संत एकनाथ ने बेटे नहीं सचिव पर किया भरोसा:सबसे अहम काम सौंपने से पहले बोले

संत एकनाथ ने बेटे नहीं सचिव पर किया भरोसा:सबसे अहम काम सौंपने से पहले बोले

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  • Aaj Ka Jeevan Mantra By Pandit Vijayshankar Mehta, Story Of Sant Eknath, We Should Remember These Tips In Our Relation

4 घंटे पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता

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कहानी – संत एकनाथ से जुड़ा किस्सा है। एकनाथ जी ने एक आश्रम बनाया था। आश्रम में उनके साथ ही कई और लोग भी रहते थे। उनमें एक उनका निजी सचिव भी था। उसका नाम था पूरन पौड़ा। निजी सचिव का ये नाम इसलिए पड़ा था, क्योंकि वह भोजन बहुत करता था, उसे भूख बहुत लगती थी। थोड़ा मोटा भी हो गया था।

पूरन पौड़ा एकनाथ जी से पहले जाग जाता था। दिनभर एकनाथ जी जो कुछ भी करते, पूरन पौड़ा उनके साथ रहकर सेवा करता था। अपने गुरु के सोने के बाद सोता था। वह हर पल गुरु सेवा के लिए जागृत रहता था।

एक दिन एकनाथ जी को लगा कि अब मैं ये संसार छोड़कर जाने वाला हूं तो उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया। एकनाथ जी ने सभी से कहा, ‘इन दिनों मैं एक ग्रंथ लिख रहा हूं। मुझे ये लग रहा है कि मेरी आयु पूरी हो गई है तो शायद ये ग्रंथ पूरा नहीं हो पाएगा। मेरे जाने के बाद ग्रंथ अधूरा रह जाए तो इसे पूरन पौड़ा से पूरा कराना।’

ये सुनकर सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी कहने लगे कि आपका पुत्र हरि योग्य है, पंडित बन गया है, उसने नियमों के अनुसार अध्ययन किया है। आपका अधूरा ग्रंथ पूरा करने का अधिकार उसे है।

एकनाथ जी बोले, ‘मेरा बेटा विद्वान तो हो गया है, लेकिन उसके मन में मेरे लिए अभी भी पिता का भाव है। पूरन पौड़ा ये मुझे सिर्फ गुरु मानता है। वह गुरु-शिष्य का रिश्ता पूरे मन से निभाता है। इस ग्रंथ का बाकी का काम विद्वत्ता से नहीं श्रद्धा से पूरा हो पाएगा। श्रद्धा में डूबे शब्दों का गहरा असर होता है। इसलिए ये काम पूरन पौड़ा को ही देना।’

बाद में पूरन पौड़ा ने ही वह ग्रंथ पूरा किया था।

सीख – यहां एकनाथ जी ने हमें ये सीख दी है कि रिश्तों में भावना होने के साथ ही श्रद्धा और निष्ठा भी होनी चाहिए। तभी रिश्तों में प्रेम और गरिमा बनी रहती है। गुरु की सेवा के लिए हर शिष्य को हमेशा तैयार रहना चाहिए।

Hindi NewsNationalAaj Ka Jeevan Mantra By Pandit Vijayshankar Mehta, Story Of Sant Eknath, We Should Remember These Tips In Our Relation4 घंटे पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहताकॉपी लिंककहानी – संत एकनाथ से जुड़ा किस्सा है। एकनाथ जी ने एक आश्रम बनाया था। आश्रम में उनके साथ ही कई और लोग भी रहते थे। उनमें एक उनका निजी सचिव भी था। उसका नाम था पूरन पौड़ा। निजी सचिव का ये नाम इसलिए पड़ा था, क्योंकि वह भोजन बहुत करता था, उसे भूख बहुत लगती थी। थोड़ा मोटा भी हो गया था।पूरन पौड़ा एकनाथ जी से पहले जाग जाता था। दिनभर एकनाथ जी जो कुछ भी करते, पूरन पौड़ा उनके साथ रहकर सेवा करता था। अपने गुरु के सोने के बाद सोता था। वह हर पल गुरु सेवा के लिए जागृत रहता था।एक दिन एकनाथ जी को लगा कि अब मैं ये संसार छोड़कर जाने वाला हूं तो उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया। एकनाथ जी ने सभी से कहा, ‘इन दिनों मैं एक ग्रंथ लिख रहा हूं। मुझे ये लग रहा है कि मेरी आयु पूरी हो गई है तो शायद ये ग्रंथ पूरा नहीं हो पाएगा। मेरे जाने के बाद ग्रंथ अधूरा रह जाए तो इसे पूरन पौड़ा से पूरा कराना।’ये सुनकर सभी को बहुत आश्चर्य हुआ। सभी कहने लगे कि आपका पुत्र हरि योग्य है, पंडित बन गया है, उसने नियमों के अनुसार अध्ययन किया है। आपका अधूरा ग्रंथ पूरा करने का अधिकार उसे है।एकनाथ जी बोले, ‘मेरा बेटा विद्वान तो हो गया है, लेकिन उसके मन में मेरे लिए अभी भी पिता का भाव है। पूरन पौड़ा ये मुझे सिर्फ गुरु मानता है। वह गुरु-शिष्य का रिश्ता पूरे मन से निभाता है। इस ग्रंथ का बाकी का काम विद्वत्ता से नहीं श्रद्धा से पूरा हो पाएगा। श्रद्धा में डूबे शब्दों का गहरा असर होता है। इसलिए ये काम पूरन पौड़ा को ही देना।’बाद में पूरन पौड़ा ने ही वह ग्रंथ पूरा किया था।सीख – यहां एकनाथ जी ने हमें ये सीख दी है कि रिश्तों में भावना होने के साथ ही श्रद्धा और निष्ठा भी होनी चाहिए। तभी रिश्तों में प्रेम और गरिमा बनी रहती है। गुरु की सेवा के लिए हर शिष्य को हमेशा तैयार रहना चाहिए।

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