस तस्वीर में उनकी पत्नी विजमा यादव एवं दोनो बेटियां साथ हैं।जवाहर ने दारू के ठेकेदारों से मेलजोल बढ़ाया। धंधा सीखा और पैसा बनाना शुरू किया। चार साल में खूब पैसा बना लिया। जवाहर ने इसके बाद तमाम सरकारी ठेकों की तरफ भी हाथ बढ़ाया। मुकाम हासिल किया। पैसा बनाया। अब लगा राजनीति में जाना चाहिए। 1989 में बड़े जतन से मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की। मुलाकात इतनी बढ़िया रही कि जवाहर पंडित अब देवी के साथ-साथ मुलायम के भी भक्त बन गए।1993 का चुनाव जीता और बालू पर नजर पड़ गई1991 में सपा के टिकट पर झूंसी सीट से जवाहर पंडित ने चुनाव लड़ा और हार गए, लेकिन क्षेत्र में लगे रहे। नतीजा ये हुआ कि 1993 में 26,841 वोटों के बड़े मार्जिन से चुनाव जीत लिया। यहां से जवाहर पंडित की ताकत बेहिसाब बढ़ गई। जिसे चाहते उसे ठेका दिलवाते। इसी दौरान जवाहर पंडित की नजर यमुना के घाटों की बेशकीमती बालू पर पड़ी, लेकिन वहां तो पहले से ही बाहुबली करवरिया परिवार का कब्जा था। मतलब ये कि एक मगरमच्छ के रहते हुए दूसरा मगरमच्छ उसी तालाब में कूद पड़ा।करवरिया खानदान से सीधी भिड़ंतजवाहर पंडित अब मामूली इंसान नहीं थे। माननीय थे। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के खासमखास। पार्टी को मोटा फंड देने वाले। पहुंच गए। बालू के घाट पर। वहां पर सारा कब्जा श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला महाराज का था। दो लाइन में पहले इनके बारे में जान लीजिए।मौला महाराज के पिता जगत नारायण करवरिया का कौशांबी में बड़ा मान सम्मान था। दबंग छवि मानी जाती थी। मौला महाराज अपने भाई विशिष्ट नारायण करवरिया उर्फ भुक्खल महाराज के साथ प्रयागराज आकर बस गए। रियल स्टेट के कारोबार में अपना सिक्का जमाया। जब यह कारोबार जम गया तब नजर पड़ी बालू के धंधे पर। सरकार में जुगाड़ लगाया और बालू निकालने का ठेका ले लिया। देखते ही देखते करवरिया परिवार बालू का सबसे बड़ा डीलर बन गया। अब फिर से विषय पर लौटते हैं।1993 में जवाहर पंडित विधायक बने। जिसकी सत्ता उसका ठेका वाला वसूल लागू हुआ। जवाहर ने एक के बाद एक सारे ठेके खुद के नाम करवा लिया। करवरिया के पास घाट तो थे पर रास्ता खत्म हो गया। ट्रक जवाहर पंडित की जमीन से गुजरा तो रोक दिया गया। दोनों पक्ष समझौते के लिए साथ बैठे। इस दौरान समझौता छोड़िए विवाद और बढ़ गया। जवाहर पंडित ने मौला महाराज पर रायफल तान दी। कहा, “अपनी बालू चाहे तो हेलीकॉप्टर से उठवाओ, लेकिन मेरी जमीन से तुम्हारा एक भी ट्रक नहीं गुजरने दूंगा”बस इसी के बाद जवाहर पंडित का बालू खदानों पर एकक्षत्र राज हो गया। करवरिया परिवार इस कारोबार से पूरी तरह से आउट हो गया, लेकिन उसके दिल में बदले की ज्वाला भड़क रही थी। बस सही समय का इंतजार था। 1995 में सपा-बसपा में विवाद हो गया। सरकार गिर गई। राष्ट्रपति शासन लग गया। जवाहर पंडित की सुरक्षा वापस हो गई। इसी को मौका माना और 13 अगस्त 1996 को जवाहर पंडित की गोली मारकर हत्या कर दी।यह वही पैलेस सिनेमा है जिसके सामने जवाहर पंडित की हत्या कर दी गई थी।4. दोष साबित करने में लग गए 23 सालजवाहर पंडित की हत्या दिनदहाड़े हुई थी। बड़ी संख्या में लोगों ने देखा, लेकिन जैसे फिल्मों में होता है कि लोग डरकर नहीं बोलते ठीक उसी तरह से यहां भी हुआ। जवाहर पंडित के भाई सुलाकी यादव ने मौला महाराज, करवरिया बंधुओं और कल्लू के खिलाफ मामला दर्ज करवाया। हमले के कुछ दिन बाद मौला महाराज की मौत हो गई। अब बचे थे चार लोग। कपिल मुनि करवरिया ने कहा, जिस दिन जवाहर की हत्या हुई वह जिले में थे ही नहीं। इस बात को पुख्ता करवाने के लिए उन्होंने कलराज मिश्र को आगे किया।कलराज मिश्र ने उस वक्त के राज्यपाल रोमेश भंडारी को पत्र लिख दिया कि कपिल पूरा दिन हमारे साथ थे। कलराज अदालत में गवाही देने भी आए लेकिन कोर्ट ने माना नहीं। इसी तरह से उदयभान और सूरजभान ने भी कहा, लेकिन जब कोर्ट ने सबूत पेश करने को कहा तो कोई भी सफल नहीं हो पाया। 4 नवंबर 2019 को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए चारों आरोपियों को दोषी करार दिया। इन सभी को उम्रकैद की सजा मिली।इस वक्त क्या है स्थितिजवाहर पंडित की मौत के बाद उनकी पत्नी को पार्टी ने आगे किया। 1996 में वह झूंसी सीट पर 12 हजार वोटों से जीतकर विधानसभा पहुंचीं। 2002 में 18 हजार वोट से जीत गईं। 2007 में हारीं और 2012 में जीत गईं। 2017 में हारी और 2022 में एक बार फिर से सपा के टिकट पर प्रत्याशी हैं। 2016 में बेटी ज्योति यादव फूलपुर से ब्लॉक प्रमुख बनी थीं, लेकिन सरकार बदलते ही अविश्वास प्रस्ताव आया और उन्हें पद छोड़ना पड़ा।विजमा यादव प्रतापपुर सीट से सपा प्रत्याशी हैं। वह इस वक्त चुनाव प्रचार में जुटी हैं।दूसरी तरफ करवरिया खानदान के तीन मुख्य व्यक्ति पिछले चार साल से जेल में बंद हैं। किसी की मौत व किसी की शादी पर एक दिन के लिए जेल से बाहर आते हैं, भारी पुलिस के बीच लोगों से मिलते हैं और फिर से जेल में चले जाते हैं। ठहर कर देखेंगे तो पाएंगे कि बैलेट और बुलेट की इस लड़ाई में दोनों पक्षों को कुछ हासिल नहीं हुआ।

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