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44 मिनट पहलेलेखक: आशीष उरमलिया
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यूपी की बदनाम गलियों में राजनीति का नया रूप दिखता है। यहां कोई नेता तो नहीं आता। लेकिन कार्यकर्ता मंडराते रहते हैं। दरअसल, ये असली कार्यकर्ता नहीं हैं। ये उन्हीं गलियों के दलाल हैं और गले में बीजेपी-कांग्रेस या जिस भी पार्टी का गमछा पा रहे हैं, उसे पहन ले रहे हैं। फिर घूम-घूमकर लोगों को पर्चा बांट रहे हैं, मौका मिलने पर उन्हीं पर्चों में अपने कॉन्टैक्ट भी दे रहे हैं। ये हालत हैं प्रयागराज के रेड लाइट एरिया मीरगंज की। प्रयागराज के अलावा बाराबंकी के सफेदाबाद, वाराणसी के शिवदासपुर और बस्ती शहर के इटैलिया के चुनावी टेंपरेचर को भी हमने नापा है। आइए एक-एक करके चलते हैं…
बदनाम गली 1, बाराबंकी का सफेदाबाद
4 गलियां, 200 से ज्यादा दरवाजे, 800 महिलाएं, वो चुनावी बातें नहीं करतीं
सफेदाबाद पुलिस बूथ के ठीक पीछे 50 कदम दूर से चार गलियां एक के बाद एक शुरू होती हैं। इनमें 200 से ज्यादा छोटे-छोटे दरवाजे हैं। उनके बाहर सुबह 9 बजे से लड़कियां खड़ी हो जाती हैं। हम बारी-बारी से तीनों गलियों से गुजरे। इस दरमियान हमें सिर्फ 3 वाक्य ज्यादा सुनाई दिए…
- ओ दाढ़ी वाले, डांस देखेगा क्या
- कहां चलना है बोल
- पार्टी में डांस करना है या घर पे

ग्राहकों का इंतजार करती हुई महिलाएं।
चारों गलियों में 2 चक्कर पूरा करने बाद, किसी भी दरवाजे पर कोई चुनावी पर्चा, पैम्फ्लेट या पोस्टर नहीं दिखता। दो चक्कर पूरा करने के बाद 25 से 30 साल के 7-8 लड़के हमारे पीछे लगे। वो सिर्फ महिलाओं की खूबियां गिनाते हैं।
जब पता चला कि मीडिया वाले आए हैं तो सब कहते हैं, ‘प्रदीप से मिल लो’
पुलिस बूथ से जो सड़क इन चारों गलियों को जोड़ती है, उसी एंट्री पॉइंट पर प्लास्टिक की कुर्सी पर एक सफेद गमछा बांधे शख्स बैठा मिला। उम्र 40 के आस-पास है। करीब साढ़े पांच फुट का तगड़ा सा दिखने वाला ये शख्स चारों गलियों का मालिक है। नाम है, प्रदीप कुमार यादव।
“हमने मोदी लहर में यहां बीजेपी को नहीं जीतने दिया, अब अखिलेश की सरकार बनवानी है”
बहुत कहने के बाद भी वह कैमरे पर बात करने को राजी नहीं हुआ। उसने कहा, “2017 के चुनाव में मोदी लहर में भी हमने भाजपा को नहीं जीतने दिया। इस बार भी नहीं जीतने देंगे। अखिलेश यादव की सरकार बनवानी है। योगी सरकार ने इस समुदाय के लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया।”

गंदगी के बीच एक कमरे के मकान में जीने को मजबूर महिलाएं।
प्रदीप अपनी बात को रखते वक्त बार-बार आस-पास की भीड़ से हामी भरवाता है। भीड़ कहती है, ‘प्रदीप भइया जिसे बोलेंगे उसी को वोट देंगे।’ भीड़ में खड़ी सीमा नट और आरती नट कहती हैं, “हमारी गली में अब तक कोई वोट मांगने नहीं आया। वह बताती हैं कि उनका घर हरदोई और कासगंज में है।
80 साल से इसी जगह पर इसी धंधे में हैं, सिर्फ कोरोना के बाद से मंदी आई है
यहां रहने वाली महिलाएं खुलकर कुछ नहीं कर पातीं। ये जानने के बाद हम मीडियावाले हैं वो दूर भागती हैं। कुछ पूछने पर जवाब नहीं देतीं। जिनकी उम्र 40 से ज्यादा है, वो सिर्फ इतना कहती हैं, “हमारे कमरों का किराया 4000 कर दिया है। कहां से इतने पैसे लाएं। पहले एक पार्टी में नाचने के 500 से 2000 तक मिलते थे। अब 200 में काम करना पड़ रहा है”।
वहां से निकलते वक्त अंजू धीरे से एक तरफ बुलाकर कहती हैं, “यहां गंदगी बहुत है। सांस नहीं ली जाती। तुम अखबार में लिख के ये गंदगी हटवा दो।”
बदनाम गली 2, प्रयागराज का मीरगंज
4 गलियां, 15 लड़कियां, 70 मर्द सौदा कर रहे; लेकिन गले में बीजेपी-कांग्रेस के गमछे डालकर
मीरगंज की गलियों में सबसे ज्यादा बीजेपी के झंडे लगे हैं। यहां की कुल 4 बदनाम गलियों मद्रासी गली, सत्या गली, जुलाहा गली और नेपाली या पहाड़ी गली में बीजेपी के 22 झंडे टंगे हुए हैं। गली के बाहर 20-25 लोग हाथों में बीजेपी, कांग्रेस और राजा भइया की जनसत्ता पार्टी का पैम्फ्लेट लिए घूम रहे हैं, लेकिन वो लोगों से राजनीति पर नहीं महिलाओं के रेट और उनकी खूबियों की बात करते हैं।

मीरगंज की मद्रासी गली।
गली के मुहाने पर कपड़े की दुकान चलाने वाले प्रवीण गुप्ता कहते हैं, “इनमें से कोई कार्यकर्ता नहीं है। सब धंधे से जुड़े लोग हैं। लेकिन उन्होंने फिलहाल फॉर्मूला निकाल लिया है। वो चुनावी बैनरों-पोस्टरों की आड़ में धंधा चलाते हैं।”
प्रवीण कहते हैं, “ये लोग देखते हैं कि किस पार्टी के लोग ज्यादा प्रचार करने आ रहे हैं। उसी से अंदाजा लगाते हैं कि कौन सी पार्टी इस इलाके में भारी पड़ रही है। फिर वो उसी पार्टी के बैनर-पोस्टर अपने घरों पर लगा लेते हैं। इससे उन्हें कॉन्फिडेंस रहता है कि पुलिस ज्यादा परेशान नहीं करेगी।”

प्रत्याशियों के समर्थक लागतार क्षेत्र में घूमते रहते हैं।
फिलहाल, यहां पर बीजेपी नंद गोपाल नंदी, राजा भइया के जनसत्ता पार्टी के प्रत्याशी के सबसे ज्यादा दिख रहे हैं। कई लोगों के गले में हाथ के पंजे वाले कांग्रेसी गमछे भी लटक रहे हैं। कन्नी चुनाव चिन्ह वाले एक निर्दलीय प्रत्याशी के 20-25 कार्यकर्ता लगातार क्षेत्र में मंडरा रहे हैं।
कभी 600 महिलाएं यहां जिस्मफरोशी करती थीं, 2 फौजियों के चलते अब कोठों पर ताला लग गया है
इस वक्त मीरगंज में सिर्फ 15 बची हैं। वो भी शाम ढलने के बाद गली के मुहानी पर आकर बैठ जाती हैं। गली के बाहर ही मोल-भाव होता है। फिर युवतियां बाइक पर बैठकर युवकों के साथ चली जाती हैं। साल 2013 तक ऐसा नहीं था।
मीरगंज में तीन तरह की तवायफें रहती थीं। पहली जो यहीं की रहने वाली थी। दूसरी, जिन्हें खरीदकर लाया गया था और तीसरी वे जिन्होंने गरीबी की वजह यह रास्ता चुन लिया था। तब यहां, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, राजस्थान के धौलपुर और पश्चिम बंगाल से आईं लगभग 600 लड़कियां दिनभर गलियों के दरवाजों पर खड़ी रहती थीं।
7 सितंबर 2013 की एक घटना ने इस इलाके को ऐसा सील कराया कि आज 9 साल बाद भी दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं। उस दिन रविवार की शाम थी। इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस यानी ITBP के दो जवानों असल में अनूप कुमार और लालमणि तफरी के लिए मीरगंज आए थे। आरोप था कि वो एक तवायफ से कुछ बात कर रहे थे। तभी उस युवती का बॉयफ्रेंड आया और दोनों को गोली मार दी।
अब 30 रुपए के लिए जिस्म बेचने को मजबूर
मुर्शिदाबाद की जोहरा (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “हर किसी का यहां अपना रेट फिक्स होता है। किसी का 100 रुपए तो किसी का 500 रुपये। इसमें से एक हिस्सा पुलिस को जाता है, तो दूसरा कोठे के मालिक को। दलाल भी हर ग्राहक पर अपना हिस्सा ले जाता है। हमारे पास 100 रुपये में से केवल 30 रुपये बचते हैं। खुश होकर ग्राहक ने अगर कुछ अलग से दे दिया तो वह हमारा हो जाता है।”
बदनाम गली 3, वाराणसी का शिवदासपुर
टूटे-अधबने घरों से झांकती महिलाएं, दीवारों पर लगे सपा-कांग्रेस के चुनावी पोस्टर, लेकिन 18 साल से कोई नेता नहीं पहुंचा
बानरस रेलवे स्टेशन से आधा किमी दाहिने तरफ चलते हुए हम शिवदासपुर पहुंचे। यहां सकरी सी गली में 50 कदम चलने के बाद एक अलग ही माहौल दिखा। एकलाइन में बने घरों से कुछ महिलाएं झांक रही थीं। वहीं पर दिलवाले फिल्म का ‘कितना हसीन चेहरा’ गाना बज रहा था। यहां 30 से ज्यादा घर ऐसे हैं, जहां ताला लटका हुआ है। सड़के खराब हैं और इन घरों के चारों तरफ कूड़ा बिखरा पड़ा था।
सुबह 9 बजे से 11 बजे तक पूरा शिवदासपुर घूमने के बाद हमें कोई भी चुनावी माहौल नहीं दिखा। लेकिन इस दरमियान हमें इलाके की एक पुरानी दीवार पर कांग्रेस का धुंधला हो चुका प्रचार दिखा। साथ ही कई घरों के बाहर सपा-गठबंधन के पोस्टर भी दिखे तो हमने खुद से पहल की। चुनावी हाल जानने हम एक अधकच्चे मकान के बाहर पहुंचे…

बचपन से इसी अधबने माकन में रह रही है ये महिला।
घर के अंदर से आवाज आती है…
क्या काम है बाबू , यहां कैसे… क्या चाहिए ?
बालों में कंघी फेरते हुए एक महिला बाहर आती है। नाम काजल बताती है। सपा के पोस्टर पर छपी अखिलेश की तस्वीर दिखाते हुए हमने पूछा क्या इन्हें जानती हैं। काजल ने कहा, “नहीं, कैसे पहचाने ये तो कभी यहां दिखे ही नहीं।”
18 साल हो गए कोई बड़ा नेता शिवदासपुर नहीं आया… उनके चिंटू आते हैं
शिवदासपुर के बीचोंबीच तालाब के बगल में हमें रानी (बदला हुआ नाम) मिल गईं। रानी सेक्स वर्कर हैं, जो बीते 25 साल से यहीं रह रही हैं। उन्होंने कैमरे पर न आने की शर्त पर बताया, ”2005 तक यहां सब अच्छा था। ऐसी रौनक थी कि मुंबई का जूहू-चौपाटी फेल था। लेकिन 2005 में चौधरी के एनकाउंटर के बाद सब बर्बाद हो गया। पुलिस यहां की लड़कियों को पकड़ ले गई। कई लोगों को जेल में डाल दिया। तब से यहां कोई नेता नहीं आया। बस चुनाव में पर्चा चिपकाने के लिए अपने चिंटुओं को भेज देते हैं।”

धंधा मंदा पड़ने के बाद महिला ने पेट पलने के लिए छोटी दुकान खोल ली।
रहमत खान ने शिवदारपुर को बना दिया बदनाम गली
बात 1970 की बात है। तब काशी विश्वनाथ मंदिर के पास दालमंडी इलाका तवायकों के लिए मशहूर था। 1980 में मंदिर क्षेत्र का सुधार हुआ, तो यहां काम करने वाली महिलाओं को पुलिस ने खदेड़ना शुरू किया। सरकारी हंटर चला तो दालमंडी की रौनक कोसो दूर शिवदासपुर में आ बसी।
शिवदासपुर में परचून की दुकान चला रहे चौथी प्रसाद बताते हैं, “पहले यहां महिलाएं गाना-बजाना करती थीं। लेकिन रहमत खान ने महिलाओं को जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया। उनकी पहचान कानपुर, बिहार, नेपाल और बंगाल तक थी। वही लड़कियों को दूर-दूर से यहां लाता था। लेकिन 2005 में वो पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। तब से यहां के हालात बदतर होते गए”।
”रहमत के समय यहां 200 से ज्यादा महिलाएं थी। लेकिन 2005 में यहां पुलिस का बड़ा छापा पड़ा। बहुत सी महिलाओं को जेल में बंद कर दिया गया। आज यहां 10 से 12 घर ही बचे हैं, जहां चोरी छिपे ये काम होता है।” प्रसाद ने आगे बताया। शिवदासपुर में 64 घर हैं। यहां करीब 460 लोग रहते हैं।
बदनाम गली 4, बस्ती शहर का इटैलिया मोहल्ला
भाजपा सरकार ने हमारा रोजगार छीन लिया, अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाएंगे
बस्ती रेलवे स्टेशन से सिर्फ 100 मीटर आगे बढ़ते ही इटैलिया मोहल्ला आता है। इसमें करीब 3 बदनाम गलियां हैं। यहां पर अब भी 20-30 महिलाएं मिल जाती हैं। मोबाइल और कैमरा देखकर वो और दूर भागती हैं। जब हमने विश्वास दिलाया कि हम उनके लिए खतरा नहीं हैं, तब बिना नाम बताए एक महिला ने कहा, “भाजपा सरकार ने हमारे कोठे बंद कर दिए। अब हम दाने-दाने के लिए मोहताज हैं।”

गरीबी की मौजूदा स्थिति बयां करती हुई महिला।
उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार ने महंगाई भी बढ़ाई है। पांच किलो राशन से क्या होगा? हमारे कोठे बंद हैं, बाहर भी हमें कोई काम नहीं देता। हम कहां जाएं?”
आस-पास के लोगों को राहत, लेकिन गली में रहने वाली महिलाएं बीजेपी से नाराज
मोहल्ले की दूसरी गली में रहने वाले संतोष पांडेय कहते हैं, “पहले यहां पूरी रात मुजरा चलता था। आना-जाना दुश्वार था। लेकिन बीजेपी की सरकार आते ही ये सब बंद हो गया। इससे काफी राहत है।” वह कहते हैं, “लेकिन अब भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अब भी कुछ महिलाएं धंधा करती हैं।”
कोई भी जीते, आता तो कोई नहीं; लेकिन हम लोग वोट जरूर देंगे
अपना नाम बताए बगैर गली के एक दरवाजे पर खड़ी करीब 25 से 30 साल की युवती कहती है, ”वोटर कार्ड है, हम सब हर बार वोट डालने जाते हैं। लेकिन जीतने के बाद कभी कोई भी नेता दिखाई नहीं देता है। लेकिन हम इस बार भी वोट देंगे।”
वाराणसी से देवांशु तिवारी, प्रयागराज से जनार्दन पांडेय और बस्ती से विपिन यादव ने रिपोर्ट की है।
44 मिनट पहलेलेखक: आशीष उरमलियाकॉपी लिंकवीडियोयूपी की बदनाम गलियों में राजनीति का नया रूप दिखता है। यहां कोई नेता तो नहीं आता। लेकिन कार्यकर्ता मंडराते रहते हैं। दरअसल, ये असली कार्यकर्ता नहीं हैं। ये उन्हीं गलियों के दलाल हैं और गले में बीजेपी-कांग्रेस या जिस भी पार्टी का गमछा पा रहे हैं, उसे पहन ले रहे हैं। फिर घूम-घूमकर लोगों को पर्चा बांट रहे हैं, मौका मिलने पर उन्हीं पर्चों में अपने कॉन्टैक्ट भी दे रहे हैं। ये हालत हैं प्रयागराज के रेड लाइट एरिया मीरगंज की। प्रयागराज के अलावा बाराबंकी के सफेदाबाद, वाराणसी के शिवदासपुर और बस्ती शहर के इटैलिया के चुनावी टेंपरेचर को भी हमने नापा है। आइए एक-एक करके चलते हैं…बदनाम गली 1, बाराबंकी का सफेदाबाद4 गलियां, 200 से ज्यादा दरवाजे, 800 महिलाएं, वो चुनावी बातें नहीं करतींसफेदाबाद पुलिस बूथ के ठीक पीछे 50 कदम दूर से चार गलियां एक के बाद एक शुरू होती हैं। इनमें 200 से ज्यादा छोटे-छोटे दरवाजे हैं। उनके बाहर सुबह 9 बजे से लड़कियां खड़ी हो जाती हैं। हम बारी-बारी से तीनों गलियों से गुजरे। इस दरमियान हमें सिर्फ 3 वाक्य ज्यादा सुनाई दिए…ओ दाढ़ी वाले, डांस देखेगा क्याकहां चलना है बोलपार्टी में डांस करना है या घर पेग्राहकों का इंतजार करती हुई महिलाएं।चारों गलियों में 2 चक्कर पूरा करने बाद, किसी भी दरवाजे पर कोई चुनावी पर्चा, पैम्फ्लेट या पोस्टर नहीं दिखता। दो चक्कर पूरा करने के बाद 25 से 30 साल के 7-8 लड़के हमारे पीछे लगे। वो सिर्फ महिलाओं की खूबियां गिनाते हैं।जब पता चला कि मीडिया वाले आए हैं तो सब कहते हैं, ‘प्रदीप से मिल लो’पुलिस बूथ से जो सड़क इन चारों गलियों को जोड़ती है, उसी एंट्री पॉइंट पर प्लास्टिक की कुर्सी पर एक सफेद गमछा बांधे शख्स बैठा मिला। उम्र 40 के आस-पास है। करीब साढ़े पांच फुट का तगड़ा सा दिखने वाला ये शख्स चारों गलियों का मालिक है। नाम है, प्रदीप कुमार यादव।“हमने मोदी लहर में यहां बीजेपी को नहीं जीतने दिया, अब अखिलेश की सरकार बनवानी है”बहुत कहने के बाद भी वह कैमरे पर बात करने को राजी नहीं हुआ। उसने कहा, “2017 के चुनाव में मोदी लहर में भी हमने भाजपा को नहीं जीतने दिया। इस बार भी नहीं जीतने देंगे। अखिलेश यादव की सरकार बनवानी है। योगी सरकार ने इस समुदाय के लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया।”गंदगी के बीच एक कमरे के मकान में जीने को मजबूर महिलाएं।प्रदीप अपनी बात को रखते वक्त बार-बार आस-पास की भीड़ से हामी भरवाता है। भीड़ कहती है, ‘प्रदीप भइया जिसे बोलेंगे उसी को वोट देंगे।’ भीड़ में खड़ी सीमा नट और आरती नट कहती हैं, “हमारी गली में अब तक कोई वोट मांगने नहीं आया। वह बताती हैं कि उनका घर हरदोई और कासगंज में है।80 साल से इसी जगह पर इसी धंधे में हैं, सिर्फ कोरोना के बाद से मंदी आई हैयहां रहने वाली महिलाएं खुलकर कुछ नहीं कर पातीं। ये जानने के बाद हम मीडियावाले हैं वो दूर भागती हैं। कुछ पूछने पर जवाब नहीं देतीं। जिनकी उम्र 40 से ज्यादा है, वो सिर्फ इतना कहती हैं, “हमारे कमरों का किराया 4000 कर दिया है। कहां से इतने पैसे लाएं। पहले एक पार्टी में नाचने के 500 से 2000 तक मिलते थे। अब 200 में काम करना पड़ रहा है”।वहां से निकलते वक्त अंजू धीरे से एक तरफ बुलाकर कहती हैं, “यहां गंदगी बहुत है। सांस नहीं ली जाती। तुम अखबार में लिख के ये गंदगी हटवा दो।”बदनाम गली 2, प्रयागराज का मीरगंज4 गलियां, 15 लड़कियां, 70 मर्द सौदा कर रहे; लेकिन गले में बीजेपी-कांग्रेस के गमछे डालकरमीरगंज की गलियों में सबसे ज्यादा बीजेपी के झंडे लगे हैं। यहां की कुल 4 बदनाम गलियों मद्रासी गली, सत्या गली, जुलाहा गली और नेपाली या पहाड़ी गली में बीजेपी के 22 झंडे टंगे हुए हैं। गली के बाहर 20-25 लोग हाथों में बीजेपी, कांग्रेस और राजा भइया की जनसत्ता पार्टी का पैम्फ्लेट लिए घूम रहे हैं, लेकिन वो लोगों से राजनीति पर नहीं महिलाओं के रेट और उनकी खूबियों की बात करते हैं।मीरगंज की मद्रासी गली।गली के मुहाने पर कपड़े की दुकान चलाने वाले प्रवीण गुप्ता कहते हैं, “इनमें से कोई कार्यकर्ता नहीं है। सब धंधे से जुड़े लोग हैं। लेकिन उन्होंने फिलहाल फॉर्मूला निकाल लिया है। वो चुनावी बैनरों-पोस्टरों की आड़ में धंधा चलाते हैं।”प्रवीण कहते हैं, “ये लोग देखते हैं कि किस पार्टी के लोग ज्यादा प्रचार करने आ रहे हैं। उसी से अंदाजा लगाते हैं कि कौन सी पार्टी इस इलाके में भारी पड़ रही है। फिर वो उसी पार्टी के बैनर-पोस्टर अपने घरों पर लगा लेते हैं। इससे उन्हें कॉन्फिडेंस रहता है कि पुलिस ज्यादा परेशान नहीं करेगी।”प्रत्याशियों के समर्थक लागतार क्षेत्र में घूमते रहते हैं।फिलहाल, यहां पर बीजेपी नंद गोपाल नंदी, राजा भइया के जनसत्ता पार्टी के प्रत्याशी के सबसे ज्यादा दिख रहे हैं। कई लोगों के गले में हाथ के पंजे वाले कांग्रेसी गमछे भी लटक रहे हैं। कन्नी चुनाव चिन्ह वाले एक निर्दलीय प्रत्याशी के 20-25 कार्यकर्ता लगातार क्षेत्र में मंडरा रहे हैं।कभी 600 महिलाएं यहां जिस्मफरोशी करती थीं, 2 फौजियों के चलते अब कोठों पर ताला लग गया हैइस वक्त मीरगंज में सिर्फ 15 बची हैं। वो भी शाम ढलने के बाद गली के मुहानी पर आकर बैठ जाती हैं। गली के बाहर ही मोल-भाव होता है। फिर युवतियां बाइक पर बैठकर युवकों के साथ चली जाती हैं। साल 2013 तक ऐसा नहीं था।मीरगंज में तीन तरह की तवायफें रहती थीं। पहली जो यहीं की रहने वाली थी। दूसरी, जिन्हें खरीदकर लाया गया था और तीसरी वे जिन्होंने गरीबी की वजह यह रास्ता चुन लिया था। तब यहां, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, राजस्थान के धौलपुर और पश्चिम बंगाल से आईं लगभग 600 लड़कियां दिनभर गलियों के दरवाजों पर खड़ी रहती थीं।7 सितंबर 2013 की एक घटना ने इस इलाके को ऐसा सील कराया कि आज 9 साल बाद भी दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं। उस दिन रविवार की शाम थी। इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस यानी ITBP के दो जवानों असल में अनूप कुमार और लालमणि तफरी के लिए मीरगंज आए थे। आरोप था कि वो एक तवायफ से कुछ बात कर रहे थे। तभी उस युवती का बॉयफ्रेंड आया और दोनों को गोली मार दी।अब 30 रुपए के लिए जिस्म बेचने को मजबूरमुर्शिदाबाद की जोहरा (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “हर किसी का यहां अपना रेट फिक्स होता है। किसी का 100 रुपए तो किसी का 500 रुपये। इसमें से एक हिस्सा पुलिस को जाता है, तो दूसरा कोठे के मालिक को। दलाल भी हर ग्राहक पर अपना हिस्सा ले जाता है। हमारे पास 100 रुपये में से केवल 30 रुपये बचते हैं। खुश होकर ग्राहक ने अगर कुछ अलग से दे दिया तो वह हमारा हो जाता है।”बदनाम गली 3, वाराणसी का शिवदासपुरटूटे-अधबने घरों से झांकती महिलाएं, दीवारों पर लगे सपा-कांग्रेस के चुनावी पोस्टर, लेकिन 18 साल से कोई नेता नहीं पहुंचाबानरस रेलवे स्टेशन से आधा किमी दाहिने तरफ चलते हुए हम शिवदासपुर पहुंचे। यहां सकरी सी गली में 50 कदम चलने के बाद एक अलग ही माहौल दिखा। एकलाइन में बने घरों से कुछ महिलाएं झांक रही थीं। वहीं पर दिलवाले फिल्म का ‘कितना हसीन चेहरा’ गाना बज रहा था। यहां 30 से ज्यादा घर ऐसे हैं, जहां ताला लटका हुआ है। सड़के खराब हैं और इन घरों के चारों तरफ कूड़ा बिखरा पड़ा था।सुबह 9 बजे से 11 बजे तक पूरा शिवदासपुर घूमने के बाद हमें कोई भी चुनावी माहौल नहीं दिखा। लेकिन इस दरमियान हमें इलाके की एक पुरानी दीवार पर कांग्रेस का धुंधला हो चुका प्रचार दिखा। साथ ही कई घरों के बाहर सपा-गठबंधन के पोस्टर भी दिखे तो हमने खुद से पहल की। चुनावी हाल जानने हम एक अधकच्चे मकान के बाहर पहुंचे…बचपन से इसी अधबने माकन में रह रही है ये महिला।घर के अंदर से आवाज आती है…क्या काम है बाबू , यहां कैसे… क्या चाहिए ?बालों में कंघी फेरते हुए एक महिला बाहर आती है। नाम काजल बताती है। सपा के पोस्टर पर छपी अखिलेश की तस्वीर दिखाते हुए हमने पूछा क्या इन्हें जानती हैं। काजल ने कहा, “नहीं, कैसे पहचाने ये तो कभी यहां दिखे ही नहीं।”18 साल हो गए कोई बड़ा नेता शिवदासपुर नहीं आया… उनके चिंटू आते हैंशिवदासपुर के बीचोंबीच तालाब के बगल में हमें रानी (बदला हुआ नाम) मिल गईं। रानी सेक्स वर्कर हैं, जो बीते 25 साल से यहीं रह रही हैं। उन्होंने कैमरे पर न आने की शर्त पर बताया, ”2005 तक यहां सब अच्छा था। ऐसी रौनक थी कि मुंबई का जूहू-चौपाटी फेल था। लेकिन 2005 में चौधरी के एनकाउंटर के बाद सब बर्बाद हो गया। पुलिस यहां की लड़कियों को पकड़ ले गई। कई लोगों को जेल में डाल दिया। तब से यहां कोई नेता नहीं आया। बस चुनाव में पर्चा चिपकाने के लिए अपने चिंटुओं को भेज देते हैं।”धंधा मंदा पड़ने के बाद महिला ने पेट पलने के लिए छोटी दुकान खोल ली।रहमत खान ने शिवदारपुर को बना दिया बदनाम गलीबात 1970 की बात है। तब काशी विश्वनाथ मंदिर के पास दालमंडी इलाका तवायकों के लिए मशहूर था। 1980 में मंदिर क्षेत्र का सुधार हुआ, तो यहां काम करने वाली महिलाओं को पुलिस ने खदेड़ना शुरू किया। सरकारी हंटर चला तो दालमंडी की रौनक कोसो दूर शिवदासपुर में आ बसी।शिवदासपुर में परचून की दुकान चला रहे चौथी प्रसाद बताते हैं, “पहले यहां महिलाएं गाना-बजाना करती थीं। लेकिन रहमत खान ने महिलाओं को जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया। उनकी पहचान कानपुर, बिहार, नेपाल और बंगाल तक थी। वही लड़कियों को दूर-दूर से यहां लाता था। लेकिन 2005 में वो पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। तब से यहां के हालात बदतर होते गए”।”रहमत के समय यहां 200 से ज्यादा महिलाएं थी। लेकिन 2005 में यहां पुलिस का बड़ा छापा पड़ा। बहुत सी महिलाओं को जेल में बंद कर दिया गया। आज यहां 10 से 12 घर ही बचे हैं, जहां चोरी छिपे ये काम होता है।” प्रसाद ने आगे बताया। शिवदासपुर में 64 घर हैं। यहां करीब 460 लोग रहते हैं।बदनाम गली 4, बस्ती शहर का इटैलिया मोहल्लाभाजपा सरकार ने हमारा रोजगार छीन लिया, अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाएंगेबस्ती रेलवे स्टेशन से सिर्फ 100 मीटर आगे बढ़ते ही इटैलिया मोहल्ला आता है। इसमें करीब 3 बदनाम गलियां हैं। यहां पर अब भी 20-30 महिलाएं मिल जाती हैं। मोबाइल और कैमरा देखकर वो और दूर भागती हैं। जब हमने विश्वास दिलाया कि हम उनके लिए खतरा नहीं हैं, तब बिना नाम बताए एक महिला ने कहा, “भाजपा सरकार ने हमारे कोठे बंद कर दिए। अब हम दाने-दाने के लिए मोहताज हैं।”गरीबी की मौजूदा स्थिति बयां करती हुई महिला।उन्होंने कहा, “भाजपा सरकार ने महंगाई भी बढ़ाई है। पांच किलो राशन से क्या होगा? हमारे कोठे बंद हैं, बाहर भी हमें कोई काम नहीं देता। हम कहां जाएं?”आस-पास के लोगों को राहत, लेकिन गली में रहने वाली महिलाएं बीजेपी से नाराजमोहल्ले की दूसरी गली में रहने वाले संतोष पांडेय कहते हैं, “पहले यहां पूरी रात मुजरा चलता था। आना-जाना दुश्वार था। लेकिन बीजेपी की सरकार आते ही ये सब बंद हो गया। इससे काफी राहत है।” वह कहते हैं, “लेकिन अब भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अब भी कुछ महिलाएं धंधा करती हैं।”कोई भी जीते, आता तो कोई नहीं; लेकिन हम लोग वोट जरूर देंगेअपना नाम बताए बगैर गली के एक दरवाजे पर खड़ी करीब 25 से 30 साल की युवती कहती है, ”वोटर कार्ड है, हम सब हर बार वोट डालने जाते हैं। लेकिन जीतने के बाद कभी कोई भी नेता दिखाई नहीं देता है। लेकिन हम इस बार भी वोट देंगे।”वाराणसी से देवांशु तिवारी, प्रयागराज से जनार्दन पांडेय और बस्ती से विपिन यादव ने रिपोर्ट की है।